- EU-India FTA के लागू होने पर सप्लाई चेन शिफ्ट से भारत में करोड़ों नई नौकरियां बन सकती हैं.
- सूक्ष्म, लधु और मध्यम सेक्टर को पहली बार सीधे ग्लोबल मार्केट से जुड़ने का मौका मिलेगा.
- विकास महानगरों से निकलकर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक पहुंचेगा.
भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हो गया है. 2013 से अटके इस समझौते पर मुहर लगना भारत की बहुत बड़ी कामयाबी बताई जा रही है. मगर यह बदलाव केवल जीडीपी के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, यह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लाखों रोजगार पैदा करेगा, एमएसएमई को ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ने का मौका देगा. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्किल अपग्रेडेशन और राज्यों में औद्योगिक क्लस्टर का विस्तार होगा जिससे टियर-2 और टियर-3 सिटी में नौकरियों की संभावनाएं बढ़ेगी. और सबसे बड़ी बात EU-India FTA के समझौते अगर वैश्विक सप्लाई चेन को शिफ्ट करने में कामयाब रहे- जैसा कि संकेत बता रहे हैं- तो भारत के अंदर इसका असर उतना ही गहरा होगा जितना 90 के दशक में चीन में हुआ था.
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— Narendra Modi (@narendramodi) January 27, 2026
आज भारत की कुल वर्कफोर्स का करीब 12–14 फीसद हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करता है, जबकि चीन में यह आंकड़ा अपने उभार के दौर में 25% से ऊपर था. यही अंतर भारत की सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ा मौका दोनों है. अगर वैश्विक कंपनियां अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत में लाती हैं, तो इसका मतलब सिर्फ नई फैक्ट्रियां नहीं होगा, बल्कि पूरी सप्लाई चेन का जन्म होगा.
इससे मशीन ऑपरेटर, इंजीनियर, टेक्नीशियन, लॉजिस्टिक्स वर्कर, क्वालिटी कंट्रोल स्टाफ, सुपरवाइजर, डिजाइन एक्सपर्ट और रिसर्चर्स जैसे रोजगार पैदा होंगे. इतना ही नहीं इससे ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, वेयरहाउसिंग, कैंटीन आदि में भी कई अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे.

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केंद्र सरकार ने पिछले साल 2031 तक 17 करोड़ नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य रखा है. इसमें से दो करोड़ का लक्ष्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रखा गया है. जानकार मानते हैं कि अगर भारत ने अगले 7-10 साल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी हिस्सा 15% से बढ़ाकर 22–25% तक ले जाता है, तो इससे इस सेक्टर में 6 से 8 करोड़ नौकरियां पैदा हो सकती हैं. ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर नौकरी पाने की मजबूरी में होने वाला पलायन घट सकता है. युवा आबादी को उसके स्किल पर आधारित स्थायी रोजगार मिल सकता है.
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एमएसएमई को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने का मौका
भारत में करीब 6.3 करोड़ एमएसएमई हैं, जो देश के 30% जीडीपी, 45% निर्यात और 11 करोड़ से अधिक रोजगार का बेस हैं, पर इनमें से बहुत कम ही सीधे वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़े हैं. इस डील से लोकल से ग्लोबल तक की छलांग लगाने का मौका है. मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में फैक्ट्री खोल रही हैं, वो अकेले सब कुछ नहीं बना सकती हैं. उन्हें कंपोनेंट सप्लायर, पैकेजिंग यूनिट, मशीन पार्ट्स बनाने वाले, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबल करने वाले और केमिकल इनपुट सप्लायर की जरूरत पड़ेगी. यहां पर एमएसएमई या स्टार्टअप्स उनसे सप्लाई चेन के हिस्से के तौर पर सीधे जुड़ सकते हैं. उनकी कमाई केवल घरेलू मुद्रा में ही नहीं बल्कि डॉलर्स और यूरो में हो सकती है.
यह वही मॉडल है जिसने जर्मनी के मितेसटड (Mittelstand) और चीन के छोटे औद्योगिक शहरों को ग्लोबल ताकत बनाया था. जर्मनी की लघु एवं मध्यम आकार की कंपनियों (एसएमई) को मितेसटड के नाम से भी जाना जाता है. जर्मनी के बिजनेस की सफलता का आधार एसएमई हैं , जो जर्मनी की 99 फीसद से अधिक कंपनियों का समूह है. जर्मनी में आर्थिक उत्पादन का आधे से अधिक इन्हीं कंपनियों से आता है और ये करीब 58.5 प्रतिशत रोजगार सृजित करती हैं. क्वालिटी, स्टैंडर्ड और टेक्नोलॉजी अपग्रेड होने से एमएसएमई की उत्पादकता और मार्जिन दोनों बढ़ेंगे.
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टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्किल अपग्रेडेशन
अब तक भारत की सबसे बड़ी पहचान रही है सस्ती मजदूरी और आईटी सर्विस. लेकिन मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट का सही मायने में फायदा तब होगा जब केवल असेंबली लाइन पर नहीं बल्कि डिजाइन, इंजीनियरिंग, आरऐंडडी, प्रोसेस इनोवेशन आदि पर भी ये आगे बढ़े. यूरोपीय कंपनियां भारत में अपने प्लांट लगाएंगी तब वो अत्याधुनिक मशीनरी, ऑटोमेशन सिस्टम, क्लालिटी कंट्रोल टेक्नोलॉजी, ग्रीन मैन्युफैक्चिरिंग मॉडल आदि लाएंगी. इससे भारतीय इंजीनियरों, टेक्निशियनों और मजदूरों को जॉब पर रहते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग मिलेगी और यह किसी भी कौशल उन्नयन मिशन (स्किल अप्रेडेशन मिशन) से कहीं अधिक प्रभावी होगा.
