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बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है...फिर भी रिटायरमेंट के बाद हो सकती है टेंशन! Expert बोले- कैश बिना ऐश तो दूर, घरखर्च भी मुश्किल

Retirement Planning: रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड और प्रॉपर्टी बनाना ही काफी नहीं है. नौकरी से रेगुलर सैलरी बंद होने के बाद भी घर का खर्च, मेडिकल का खर्चा लगा रहेगा, ऐसे में संपत्ति होने के बावजूद हर महीने पैसों की कमी हो सकती है. 

बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है...फिर भी रिटायरमेंट के बाद हो सकती है टेंशन! Expert बोले- कैश बिना ऐश तो दूर, घरखर्च भी मुश्किल
Asset Rich, Cash Poor की स्थिति मुश्किल पैदा कर सकती है
NDTV इंडिया ग्राफिक्‍स

कागजातों पर अमीर होना तभी काम का, जब जरूरत पड़ने पर खर्च चुकाने के लिए पर्याप्त कैश भी हो. नहीं तो संपत्ति किस काम की! है कि नहीं?

रिटायरमेंट के लिए घर खरीदना, जमीन में निवेश करना और बड़ा फंड तैयार करना... ये सब मिडिल क्‍लास परिवारों की स्ट्रैटजी का हिस्‍सा बन चुका है. ये चीजें निश्चित रूप से बुढ़ापे का सहारा बन सकती है, लेकिन एक सवाल है, नौकरी से सैलरी आनी बंद हो जाए और हर महीने के खर्च जारी रहें, तो इन जरूरतों को पूरा करने के लिए रेगुलर पैसा कहां से आएगा?

कई लोगों के सामने रिटायरमेंट के बाद यही चुनौती आती है. उनके पास घर, जमीन या दूसरे निवेश के रूप में अच्छी-खासी संपत्ति होती है, लेकिन रोजमर्रा के खर्चों के लिए पर्याप्त कैश नहीं होता. उनकी संपत्ति की वैल्यू तो करोड़ों रुपये हो सकती है, लेकिन उससे हर महीने पैसा मिलना जरूरी नहीं है.

यही स्थिति 'एसेट रिच, कैश पुअर' (Asset Rich, Cash Poor) कहलाती है. यानी संपत्ति तो काफी है, लेकिन खर्च चलाने के लिए नियमित कैश की कमी है.

घर और जमीन होने पर भी क्यों हो सकती है परेशानी?

रिटायरमेंट के बाद घर का राशन, बिजली-पानी के बिल, दवाइयों और इलाज का खर्च लगातार बना रहता है. अगर इन खर्चों के लिए नियमित आमदनी का इंतजाम नहीं है, तो व्यक्ति को अपने निवेश या बचत से पैसा निकालना पड़ सकता है.

घर बेचकर पैसा जुटाना हर किसी के लिए आसान विकल्प नहीं होता. इससे परिवार को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है. इसके अलावा, बाजार की स्थिति खराब होने पर संपत्ति बेचने से उम्मीद के मुताबिक कीमत भी नहीं मिल सकती.

यानी संपत्ति का मालिक होना और उस संपत्ति से नियमित आमदनी मिलना दो अलग-अलग बातें हैं. रिटायरमेंट प्लानिंग में सिर्फ ये देखना काफी नहीं है कि आपके पास कुल कितनी संपत्ति है. ये भी जरूरी है कि उससे हर महीने के खर्च कैसे पूरे होंगे.

गो डिजिट लाइफ इंश्योरेंस के वाइस प्रेसिडेंट ऑफ प्रोडक्ट्स अशोक मनवानी ने NDTV से कहा कि रिटायरमेंट के शुरुआती दौर में जमा फंड पर्याप्त दिख सकता है, लेकिन उसकी असली उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि वो आने वाले वर्षों में खर्चों को कितनी अच्छी तरह पूरा कर पाता है.

20 साल बाद 50,000 रुपये का खर्च कितना हो सकता है?

रिटायरमेंट की योजना बनाते समय महंगाई को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. आज जिस रकम से घर का खर्च चल रहा है, भविष्य में उसी स्तर का खर्च पूरा करने के लिए कहीं ज्यादा पैसे की जरूरत हो सकती है.

मान लीजिए, आज आपके परिवार का हर महीने का खर्च 50,000 रुपये है. अगर महंगाई सालाना 7% रहती है, तो 20 साल बाद इसी खर्च के लिए करीब 1.93 लाख रुपये हर महीने की जरूरत हो सकती है.

इससे समझा जा सकता है कि रिटायरमेंट के लिए सिर्फ आज के खर्चों के हिसाब से फंड बनाना पर्याप्त नहीं है. भविष्य में बढ़ने वाले खर्चों को भी ध्यान में रखना जरूरी है.

यह कैलकुलेशन 7% सालाना महंगाई के अनुमान पर आधारित है. वास्तविक खर्च महंगाई की दर, परिवार की जरूरतों और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के हिसाब से अलग हो सकता है.

बड़ा रिटायरमेंट फंड भी क्यों पड़ सकता है कम?

