अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बन जाने के बाद से कच्चे तेल के दाम में लगातार गिरावट आ रही है. क्रूड ऑयल का दाम बुधवार को गिरकर 77.51 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. यह 28 फरवरी को युद्ध पूर्व के स्तर पहुंच गया है. कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ दिनों में बड़ी गिरावट आई है. यह साढ़े तीन महीने के पूर्व स्तर पर पहुंच गया है. ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का कच्चा तेल भी नरम हुआ है. अमेरिका और ईjeन के बीच 19 जून को शांति समझौते पर दस्तखत होने के बाद इसमें और कमी आने की संभावना है. युद्ध की शुरुआत में मार्च 2026 के दौरान ब्रेंट क्रूड अंतरराष्ट्रीय बाजार में 126 से 138 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया था. जबकि डब्ल्यूटीआई (WTI) अमेरिकी क्रूड भी 113 से 114 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया था.
चार महीनों में 8 रुपये का उछाल
इंटरनेशनल मार्केट की बात करें को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए शुभ संकेत हैं. पिछले कुछ महीनों में क्रूड ऑयल रेट में उछाल से इंपोर्ट बिल और सरकारी खजाने पर असर पड़ा है. तेल कंपनियों ने पिछले 4 महीनों में अलग-अलग चरणों में पेट्रोल के दाम में करीब 8 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है. डीजल की कीमतों में भी लगभग 7.50 से 8 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा देखा गया है.
5 फीसदी लुढ़की थीं कीमतें
सोमवार को इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम करीब 5 फीसदी गिरे थे और यह 82-83 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया था. युद्ध की समाप्ति के संकेतों के साथ शेयर बाजार में भी रौनक लौटी थी और रुपया भी मजबूत दिखा. कच्चे तेल की कीमत 110 दिन बाद पहली बार 80 डॉलर के नीचे गई है. मध्य पूर्व एशिया में युद्ध थमने के बाद ग्लोबल एनर्जी मार्केट में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें तेी से घटने लगी हैं. इस समय कच्चे तेल की कीमत गिरकर 78-79 डॉलर प्रति बैरल के बीच ट्रेड कर रही हैं.
पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell की 16 जून को जारी ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत गिरकर 78.66 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है. इसकी वजह से जून के पहले 16 दिनों के दौरान कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत भी घटकर 92.16 डॉलर प्रति बैरल हो गई है.पीपीएसी के मुताबिक, अप्रैल 2026 के दौरान कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 114.48 डॉलर और मई, 2026 के दौरान 106.23 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर रही थी. इस दौरान LPG की कीमत भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 46% से ज़्यादा महंगी हुई. कच्चे तेल और नेचुरल गैस की बढ़ी हुई कीमतों के असर से भारतीय तेल कंपनियां अब भी जूझ रही हैं.
तेल कंपनियों को नुकसान
कच्चे तेल और गैस की बढ़ी हुई कीमतों के असर से भारतीय तेल कंपनियां अब भी जूझ रही हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, हर LPG सिलिंडर पर अंडर-रिकवरी आज भी 700 रुपये प्रति सिलिंडर है, हर एक लीटर डीज़ल पर अंडर-रिकवरी 27 रुपया है, जबकि हर एक लीटर पेट्रोल पर अंडर-रिकवरी 03 रुपया है. ज़ाहिर है सरकारी तेल कंपनियों को भारत में पेट्रोल-डीजल और LPG सिलिंडर की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी के बाद भी हर दिन करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है.
भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85% कच्चा तेल, 50% LNG और 60% LPG दुनियाभर के बाज़ारों से आयात करता है, जिसका मध्यपूर्व एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले एक बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से आता था. युद्ध के असर से निपटने के लिए भारत सरकार ने तेल कम्पनियों के साथ मिलकर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात स्रोतों को बड़े स्तर पर diversify किया है, और अब दुनिया के नए बाज़ारों से पेट्रोलियम पदार्थों का स्टॉक आयात किया जा रहा है, लेकिन इसकी वजह से आयात का खर्च काफी बढ़ गया है.
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क्या पेट्रोल-डीजल के दाम घटेंगे
सरकार के सूत्रों का कहना है कि एक हफ्ते पहले तक तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस सिलेंडर पर रोजाना लगभग 650 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था. लेकिन अब कच्चे तेल में नरमी के बाद ग्राहकों को कब राहत मिलेगी, यह अभी देखना होगा.
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