देश में जैसे-जैसे बिजली की मांग और खपत बढ़ रही है, बिल महंगा हो रहा है, लोगों का ध्यान सस्ते स्रोतों की ओर जा रहा है, जैसे कि रूफटॉप सोलर (Rooftop Solar System), जिसके लिए सरकारें योजनाएं भी चला रही हैं और सब्सिडी भी दे रही हैं. चूंकि शुरुआत में इसका कॉस्ट थोड़ा महंगा होता है, इसलिए पीएम सूर्य घर योजना (PM Surya Ghar Yojana) जैसी मदद बड़े काम आती है, जिसमें 3 किलोवाट तक के सोलर सिस्टम के लिए 78,000 रुपये तक की सब्सिडी मिलती है.
बहरहाल, भारतीय मिडिल क्लास परिवारों के लिए सोलर सिस्टम लगाने का सीधा उद्देश्य होता है- बिजली बिल के टेंशन से मुक्ति. एक बार का खर्च और फिर वर्षों तक बिजली बिल का झंझट खत्म. रूफटॉप सोलर लगवाने की राह में सबसे पहला सवाल आता है, शुरुआती खर्च का, लागत का. ऐसे में सरकारी सब्सिडी स्कीम बड़े काम आती है.
कितने दिनों में निकल आती है लागत?
सवाल ये है कि सोलर रूफटॉप की लागत कितने दिन में ऊपर हो जाएगी.... इस सवाल पर सोलरस्क्वायर (SolarSquare) की CEO और को-फाउंडर श्रेया मिश्रा ने NDTV को बताया कि भारत में रूफटॉप सोलर सिस्टम की लागत आमतौर पर 3-5 साल के भीतर वसूल हो जाती है और ये कमोबेश 25-27 वर्षों तक बिजली पैदा करते रहते हैं. उन्होंने कहा, 'प्रभावी रूप से, अपने शुरुआती निवेश की वसूली के बाद परिवारों को लगभग 20-22 वर्षों तक मुफ्त बिजली मिलती है.' तो आइए इसका हिसाब-किताब भी समझ लेते हैं.
रूफटॉप सोलर का अर्थशास्त्र चार प्रमुख कारकों पर निर्भर करता है
- इंस्टॉलेशन की लागत
- सरकारी सब्सिडी
- मासिक बिजली की खपत
- बिजली की लोकल दरें
उद्योग जगत के एक्सपर्ट्स की मानें तो हर महीने 300-500 यूनिट बिजली की खपत करने वाला एक सामान्य शहरी परिवार आमतौर पर 3 किलोवाट (kW) से 5 किलोवाट का रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाता है. सोलरस्क्वायर के अनुसार, देश में औसतन 1 किलोवाट का रूफटॉप सोलर सालाना लगभग 1,400-1,450 यूनिट बिजली पैदा करता है.
1 किलोवाट वाला सोलर सिस्टम = सालाना 1400 से 1450 यूनिट बिजली
इसका मतलब ये हुआ कि....
- 3 किलोवाट का सिस्टम सालाना लगभग 4,200-4,350 यूनिट पैदा कर सकता है.
- 5 किलोवाट का सिस्टम सालाना लगभग 7,000-7,250 यूनिट पैदा कर सकता है.
7-10 रुपये प्रति यूनिट बिजली का भुगतान करने वाले परिवारों के लिए सालाना बचत काफी अधिक हो जाती है. हर महीने करीब 400 यूनिट की खपत करने वाला परिवार बिजली पर सालाना 40,000-50,000 रुपये खर्च कर सकता है.
यदि दरें बढ़ती रहीं, तो 25 वर्षों में ये बिल 10 लाख रुपये को पार कर सकता है. सोलर कंपनियों का तर्क है कि रूफटॉप सिस्टम इस लागत के एक बड़े हिस्से को खत्म कर सकते हैं.
सब्सिडी के बाद कितना आएगा खर्च
लंबे समय तक इंस्टॉलेशन में लगने वाला शुरुआती खर्च सबसे बड़ी बाधा हुआ करता था. यहीं पर सब्सिडी अब बदलाव ला रही है. PM सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के तहत, केंद्र सरकार आवासीय रूफटॉप सोलर सिस्टम के लिए 78,000 रुपये तक की सब्सिडी दे रही है. कुछ राज्य अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दे रहे हैं. अतिरिक्त सब्सिडी की बात करें तो सोलरस्क्वायर के अनुसार,
- उत्तर प्रदेश सरकार 30,000 रुपये तक देती है.