रिटायरमेंट के बाद जिंदगी 20 से 30 साल या उससे भी लंबी हो सकती है. इस दौरान नियमित आमदनी का इंतजाम नहीं होने पर बचत पर दबाव बढ़ सकता है.

अगर हर महीने के खर्च के लिए लगातार निवेश से पैसा निकालना पड़े, तो समय के साथ रिटायरमेंट फंड कम हो सकता है. दूसरी तरफ, इलाज और स्वास्थ्य से जुड़े खर्च बढ़ने पर जरूरतें और बढ़ सकती हैं.

यही वजह है कि रिटायरमेंट प्लानिंग के दो अलग-अलग हिस्से हैं.

  1. पहला चरण: नौकरी या कारोबार के दौरान बचत और निवेश से संपत्ति बनाना.
  2. दूसरा चरण: रिटायरमेंट के बाद उसी संपत्ति से नियमित आमदनी का इंतजाम करना.

मनवानी के मुताबिक, रिटायरमेंट प्लानिंग में पहला चरण अक्सर ज्यादा ध्यान पाता है, जबकि दूसरे चरण पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है. लेकिन नौकरी से नियमित सैलरी बंद होने के बाद आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, ये काफी हद तक इसी दूसरे चरण पर निर्भर करता है.

एन्युटी प्लान से कैसे मिल सकती है नियमित आमदनी?

रिटायरमेंट के बाद नियमित आमदनी की जरूरत पूरी करने का एक विकल्प एन्युटी प्लान हो सकता है. ऐसे प्लान में व्यक्ति अपनी जमा पूंजी का इस्तेमाल तय शर्तों के मुताबिक नियमित भुगतान हासिल करने के लिए कर सकता है.

इससे रिटायरमेंट के दौरान रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के लिए निवेश से बार-बार पैसा निकालने पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.

हालांकि, हर व्यक्ति के लिए एक ही तरह का प्लान सही नहीं होता. कोई भी विकल्प चुनने से पहले अपनी जरूरतों, जोखिम उठाने की क्षमता, पैसों की उपलब्धता और आमदनी के दूसरे स्रोतों का आकलन करना चाहिए.

एन्युटी प्लान में मिलने वाली रकम, भुगतान की अवधि, रिटर्न या गारंटी जैसी बातें चुने गए विकल्प और उसकी शर्तों पर निर्भर करती हैं. इसलिए प्लान खरीदने से पहले उसके नियमों को समझना जरूरी है.

पति-पत्नी के लिए जॉइंट-लाइफ एन्युटी का विकल्प

रिटायरमेंट प्लानिंग में सिर्फ अपनी जरूरतों का नहीं, बल्कि जीवनसाथी की आर्थिक सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए.

जॉइंट-लाइफ एन्युटी में चुने गए विकल्प की शर्तों के अनुसार, एक पॉलिसीधारक की मृत्यु के बाद जीवित जीवनसाथी को भी नियमित आमदनी मिलती रह सकती है. इससे पहले पॉलिसीधारक के निधन के बाद दूसरे जीवनसाथी के सामने आमदनी का संकट पैदा होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है.

हालांकि, भुगतान कितना जारी रहेगा और किन शर्तों पर मिलेगा, ये चुने गए प्लान पर निर्भर करता है. इसलिए केवल नियमित आमदनी के वादे के आधार पर फैसला करने के बजाय पॉलिसी की शर्तें, लिक्विडिटी और दूसरे विकल्पों से तुलना करना जरूरी है.

रिटायरमेंट प्लानिंग में इन बातों का रखें ध्यान

रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा के लिए सिर्फ बड़ा फंड या प्रॉपर्टी होना पर्याप्त नहीं है. योजना बनाते समय इन बातों पर भी ध्यान दें:

  1. मासिक खर्च का अनुमान: आज के खर्च और भविष्य में महंगाई के असर का आकलन करें.
  2. नियमित आमदनी: पेंशन, ब्याज, किराये या दूसरे स्रोतों से कितनी आमदनी होगी, इसका हिसाब लगाएं.
  3. मेडिकल खर्च: इलाज और स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरतों के लिए अलग से व्यवस्था रखें.
  4. इमरजेंसी फंड: अचानक जरूरत पड़ने पर आसानी से उपलब्ध होने वाली रकम रखें.
  5. लिक्विडिटी: पूरी पूंजी को ऐसे निवेश में न लगाएं, जहां जरूरत के समय पैसा निकालना मुश्किल हो.
  6. लाइफ पार्टनर की सुरक्षा:अपनी अनुपस्थिति में परिवार की आमदनी कैसे जारी रहेगी, इसकी योजना बनाएं.

अशोक मनवानी कहते हैं, रिटायरमेंट की तैयारी का मकसद सिर्फ संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि नौकरी के बाद भी आर्थिक आजादी बनाए रखना है. इसलिए फंड कितना बड़ा है, इसके साथ ये देखना भी जरूरी है कि उससे कितने समय तक और कितनी नियमित आमदनी मिल सकती है.

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