- अमेरिका-ईरान युद्ध शांति समझौते से भारत को कच्चे तेल और LPG की आयात लागत में महत्वपूर्ण कमी हो सकती है.
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के खुलने से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना है.
- तेल की कीमते घटने से एयरलाइन टिकट, सब्जियों और घरेलू गैस की कीमतों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
US-Iran Peace Deal impact on India: करीब साढ़े तीन महीने तक अमेरिका-ईरान में जारी युद्ध ने दुनियाभर को हिला कर रख दिया. लेकिन अब दोनों देशों के बीच शांति समझौते का रास्ता साफ होता दिख रहा है. अगर 19 जून को प्रस्तावित समझौते पर मुहर लग जाती है, तो इसका फायदा सिर्फ ऑयल मार्केट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत में पेट्रोल-डीजल, LPG, हवाई सफर, सब्जियों की कीमतों से लेकर कुछ रोजमर्रा के सामान तक पर इसका असर दिख सकता है. असल में पेट्रोल-डीजल सस्ता होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट घटती है. जब सामान एक जगह से दूसरी जगह कम खर्च में पहुंचता है, तो कई चीजों की कीमतों पर दबाव कम हो जाता है.
यही वजह है कि इस समझौते को भारत के लिए आर्थिक राहत के तौर पर भी देखा जा रहा है. आइए जानते हैं अमेरिका-ईरान में बीच समझौते से भारत को कितना फायदा होगा और इसके बाद कौन-कौन सी चीजें सस्ती हो सकती हैं....

भारत को क्यों मिल सकता है सबसे बड़ा फायदा?
28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान भारत में तेल काफी महंगा हो गया. रुपया लुढ़ता चला गया और पेट्रोल-डीजल से लेकर एलपीजी गैस तक लिए लोगों को महंगाई झेलना पड़ा. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में से होकर आने गुजरने वाला तेल सप्लाई बंद हो गया.भारत के लिए यह रुट बेहद अहम है.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मिल सकती है राहत
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. युद्ध के दौरान तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ गई थीं .अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुल जाता है और तेल की आपूर्ति बढ़ती है, तो बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है. इससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा और आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है या कीमतें बढ़ने का खतरा कम हो सकता है.
LPG सिलेंडर और घरेलू गैस पर भी असर संभव
भारत LPG गैस के लिए भी आयात पर काफी निर्भर है. इस जंग के दौरान शिपिंग और इंश्योरेंस कॉस्ट बढ़ गई थी, जिससे इंपोर्ट महंगा हुआ.अगर समझौता लागू रहता है, तो शिपिंग कॉस्ट और इंश्योरेंस प्रीमियम में कमी आ सकती है. इससे सरकार को LPG कीमतों को स्थिर रखने और सब्सिडी का बोझ कम करने में मदद मिल सकती है. इसका फायदा घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.
सब्जियां और खाने-पीने की चीजें भी हो सकती हैं सस्ती
डीजल सिर्फ वाहनों में नहीं, बल्कि खेती, कोल्ड स्टोरेज और माल ढुलाई में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है.सब्जियां, फल और दूसरे फूड आइटम्स एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने में ट्रांसपोर्ट लागत अहम भूमिका निभाती है. इसके अलावा खाड़ी देशों का फर्टिलाइजर मार्केट में भी बड़ा योगदान है. अगर डीजल और खाद की लागत घटती है, तो खाने-पीने की चीजों की महंगाई पर भी दबाव कम हो सकता है.
हवाई सफर भी हो सकता है सस्ता
एयरलाइंस की सबसे बड़ी लागतों में से एक एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) होता है. कच्चे तेल की कीमत घटने पर ATF भी सस्ता हो सकता है.भारत में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. खाड़ी देशों और यूरोप जाने वाली कई उड़ानें इसी क्षेत्र से होकर गुजरती हैं. ऐसे में तेल सस्ता होने पर एयरलाइंस किराए में छूट या सस्ते टिकट ऑफर कर सकती हैं.
महंगाई कम हुई तो सस्ते हो सकते हैं लोन
इस युद्ध के खत्म होने का फायदा सिर्फ फ्यूल तक सीमित नहीं रहतीं. इनका असर ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और खाने-पीने की समेत लगभग हर सेक्टर पर पड़ता है.अगर तेल सस्ता होता है तो महंगाई दर में नरमी आ सकती है. इससे RBI के पास ब्याज दरों को कम रखने या जरूरत पड़ने पर कटौती करने की गुंजाइश बढ़ सकती है. ऐसे में भविष्य में होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की EMI पर भी राहत मिल सकती है.
पाराश्यूट तेल पहले ही हुआ सस्ता, दूसरे हेयर ऑयल भी हो सकते हैं सस्ते
Marico ने अपने पाराश्यूट कोकोनट ऑयल के 1 लीटर पैक की कीमत जून में 16.7% घटाकर 540 रुपये से 450 रुपये कर दी है. इसकी बड़ी वजह नारियल तेल के मुख्य कच्चे माल कॉपरा (Copra) की कीमतों में करीब 20% की गिरावट रही है.हालांकि यह कटौती सीधे अमेरिका-ईरान समझौते से जुड़ी नहीं है, लेकिन अगर एनर्जी और ट्रॉंसपोर्टेशन कॉस्ट में और कमी आती है तो कंपनियों को कीमतें घटाने में मदद मिल सकती है.