- दिल्ली सरकार 30,000 रुपये तक देती है.
- असम सरकार 45,000 रुपये तक देती है.
- अन्य राज्यों में भी कुछ स्कीम्स का लाभ मिलता है.

कई मिडिल क्लास परिवारों के लिए, ये इंस्टॉलेशन कॉस्ट को काफी कम कर देता है. जैकसन ग्रुप (JAKSON Group) में सोलर मॉड्यूल्स और सेल्स बिजनेस के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO गगन चानना ने कहा कि हार्डवेयर की गिरती कीमतों ने भी इसके सामर्थ्य में सुधार किया है.
उन्होंने कहा, 'परिवारों के लिए सोलर ऊर्जा की ओर बढ़ने का इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा.' सबसे महत्वपूर्ण चीज 'पेबैक पीरियड' (लागत वसूली की अवधि) है. रूफटॉप सोलर की इकोनॉमी में सबसे महत्वपूर्ण संख्या पेबैक पीरियड है- यानी बिजली की बचत के माध्यम से शुरुआती निवेश को वसूलने में लगने वाला समय. उद्योग के अनुमानों के अनुसार अधिकांश घरों के लिए यह लगभग 4-5 वर्ष है.
पेबैक पीरियड = शुरुआती सोलर लागत / वार्षिक बिजली बचत
- इस प्वाइंट के बाद, मामूली मेंटेनेंस कॉस्ट को छोड़कर पैदा होने वाली बिजली प्रभावी रूप से मुफ्त होती है.
- कमाई का ये लंबा अवसर ही रूफटॉप सोलर को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाता है.
- सोलर पैनल दो दशकों से अधिक समय तक हर महीने बिजली के बिल कम करते रहते हैं.
लेकिन यह रिटर्न पूरी तरह क्वालिटी पर निर्भर करता है. अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि इंस्टॉलेशन की क्वालिटी खराब हो तो रूफटॉप सोलर से पैसा बनाने की कोई गारंटी नहीं है.
...तो फिर आपको क्या करना चाहिए?
उपभोक्ताओं को सबसे सस्ती कोटेशन के बजाय सिस्टम की गुणवत्ता, इंजीनियरिंग मानकों और बिक्री के बाद की सेवा पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी जाती है.
मिश्रा ने कहा कि ग्राहकों को यह जांचना चाहिए कि क्या इंस्टॉलर उत्पादन की गारंटी देते हैं, 'शैडो एनालिसिस' करते हैं और टिकाऊ माउंटिंग स्ट्रक्चर का उपयोग करते हैं जो बिना जंग या लीकेज की समस्या के 25 वर्षों तक चल सकें.
चानना ने कहा कि खरीदारों को यह सत्यापित करना चाहिए कि सोलर मॉड्यूल ALMM सूची के तहत सरकार द्वारा अनुमोदित हैं या नहीं और पैनल के खराब होने की दीर्घकालिक दर को समझना चाहिए.
सिस्टम का आकार भी मायने रखता है. बहुत बड़े सिस्टम अनावश्यक रूप से लागत बढ़ाते हैं, जबकि बहुत छोटे सिस्टम बचत की क्षमता को कम कर देते हैं.
एक्सपर्ट सिस्टम का साइज चुनने से पहले कम से कम एक वर्ष के बिजली बिलों की वैल्युएशन करने की सलाह देते हैं.
अंत में एक और विषय पर बात कर लेना जरूरी है कि मॉनसून यानी बारिश के मौसम में क्या होगा. जानकारों का कहना है कि वार्षिक सोलर उत्पादन का कैलकुलेशन में पहले से ही मॉनसून के मौसम को शामिल किया जाता है. हालांकि बारिश के महीनों में बिजली उत्पादन कम हो जाता है, लेकिन गर्मियों का मजबूत उत्पादन साल भर इसकी भरपाई कर देता है.
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