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IFD के जरिये पिछला दरवाजा खोलना चाहता है चीन! ड्रैगन का गेमप्‍लान और Annex 4 पर भारत के वीटो की इनसाइड स्‍टोरी

China IFD and India India Veto in WTO: विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत ने चीन के IFD समझौते को 'Annex 4' में शामिल करने से रोक दिया है. जानें क्या है यह समझौता, भारत को इस पर क्यों आपत्ति है और कैसे यह देश की आर्थिक संप्रभुता से जुड़ा है.

IFD के जरिये पिछला दरवाजा खोलना चाहता है चीन! ड्रैगन का गेमप्‍लान और Annex 4 पर भारत के वीटो की इनसाइड स्‍टोरी
India India Veto in WTO over China IFD Explained: WTO में भारत ने 'वीटो' लगाकर चीन के IFD समझौते का रास्ता क्यों रोका? समझें 'एनेक्स-4' की पूरी इनसाइड स्टोरी

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर इस समय एक युद्ध-सा छिड़ा हुआ है. एक तरफ चीन के नेतृत्व में दुनिया के 128 देश एक नए निवेश समझौते (IFD) को लागू करने पर अड़े हैं, तो दूसरी तरफ भारत अपनी 'आर्थिक संप्रभुता' की ढाल लेकर अकेला खड़ा है. भारत ने दो टूक कह दिया है कि वह इस समझौते को 'एनेक्स 4' (Annex 4) के जरिए पिछले दरवाजे से WTO में घुसने नहीं देगा. लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस 'इन्वेस्टमेंट प्लान' में ऐसा क्या है जिससे भारत को इतनी आपत्ति है? आइए, इस जटिल विषय को सरल भाषा में समझते हैं.

क्या है IFD समझौता और चीन का 'गेम प्लान'?

इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट (IFD) एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसे 2017 में चीन और कुछ अन्य देशों ने पेश किया था. इसका आधिकारिक तर्क यह है कि देशों के बीच विदेशी निवेश (FDI) की प्रक्रिया को पारदर्शी, तेज और आसान बनाया जाए.

  • नियम क्या हैं?

इसके तहत देशों को निवेश संबंधी कानून सार्वजनिक करने होंगे और 'सिंगल-विंडो सिस्टम' जैसे इंतजाम करने होंगे ताकि विदेशी कंपनियों को मंजूरी के लिए भटकना न पड़े.

  • चीन का हित:

रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम (RIS) की रिपोर्ट के अनुसार, IFD का समर्थन करने वाले 128 देशों में से 98 देश चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के सदस्य हैं. भारत इस बात पर सावधान है कि इस समझौते के जरिए चीन अपने इंफ्रा और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए वैश्विक स्तर पर नियम तय करने की ताकत हासिल कर लेगा.

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    'Annex 4' का पेंच: क्यों अड़ा है भारत?

    WTO में किसी भी समझौते को शामिल करने के दो रास्ते होते हैं. एक 'मल्टीलैटरल' (सभी देशों के लिए बाध्यकारी) और दूसरा 'एनेक्स 4' (प्लूरोलैटरल).

    • 'एनेक्स 4' वो कैटगरी है, जिसमें शामिल नियम केवल उन्हीं देशों पर लागू होते हैं जो उस पर हस्ताक्षर करते हैं. लेकिन पेंच यह है कि किसी भी नए समझौते को 'एनेक्स 4' में जोड़ने के लिए WTO के सभी 166 सदस्य देशों की सहमति (Consensus) जरूरी है.
    • भारत ने यहीं अपनी 'वीटो' पावर का इस्तेमाल किया है. भारत का मानना है कि ऐसे समझौतों से WTO की मूल भावना (जहां सबकी राय एक हो) खत्म हो जाएगी और बड़े देश छोटे देशों को दरकिनार कर अपनी मर्जी के नियम चलाएंगे.

    भारत के विरोध के 3 मुख्य कारण

    1. नीति बनाने की स्वतंत्रता (Policy Autonomy): भारत को डर है कि अगर IFD बाध्यकारी हो गया, तो उसे अपने निवेश नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार ढालना होगा. इससे 'मेक इन इंडिया' जैसे कार्यक्रमों के तहत घरेलू उद्योगों को दी जाने वाली वरीयता खतरे में पड़ सकती है. कल को कोई विदेशी कंपनी भारत की नीतियों को WTO में चुनौती दे सकेगी.
    2. व्यापार बनाम निवेश: भारत का कड़ा रुख है कि WTO 'व्यापार' (Trade) के लिए बना है, 'निवेश' (Investment) के लिए नहीं. निवेश हर देश का अपना आंतरिक और रणनीतिक मामला है, इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों की बेड़ियों में नहीं बांधा जाना चाहिए.
    3. बराबरी का अभाव और 'पीस क्लॉज' का दांव: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह आपत्ति सामरिक (Tactical) भी हो सकती है. भारत लंबे समय से खाद्य सुरक्षा (Public Stockholding) के मुद्दे पर स्थायी समाधान की मांग कर रहा है. भारत के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी पर अमेरिका जैसे देश सवाल उठाते हैं. ऐसे में भारत IFD पर अपने कड़े रुख का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में रियायतें पाने के लिए एक 'बार्गेनिंग चिप' के रूप में कर सकता है.
    China IFD and India India Veto in WTO Explained (सांकेतिक तस्‍वीर / AI Photo)

    China IFD and India India Veto in WTO Explained (सांकेतिक तस्‍वीर / AI Photo)

    इससे क्या फर्क पड़ेगा?

    कैमरून में होने वाली आगामी मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) में भारत का रुख तय करेगा कि WTO का भविष्य क्या होगा. अगर भारत झुका नहीं, तो चीन का यह 'मेगा प्लान' अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता हासिल नहीं कर पाएगा. ये अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर भारत का दबदबा साबित करता है. ये साबित करता है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत को दरकिनार कर कोई भी बड़ा फैसला नहीं लिया जा सकता.

    बात आर्थिक संप्रभुता की भी है. भारत ने संदेश दिया है कि वह किसी भी ऐसे 'क्लब' का हिस्सा नहीं बनेगा जो विकासशील देशों के हितों की बलि चढ़ाकर बनाया गया हो. भारत का 'वीटो' केवल चीन का विरोध नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज है. केंद्रीय वाणिज्‍य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी अपनी प्रतिक्रिया में यही संदेश देना चाहा है. भारत ये सुनिश्चित करना चाहता है कि व्यापार के नियम पारदर्शी तो हों, लेकिन वे इतने सख्त न हों कि किसी देश को अपने ही लोगों और उद्योगों के हितों के खिलाफ काम करना पड़े.

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