आंवला, बादाम और जैस्मिन जैसे कई हेयर ऑयल में 70% से 80% तक लाइट लिक्विड पैराफिन (LLP) का इस्तेमाल होता है. यह पेट्रोलियम से बनने वाला प्रोडक्ट है.अगर कच्चा तेल सस्ता होता है, तो भविष्य में इन प्रोडक्ट्स की कॉस्ट भी घट असर पड़ सकता है.
साबुन, डिटर्जेंट और रोजमर्रा के सामान पर भी दिख सकता है असर
कपड़े धोने के पाउडर और डिटर्जेंट में इस्तेमाल होने वाला Linear Alkyl Benzene (LAB) पूरी तरह पेट्रोकेमिकल आधारित होता है. कच्चे तेल की कीमत घटने पर इसकी लागत कम हो सकती है.इसी तरह नहाने के साबुन, प्लास्टिक पैकेजिंग, रैपर, डिब्बे और ढक्कन बनाने में इस्तेमाल होने वाले पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीथीन जैसे कच्चे माल भी पेट्रोलियम से बनते हैं. ऐसे में इनकी लागत कम होने का फायदा आगे चलकर उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.
कॉस्मेटिक्स और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स पर भी नजर
कोल्ड क्रीम, बॉडी लोशन, लिपस्टिक और काजल जैसे कई प्रोडक्ट्स में पैराफिन वैक्स और मिनरल ऑयल बेस का इस्तेमाल होता है. अगर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी रहती है, तो इन प्रोडक्ट्स के दाम पर भी असर पड़ सकता है.
टायर और ऑटो पार्ट्स भी हो सकते हैं सस्ते
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का असर टायर इंडस्ट्री पर भी पड़ सकता है. टायर बनाने में इस्तेमाल होने वाला सिंथेटिक रबर पूरी तरह पेट्रोलियम आधारित होता है. अगर क्रूड ऑयल सस्ता रहता है, तो कंपनियों की लागत घट सकती है. ऐसे में आगे चलकर MRF, CEAT और Apollo जैसे ब्रांड्स के टायरों की कीमतों पर भी पॉजिटिव असर देखने को मिल सकता है.
जूते-चप्पलों की भी घट सकती हैं कीमतें
आज बाजार में बिकने वाले ज्यादातर जूतों और चप्पलों के सोल EVA, पॉलीयुरेथेन (PU) और PVC जैसे मटेरियल से बनाए जाते हैं. ये सभी पेट्रोलियम आधारित प्रोडक्ट्स हैं. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने पर इनकी मैन्युफैक्चरिंग लागत कम हो सकती है, जिसका फायदा कंपनियां ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं.
पॉलिएस्टर और स्पोर्ट्स वियर पर भी दिख सकता है असर
सिर्फ ईंधन ही नहीं, कपड़ा उद्योग भी कच्चे तेल की कीमतों से प्रभावित होता है. पॉलिएस्टर और नायलॉन जैसे सिंथेटिक धागे पेट्रोकेमिकल्स से तैयार किए जाते हैं. स्पोर्ट्स वियर, रेडीमेड कपड़े, पर्दे और कालीन जैसे कई उत्पादों में इनका इस्तेमाल होता है. अगर क्रूड ऑयल सस्ता रहता है, तो इनकी उत्पादन लागत कम हो सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव घट सकता है.
कुछ दवाइयों और मेडिकल सामान के दाम भी कम होंगे
फार्मा सेक्टर में भी कई ऐसे प्रोडक्ट्स हैं जो पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भर हैं. कई कैप्सूल के कवर, सिरप का बेस और दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले कुछ सॉल्वैंट्स पेट्रोलियम आधारित होते हैं. इसके अलावा सिरिंज, ग्लूकोज की बोतलें, मेडिकल ट्यूब, दस्ताने और मास्क जैसे कई मेडिकल प्रोडक्ट्स प्लास्टिक से बनते हैं. कच्चे तेल की कीमत कम होने से इनकी लागत पर भी असर पड़ सकता है.
खेती-किसानी में भी मिल सकती है राहत
कृषि क्षेत्र को भी इसका फायदा मिल सकता है. फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई कीटनाशक और पेस्टिसाइड्स पेट्रोलियम आधारित सॉल्वैंट्स से तैयार किए जाते हैं. अगर कच्चा तेल सस्ता होता है, तो इन प्रोडक्ट्स की लागत घट सकती है. इससे किसानों का खर्च कम करने में मदद मिल सकती है. खाड़ी क्षेत्र दुनिया के बड़े फर्टिलाइजर उत्पादकों में शामिल है. अमेरिका-ईरान समझौते के बाद अगर तेल और गैस की सप्लाई सामान्य रहती है, तो फर्टिलाइजर उत्पादन और शिपिंग लागत पर भी दबाव कम हो सकता है. इसका फायदा कृषि क्षेत्र और खाद की कीमतों को स्थिर रखने में मिल सकता है.
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