भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
राइट टू प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. गुरुवार को इस सुनवाई का दूसरा दिन था. इस मामले में 9 जजों की बेंच में सुनवाई कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार ऐसा अधिकार नहीं हो सकता जो पूरी तरह मिले और सरकार के पास कुछ शक्ति होनी चाहिए कि वह इस पर तर्कसंगत बंदिश लगा सके. न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार करते हुए गुरुवार को यह टिप्पणी की कि निजता का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया जा सकता है कि नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सवाल उठाते हुए कहा, 'जब आप एप्पल जैसी प्राइवेट कंपनियों को अपना पर्सनल डाटा दे देते हैं तो सरकार को ये डाटा देने में क्या दिक्कत है? इन दोनों मामलों में क्या अंतर है? आप प्राइवेट पार्टियों को अपनी जानकारी सरेंडर कर देते हैं और यहां सरकार को डाटा देने पर रोक लगाने की मांग हो रही है. 99 फीसदी लोगों को या तो मालूम नहीं या फिर उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनकी निजी जानकारी का क्या हो रहा है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने आगे कहा कि आप जैसे ही आईपैड या आईफोन इस्तेमाल करते हैं तो उसमें भी अपने फिंगर प्रिंट देते हैं. जैसे ही आप एयर टिकट बुक करते हैं, अगले दिन आपको वैकल्पिक फ्लाइट टिकट के ऑफर आने लगते हैं.
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, 'इन प्राइवेट कंपनियों के साथ मेरा करार है और उल्लंघन होने पर मैं कारवाई कर सकता हूं लेकिन सरकार के साथ कोई करार नहीं है. मेरे पास एक डिजीटल पहचान है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वो डिजिटल पहचान का सरंक्षण करे.'
इसपर जस्टिस चंद्रचूड ने कहा, 'मान लीजिेए कि सरकार ऐसे व्यक्ति का इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस तैयार करती है जो किसी अपराध में दोषी पाया गया हो. तो क्या सरकार को डाटाबेस बनाने की इजाजत दी जा सकती है? क्या कोई व्यक्ति पासपोर्ट अथॉरिटी को पर्सनल डाटा देने से इनकार कर सकता है? अगर हम ये पाते हैं कि प्राइवेसी एक क्षैतिज अधिकार है तो ये सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वो प्राइवेसी को सरंक्षण दे.
जस्टिस संजय किशन कौल ने पूछा कि अगर कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी की निजता में खलल डालता है तो उसका क्या उपचार होगा? वहीं जस्टिस कौल ने कहा, 'अगर कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी की प्राइवेसी में खलल डालता है तो क्षतिपूर्ति काफी नहीं होगी. इसके लिए निषेधाज्ञा होनी चाहिए.
याचिकाकर्ता की और से आनंद ग्रोवर ने कहा कि पासपोर्ट के लिए डाटा को गोपनीय तरीकों से प्रोटेक्ट किया जाता है. ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो नागरिक की प्राइवेसी की रक्षा करने के लिए प्राइवेट पार्टी पर कारवाई करे. अंतररार्ष्ट्रीय कानून में सरकारों का ये कर्तव्य है कि वो प्राइवेसी को सम्मान दे और सरंक्षण दे. प्राइवेट व्यक्ति के प्राइवेसी में खलल डालने पर सरकार को कानून बनाना चाहिए. इस मामले में अगली सुनवाई 25 जुलाई को होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सवाल उठाते हुए कहा, 'जब आप एप्पल जैसी प्राइवेट कंपनियों को अपना पर्सनल डाटा दे देते हैं तो सरकार को ये डाटा देने में क्या दिक्कत है? इन दोनों मामलों में क्या अंतर है? आप प्राइवेट पार्टियों को अपनी जानकारी सरेंडर कर देते हैं और यहां सरकार को डाटा देने पर रोक लगाने की मांग हो रही है. 99 फीसदी लोगों को या तो मालूम नहीं या फिर उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनकी निजी जानकारी का क्या हो रहा है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने आगे कहा कि आप जैसे ही आईपैड या आईफोन इस्तेमाल करते हैं तो उसमें भी अपने फिंगर प्रिंट देते हैं. जैसे ही आप एयर टिकट बुक करते हैं, अगले दिन आपको वैकल्पिक फ्लाइट टिकट के ऑफर आने लगते हैं.
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, 'इन प्राइवेट कंपनियों के साथ मेरा करार है और उल्लंघन होने पर मैं कारवाई कर सकता हूं लेकिन सरकार के साथ कोई करार नहीं है. मेरे पास एक डिजीटल पहचान है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वो डिजिटल पहचान का सरंक्षण करे.'
इसपर जस्टिस चंद्रचूड ने कहा, 'मान लीजिेए कि सरकार ऐसे व्यक्ति का इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस तैयार करती है जो किसी अपराध में दोषी पाया गया हो. तो क्या सरकार को डाटाबेस बनाने की इजाजत दी जा सकती है? क्या कोई व्यक्ति पासपोर्ट अथॉरिटी को पर्सनल डाटा देने से इनकार कर सकता है? अगर हम ये पाते हैं कि प्राइवेसी एक क्षैतिज अधिकार है तो ये सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वो प्राइवेसी को सरंक्षण दे.
जस्टिस संजय किशन कौल ने पूछा कि अगर कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी की निजता में खलल डालता है तो उसका क्या उपचार होगा? वहीं जस्टिस कौल ने कहा, 'अगर कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी की प्राइवेसी में खलल डालता है तो क्षतिपूर्ति काफी नहीं होगी. इसके लिए निषेधाज्ञा होनी चाहिए.
याचिकाकर्ता की और से आनंद ग्रोवर ने कहा कि पासपोर्ट के लिए डाटा को गोपनीय तरीकों से प्रोटेक्ट किया जाता है. ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो नागरिक की प्राइवेसी की रक्षा करने के लिए प्राइवेट पार्टी पर कारवाई करे. अंतररार्ष्ट्रीय कानून में सरकारों का ये कर्तव्य है कि वो प्राइवेसी को सम्मान दे और सरंक्षण दे. प्राइवेट व्यक्ति के प्राइवेसी में खलल डालने पर सरकार को कानून बनाना चाहिए. इस मामले में अगली सुनवाई 25 जुलाई को होगी.
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