तमिलनाडु में जब TVK चीफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार को 'खाली खजाना' मिला है. इस पर पूर्व सीएम एमके स्टालिन ने कहा था कि तमिलनाडु का कर्ज सीमा के भीतर है.
मुख्यमंत्री बनने के एक महीने बाद विजय सरकार ने तमिलनाडु के कर्ज को लेकर एक व्हाइट पेपर जारी किया है. इसमें आकलन किया गया है कि तमिलनाडु सरकार पर 13 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है. यह भी अनुमान लगाया है कि अब तमिलनाडु में हर बच्चा पहले से ज्यादा कर्ज के साथ पैदा हो रहा है.
पैदा होते ही बच्चे पर कितना कर्ज?
व्हाइट पेपर में बताया गया है कि तमिलनाडु सरकार पर 1 अप्रैल 2021 तक 5.13 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था. मार्च 2026 तक यह बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है.
इसमें यह कहा गया है कि 2020-21 में तमिलनाडु में हर व्यक्ति पर 51,115 करोड़ रुपये का कर्ज था. 2025-26 तक यह दोगुने से ज्यादा बढ़कर 1,28,934 रुपये हो गया है. इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु में पैदा होने वाला हर बच्चा अब ज्यादा कर्ज के साथ पैदा हो रहा है.

इसमें गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों के साथ भी तुलना की गई है. इसके मुताबिक, गुजरात में पैदा होने वाला हर बच्चा 70,798 रुपये के कर्ज के साथ पैदा हो रहा है. महाराष्ट्र में 77,569 रुपये तो कर्नाटक में 1,11,375 रुपये के कर्ज के साथ बच्चा जन्म ले रहा है. इसका मतलब हुआ कि तमिलनाडु में पैदा होने वाला हर बच्चा बाकी राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा कर्जदार है.
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लेकिन पैदा होते ही कर्ज कैसे?
असल में 'पैदा होते ही कर्ज' वाली बात इसलिए कही जाती है, ताकि आसानी से समझ में आ सकें. अब तमिलनाडु सरकार पर 10 लाख करोड़ का कर्ज है तो इसे आसान भाषा में समझाने के लिए प्रति व्यक्ति कर्ज में बांट दिया गया है. इसके लिए कुल सरकारी कर्ज को तमिलनाडु की आबादी से भाग दिया जाता है.
इसलिए इसे सरल भाषा में कहा जाता है कि जो बच्चा पैदा हुआ, उसके हिस्से का कर्ज 1.28 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसका मतलब यह कतई नहीं हुआ कि बच्चा सच में कर्ज लेकर पैदा हुआ है.
प्रति व्यक्ति कर्ज असल में किसी व्यक्ति की देनदारी का सटीक अनुमान नहीं है, बल्कि यह किसी देश या राज्य की आर्थिक सेहत को मापने का एक पैमाना है. हालांकि, इसका इस्तेमाल अक्सर आर्थिक पैमाने की बजाय राजनीतिक बयानों के लिए किया जाता है. कर्ज को लोगों के हिस्से के तौर पर बताने से यह ज्यादा वास्तविक लगता है.
व्हाइट पेपर में और क्या सामने आया?
व्हाइट पेपर में बताया गया है कि तमिलनाडु पर कुल कर्ज वैसे तो 10 लाख करोड़ रुपये है. लेकिन सारी देनदारियां मिला दी जाएं तो यह 13.18 लाख करोड़ रुपये हो जाता है.
कर्ज बढ़ने के कारण तमिलनाडु के खजाने पर बड़ा बोझ भी बढ़ रहा है. हर साल हजारों करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज चुकाने पर खर्च हो रहे हैं. तमिलनाडु सरकार ने 2021-22 में 41,564 करोड़ रुपये का ब्याज चुकाया था. 2025-26 में यह बढ़कर 67,050 करोड़ रुपये हो गया. यानी, हर दिन लगभग 184 करोड़ रुपये का ब्याज सरकार भर रही है.

व्हाइट पेपर में कहा गया है कि तमिलनाडु पर कर्ज बढ़ रहा है और बुजुर्ग आबादी भी, जो बड़ी चिंता की बात है. 2010 तक तमिलनाडु की 10 फीसदी आबादी बुजुर्ग थी. 2031 तक बुजुर्ग आबादी बढ़कर 18 फीसदी से ज्यादा होने का अनुमान है. इतना ही नहीं, बुजुर्ग आबादी जहां बढ़ रही है तो वहीं कामकाजी लोग कम हो रहे हैं. 2021 तक तमिलनाडु में कामकाज करने वालों की आबादी 66 फीसदी से ज्यादा थी. 2036 तक यह घटकर 63.6 फीसदी होने की अनुमान है.
बुजुर्ग आबादी बढ़ने का मतलब हुआ कि डिपेंडेंसी रेशियो बढ़ेगा. इससे सरकारी खर्च बढ़ता है. जबकि, कामकाजी आबादी घटने का मतलब हुआ कि सरकार के टैक्स कलेक्शन में गिरावट आना.
सरकार ने व्हाइट पेपर लाने के पीछे का मकसद बताते हुए कहा कि किसी समस्या का सुलझाने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसे सही तरीके से मापा जाए और ईमानदारी से पेश किया जाए.
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