देश की तमाम एयरलाइंस में पायलटों की कमी जगजाहिर है. इस कमी को दूर करने के लिए केंद्र की एक हाई लेवल कमिटी ने सिम्युलेटर-आधारित पायलट लाइसेंस का प्रस्ताव दिया है. NDTV के पास इस ड्राफ्ट रिपोर्ट की कॉपी है, जिसमें प्रस्ताव दिया गया है कि पायलटों के लिए 200 घंटे की बजाय 100 से 120 घंटों की ट्रेनिंग ही जरूरी हो. 'मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस' (MPL) की भी बात है और कुछ और नियमों में भी ढील दिए जाने का प्रस्ताव दिया गया है. इंडिगो, एयर इंडिया, अकासा एयर, स्पाइसजेट और अन्य एयरलाइंस से इस ड्राफ्ट पर प्रतिक्रिया देने को कहा गया है. इसके बाद समिति, DGCA रेगुलेटर के प्रमुख को अंतिम रिपोर्ट सौंप सकती है.
पिछले साल (दिसंबर 2025 में) जब इंडिगो में पायलट संकट हुआ तो हजारों लोगों को खामियाजा भुगतना पड़ा था. एविएशन रेगुलेटर DGCA ने पायलटों की थकान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नए FDTL (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन) नियम लागू किए थे, जिसकी समय रहते तैयारी नहीं करने के चलते इंडिगो एयरलाइन ने 2,000 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसिल कर दी थी.
नियमों के तहत पायलटों का साप्ताहिक आराम 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे कर दिया गया था और रात की लैंडिंग सीमित कर दी गई. इससे इंडिगो के पास उड़ानों के लिए पायलट पूरे नहीं पड़ रहे थे. साल 2024 में विस्तारा एयरलाइन को भी ऐसी ही दिक्कत झेलनी पड़ी थी.
केंद्रीय कमिटी ने क्या दिया है प्रस्ताव?
केंद्रीय समिति ने पायलट लाइसेंस का एक नया विकल्प प्रस्तावित किया है, जिसका मकसद पायलटों की कमी को दूर करना है. इस ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार, कमिटी ने क्रू की कमी को दूर करने के लिए सिम्युलेटर-आधारित पायलट लाइसेंस का प्रस्ताव दिया है. इस नए विकल्प के तहत ज्यादातर ट्रेनिंग सिम्युलेटर में होगी और कैडेट्स का असली विमान उड़ाने में लगने वाला समय कम हो जाएगा.
जिस 'मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस' (MPL) पर चर्चा हो रही है, उसे 2006 में संयुक्त राष्ट्र के 'इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइज़ेशन' ने शुरू किया था. पारंपरिक पायलट-ट्रेनिंग के तरीकों के अलावा यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के कई देशों ने इस सिस्टम को अपनाया है.

क्या होता है MPL और सिम्युलेटर-आधारित लाइसेंस सिस्टम?
विमानन नियामक DGCA की एक समिति ने जिस सिम्युलेटर-आधारित पायलट लाइसेंस का प्रस्ताव दिया है, उसे तकनीकी भाषा में मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस (MPL) भी कहा जाता है, जो पूरी तरह योग्यता (Competency) और सिम्युलेटर ट्रेनिंग पर केंद्रित होता है.
फ्लाइट सिम्युलेटर एक हाई-टेक मशीन या केबिन होता है, जो हवा में नहीं, बल्कि जमीन पर ही बिल्कुल असली कमर्शियल फ्लाइट (जैसे एयरबस A320 या बोइंग 737) के कॉकपिट जैसा दिखता और महसूस होता है. इसमें बड़ी स्क्रीन, मोशन सिस्टम (हिलने-डुलने की तकनीक) और असली कंट्रोल लगे होते हैं. इसमें ट्रेनी पायलट को असली उड़ान जैसा अनुभव होता है और वो खराब मौसम, इंजन फेल होना या इमरजेंसी लैंडिंग जैसी जटिल स्थितियों का बिना किसी खतरे के प्रैक्टिस कर सकता है और प्रशिक्षित हो सकता है.
मंजूरी मिली तो क्या फायदे होंगे?
इस प्रस्ताव के पीछे का मुख्य उद्देश्य ट्रेनिंग का समय कम करना और देश में पायलटों की कमी दूर करना है. दरअसल, असली विमान उड़ाने के घंटों की अनिवार्यता कम होने से नए कैडेट कम समय में तैयार होकर सीधे एयरलाइंस को सेवा दे पाएंगे. वे कॉकपिट (कमर्शियल विमानों) में जाने के योग्य हो जाएंगे.