इसका असर यह होगा कि भारत हाई वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनेगा. प्रतिस्पर्धा बढ़ने से भारतीय कंपनियां भी खुद की टेक्नोलॉजी अपग्रेड करेंगी. भारत के सामने यहां औद्योगिक प्रतिस्पर्धा चीन, वियतनाम और मैक्सिको (अमेरिका के सबसे बड़े स्पलायर में से एक) जैसी कंपनियों से भी आगे जाने का होगा.
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कंज्यूमर से सप्लायर की राह
आज भारत की आर्थिक वृद्धि मुख्य रूप से घरेलू उपभोग पर टिकी है. बेशक यह एक मजबूत आधार है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है. दीर्घकालिक और तेज विकास के लिए निर्यात आधारित ग्रोथ मॉडल को अपनाना जरूरी है, जैसा कि चीन, साउथ कोरिया और वियतनाम जैसे देशों ने किया. अब अगर यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते से स्पलाई चेन शिफ्ट होने का काम तेज हुआ तो इसका भारत के लिए मतलब होगा कि यहां से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स, मशीनरी, फॉर्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, ग्रीन एनर्जी उपकरणों के सेक्टर में तेजी से निर्यात बढ़ेगा. जानकारों के मुताबिक अगले 8-10 साल में भारत का निर्यात 800 अरब डॉलर से बढ़कर एक ट्रिलियन तक पहुंच सकता है. इससे वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2% से बढ़कर 5% के करीब पहुंच सकती है. इसका सीधा फायदा रुपये के अवमूल्यन से भी जुड़ा होगा. रुपये में मजबूती आएगी और भारत कंज्यूमर से सप्लायर की राह पर चल पड़ेगा.
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े यटियर-2, टियर-3 सिटी में नौकरियां
भारत में औद्योगिक विकास दिल्ली-एनसीआर, कोलकाता, मुंबई-पुणे, चेन्नई, बेंगलुरु, अहमदाबाद जैसे महानगर और बड़े शहर तक ही सिमटा रहा है. मोदी सरकार राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम के तहत चरणबद्ध तरीके से 11 प्रमुख औद्योगिक गलियारों का विकास कर रही है. इसके अलावा मोदी कैबिनेट ने 12 नए औद्योगिक स्मार्ट शहरों को मंजूरी दी है, जो 10 राज्यों में स्थित होंगे.
लेकिन मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट का असली असर तब दिखेगा जब नए औद्योगिक क्लस्टर उभरेंगे, जैसे- यूपी: नोएडा-ग्रेटर नोएडा, कानपुर-लखनऊ बेल्ट; बिहार: गया-मुजफ्फरपुर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर; मध्य प्रदेश: इंदौर-पीथमपुर; ओडिशा: पारादीप-कटक; आंध्र-तेलंगाना: विशाखापत्तनम-श्रीसैलम बेल्ट; राजस्थान: नीमराना-भिवाड़ी; तमिलनाडु: होसुर-कोयंबटूर.
इन औद्योगिक क्लस्टर्स के बनने का मतलब होगा कि टियर-2 और टियर-3 शहरों में नौकरियां पैदा होंगी. इससे स्थानीय युवाओं को अपने जिले में ही रोजगार मिल सकेगा. हाउसिंग, स्कूल, अस्पताल, ट्रांसपोर्ट और सर्विस सेक्टर का विस्तार होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में औद्योगिक पैसा पहुंचेगा. यानी औद्योगिक विकास महानगरों से आगे बढ़ कर देश के सुदूर गांव-देहातों तक पहुंचेगा.
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शहरों और गांवों की जिंदगी कैसे बदलेगी?
अब जब इन छोटे शहरों, कस्बों तक फैक्ट्री पहुंचेगी तो यह उसके गेट तक तो सीमित नहीं रहेगी. इससे गांवों के किसानों की आय, युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को रोजगार, शिक्षा के स्तर में सुधार और स्किल ट्रेनिंग के साथ-साथ हाउसिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी सकारात्मक बदलाव लाएगा. बेशक सबकुछ बदलेगा. बड़ी संख्या में शहरों की ओर हो रहे पलायन पर बहुत हद तक विराम लगेगा. अपने जिले में अगर फैक्ट्री और इंडस्ट्रियल पार्क होंगे तो उसका फायदा वहां के युवाओं को ही सबसे अधिक होगा. साथ ही शहर पर आबादी का बढ़ता दबाव भी कम होगा. संयुक्त परिवारों से न्यूक्लियर फैमिली की मजबूरी कम होगी. वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और सबसे बड़ी बात की स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. कुल मिलाकर इस मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट का स्थानीय समाज पर व्यापक सकारात्मक असर पड़ेगा.
माना जा रहा है कि उद्योगों के बढ़ने से आनेवाला दशक बड़ी संख्या में रोजगार के सृजन का दशक होगा. यह क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक स्थिरता को बरकरार रखते हुए पूरी दुनिया में अपना दमदार असर छोड़ने का दशक होगा.साथ ही यह 2047 तक देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य हासिल करने का भी मजबूत रास्ता होगा जहां यूपी के बलिया से राजस्थान के बाड़मेर, कर्नाटक के बेलगावी से छत्तीसगढ़ के बस्तर और असम के बोंगइगांव से कश्मीर के बारामूला तक भारत की तस्वीर बदलेगी.
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