'हमारे पास तेल के कुएं नहीं हैं...' ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद की एक रैली में की थी, जिसमें उन्होंने लोगों से पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम करने की अपील की थी. वह इसलिए क्योंकि पश्चिम एशिया का संकट गहराता जा रहा है. अमेरिकी हमले के कारण ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है, जिस कारण तेल और गैस आ नहीं पा रहा है.
ईरान से जंग का भारत पर ज्यादा असर इसलिए भी पड़ रहा है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगाते हैं. सरकार का कहना है कि होर्मुज के रास्ते 30% कच्चा तेल आता है. बाकी 70% तेल दूसरे रास्तों से आ रहा है.
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के मुताबिक, जनवरी की तुलना में मार्च में भारत ने लगभग 10 फीसदी कच्चा तेल कम निर्यात किया. हैरान करने वाली बात यह है कि जनवरी की तुलना में मार्च में निर्यात 10 फीसदी कम हुआ लेकिन इसके लिए खर्च ज्यादा हुआ. जनवरी में भारत ने कच्चे तेल के निर्यात पर 86,087 करोड़ रुपये खर्च किए थे. जबकि, मार्च में 1,20,201 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील भी इसलिए की है, क्योंकि ईरान युद्ध के कारण कच्चा तेल महंगा होता जा रहा है. इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है, क्योंकि इसकी खरीद के लिए डॉलर खर्च करना पड़ता है.
कभी भी 'बेवफा' हो सकता है पेट्रोल-डीजल!
दुनिया में 31 फीसदी तेल का उत्पादन पश्चिम एशियाई देशों में ही होता है. पश्चिम एशियाई देशों को सबसे ज्यादा ताकतवर उनका तेल ही बनाता है. ऐसे में जब भी इन मुल्कों में कोई संकट होता है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है.
ईरान जंग के बाद जिस तरह के हालात बने हैं और होर्मुज स्ट्रेट बंद पड़ा है, उससे माना जा सकता है कि भारतीयों के लिए पेट्रोल और डीजल कभी भी 'बेवफा' हो सकता है.
ऐसे में क्या किया जाए फिर? इसके लिए यही तरीका है कि पेट्रोल-डीजल की बजाय इलेक्ट्रिक व्हीकल का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. भारत में अब इलेक्ट्रिक व्हीकल का क्रेज बढ़ रहा है लेकिन उतना नहीं, जितना बढ़ना चाहिए. अब भी बहुत से लोग पेट्रोल और डीजल पर चलने वाली गाड़ियां ही खरीद रहे हैं.
इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीद रहे हैं लोग?
अच्छी बात यह है कि अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री बढ़ रही है. वाहन पोर्टल के डेटा के मुताबिक, अप्रैल में कुल 2,39,025 इलेक्ट्रिक व्हीकल बिके. यह अप्रैल 2025 की तुलना में 41 फीसदी ज्यादा था. अप्रैल 2025 में 1,69,360 EV बिके थे. इनमें 2-व्हीलर, 3-व्हीलर और 4-व्हीलर सब शामिल थे.
इस डेटा के मुताबिक, इलेक्ट्रिक कार की बिक्री में जबरदस्त ग्रोथ दर्ज की गई. अप्रैल 2026 में कुल 23,265 EV बिकीं. जबकि, अप्रैल 2025 में 13,409 EV बिकी थीं. यानी, अप्रैल 2025 की तुलना में अप्रैल 2026 में 73 फीसदी ज्यादा EV बिकीं.
टाटा मोटर्स ने 8,500 से ज्यादा EV बेचीं. वहीं, महिंद्रा एंड महिंद्रा ने 5,394 गाड़ियां बेचीं.
IBEF की रिपोर्ट बताती है कि 2024-25 में भारत में 20 लाख से ज्यादा EV बिकी थीं. जबकि, 2023-24 में लगभग 17 लाख EV की बिकी थीं.

भारत का EV मार्केट कितना बड़ा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटो मार्केट है. ऑटो मार्केट में अब EV का मार्केट लगातार बढ़ता जा रहा है.