एयरलाइंस की जरूरत के मुताबिक ये तैयारी फायदेमंद होगी. पारंपरिक CPL यानी कमर्शियल पायलट लाइसेंस में पायलट एकल (Single-pilot) विमान उड़ाना सीखता है. जबकि MPL मॉडल को सीधे एयरलाइंस के बड़े विमानों में दो पायलटों (Multi-crew) के तौर पर एक साथ काम करने के लिए ही डिजाइन किया गया है.
एयर इंडिया और इंडिगो जैसी बड़ी एयरलाइंस लगातार सैकड़ों नए विमान खरीद रही हैं, लेकिन देश के फ्लाइंग स्कूल हर साल पर्याप्त संख्या में पायलट तैयार नहीं कर पा रहे हैं. इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने से पायलटों की पाइपलाइन तेज होगी.
सरकारी समिति की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है, 'अगर इसे मज़बूत रेगुलेटरी निगरानी और इंडस्ट्री के सहयोग से लागू किया जाए... तो (नया लाइसेंसिंग तरीका) मैनपावर की कमी को कम कर सकता है.'
आखिर में फायदा आपका भी है. पायलटों की कमी की वजह से फ्लाइट कैंसिल होने जैसी स्थिति पैदा नहीं होगी और एयर पैसेंजर्स को परेशान नहीं होना पड़ेगा.
देश में पायलटों की कमी, इंडिगो झेल चुका है बड़ा संकट
रिपोर्ट के अनुसार, देश में पायलटों की कमी है. देश की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो में हर नैरो-बॉडी प्लेन के लिए सिर्फ 7.6 पायलट हैं, जो ग्लोबल औसत (लगभग 10) से काफी कम है.
इंडिगो ने दिसंबर में 2,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी थीं क्योंकि वो पायलटों के काम के घंटों को सीमित करने वाले नए नियमों के लिए ठीक से योजना नहीं बना पाई थी, जिससे पायलटों की कमी हो गई थी.
MPL, जिसका इस्तेमाल कतर एयरवेज और यूरोप की easyJet जैसी एयरलाइंस में को-पायलट की भर्ती के लिए किया जाता है, पायलट के करियर की शुरुआती स्टेज में अलग-अलग एयरलाइंस के बीच आसानी से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. इससे भारतीय एयरलाइंस की पायलटों के नौकरी छोड़ने (टर्नओवर) से जुड़ी चिंताएं कम हो सकती हैं.
नए प्रस्ताव की कुछ चुनौतियां भी! AFTO ने जताई चिंता
सरकार के प्रस्ताव में कहा गया है कि सिमुलेटर पर ज़्यादा निर्भरता से 'ऑपरेशनल रिस्क कम हो सकता है' और साथ ही कैडेट्स को मुश्किल और इमरजेंसी स्थितियों को संभालने की ज़्यादा फोकस्ड प्रैक्टिस मिल सकती है.
इसमें आगे कहा गया है कि इस विकल्प से ट्रेनिंग की सख्ती कम नहीं होती, बल्कि ट्रेनिंग का ज़ोर स्ट्रक्चर्ड सिमुलेशन की तरफ शिफ्ट हो जाता है. इसे 'कम एयरक्राफ्ट फ़्लाइट घंटों की वजह से शॉर्टकट' नहीं समझा जाना चाहिए.
हालांकि, इस प्लान पर कुछ चिंताएं भी जताई गई हैं. 9 जून के एक पत्र के अनुसार, एसोसिएशन ऑफ फ्लाइट ट्रेनिंग ऑर्गेनाइज़ेशन्स का कहना है कि असली एयरक्राफ्ट में समय कम करने से कैडेट्स की हैंड्स-ऑन फ्लाइंग स्किल्स और अचानक आने वाली स्थितियों में फैसला लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है. इस ग्रुप ने रेगुलेटर से मांग की है कि ड्राफ्ट में प्रस्तावित 100 से 120 घंटों के बजाय असली एयरक्राफ्ट में कम से कम 150 घंटे की ट्रेनिंग अनिवार्य की जाए.
ड्राफ्ट रिपोर्ट में भी ये माना गया है कि कुछ पायलटों में हैंड्स-ऑन फ्लाइंग की समझ कमजोर हो सकती है और अचानक आने वाली स्थितियों को अकेले संभालने का आत्मविश्वास कम हो सकता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक ईमेल से पता चला है कि अगस्त में हुई बातचीत के दौरान इंडिगो ने पायलट लाइसेंसिंग प्रस्ताव का समर्थन किया था. फ्लाइट ऑपरेशन्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट असीम मित्रा ने लिखा था कि सुरक्षा को आधार मानते हुए एविएशन के विकास को सपोर्ट करने के लिए MPL की जरूरत थी.
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