IBEF की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक दुनियाभर में EV का मार्केट 917 अरब डॉलर का था. 2034 तक यह बढ़कर लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर का होने की उम्मीद है. यानी, 2026 से 2034 के बीच ग्लोबल EV मार्केट 20.43% की दर से बढ़ने का अनुमान है.
इसी दौरान भारत के EV मार्केट में भी जबरदस्त तेजी आने की उम्मीद है. 2025 तक भारत का EV मार्केट 3.71 अरब डॉलर का था. 2034 तक ये बढ़कर 191 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच जाएगा. यानी, इसमें हर साल लगभग 55% की ग्रोथ होने की उम्मीद है.
EV मार्केट को बढ़ाने के लिए सरकार भी नई स्कीम लेकर आ रही है. भारत में EV की मैनुफैक्चरिंग बढ़ाने के मकसद से पिछले साल ही केंद्र सरकार ने एक नई स्कीम शुरू की थी. इसके तहत, जो कोई भी ऑटो कंपनी में भारत में 4,150 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, उसे तीन साल 8,000 गाड़ियां विदेश से आयात करने पर सिर्फ 15% इंपोर्ट ड्यूटी देनी होगी.
लोग ज्यादा से ज्यादा EV खरीदें, इसके लिए भी सरकार सब्सिडी देती है. पिछले साल ही सरकार ने EV पर GST को 12% से घटाकर 5% कर दिया था.
EV के लिए तैयार है भारत?
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) की रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल में जितनी फोर-व्हीलर बिकीं, उनमें से सिर्फ 5.77% ही इलेक्ट्रिक थीं.
हालांकि, सरकार EV की बिक्री को बढ़ावा दे रही है और अब लोग इसे जमकर खरीद भी रहे हैं. सरकार का टारगेट है कि 2030 तक प्राइवेट कारों में 30%, कमर्शियल व्हीकल में 70%, बसों में 40% जबकि टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर में 80% तक की बिक्री EV की हो. अगर ऐसा हुआ तो 2030 तक भारत की सड़कों पर लगभग 8 करोड़ EV होंगी.
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती EV के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है. अभी ज्यादातर लोग EV खरीदने से इसलिए बचते हैं, क्योंकि भारत में EV का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत मजबूत नहीं है.
इस साल 27 मार्च को केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि देशभर में 6 साल में 27,737 EV पब्लिक चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं. इनमें से 22,753 ही चालू हैं. ये आंकड़े 1 मार्च तक के हैं.
EV के लिए पब्लिक चार्जिंग स्टेशन का इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ा है. 2020-21 में सिर्फ 314 चार्जिंग स्टेशन थे लेकिन अब 27 हजार से ज्यादा हैं. लेकिन इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसपोर्टेशन एंड डेवलपमेंट पॉलसी (ITDP) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में अब भी 235 EV के लिए सिर्फ एक चार्जिंग स्टेशन है.

सरकार लगातार चार्जिंग स्टेशन का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रही है. दो दिन पहले ही केंद्र सरकार ने PM e-Drive स्कीम के तहत 4,874 नए EV चार्जिंग स्टेशन को बनाने की मंजूरी दी है. इस पर 503 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जाएंगे.
कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) की रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक भारत को 13 लाख से ज्यादा चार्जिंग स्टेशन की जरूरत होगी. इसका मतलब हुआ कि हर साल 4 लाख से ज्यादा चार्जिंग स्टेशन बनाने होंगे.
भारत में EV की बिक्री भी बढ़ रही है और इंफ्रास्ट्रक्चर भी, लेकिन इसके बढ़ने की रफ्तार धीमी है. भारत ने 2030 तक 30% इलेक्ट्रिक कारों का टारगेट रखा है. S&P ग्लोबल की एक रिपोर्ट बताती है कि 2030 के टारगेट को पूरा करने के लिए भारत को EV का पेनेट्रेशन रेट बढ़ाना होगा. यानी अभी भारत की सड़कों पर हर साल सिर्फ 2% इलेक्ट्रिक कारें ही बढ़ रही हैं. अगर 30% के टारगेट को पूरा करना है तो यह सालाना 3.8% के आसपास होना चाहिए.
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