ग्लोबल ऑयल मार्केट में शुक्रवार, 22 मई को फिर हलचल देखने को मिली. लगातार तीन दिनों की गिरावट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है. इसकी बड़ी वजह ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता को लेकर बढ़ती अनिश्चितता है. ईरान के यूरेनियम भंडारण रुख ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे सप्लाई पर दबाव और कीमतों में तेजी की आशंका फिर गहरा गई है.
ब्रेंट और WTI क्रूड में जोरदार उछाल
शुक्रवार के शुरुआती एशियाई कारोबार में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude Futures) करीब 1.9% बढ़कर $104.52 प्रति बैरल पर पहुंच गया. वहीं WTI क्रूड करीब 1.5% चढ़कर $97.81 प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा. हालांकि पूरे सप्ताह की बात करें तो ब्रेंट अभी भी 4% से ज्यादा नीचे बना हुआ है, लेकिन शुक्रवार की रिकवरी ने बाजार का मूड बदल दिया.
ईरान के रुख से क्यों बढ़ी चिंता?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अपने यूरेनियम को देश के अंदर ही रखना चाहता है. इससे अमेरिका के साथ चल रही बातचीत लंबी खिंच सकती है. निवेशकों को डर है कि अगर समझौता देर से होता है, तो ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर दबाव बना रहेगा और कीमतें और ऊपर जा सकती हैं.
सप्लाई रिस्क अभी भी बरकरार
तेल बाजार में सबसे बड़ी चिंता सप्लाई को लेकर बनी हुई है.स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज (Strait of Hormuz), जो दुनिया का अहम एनर्जी शिपिंग रूट माना जाता है, वहां तनाव के कारण तेल और LNG सप्लाई प्रभावित हो रही है. यह रास्ता पहले ग्लोबल तेल और गैस ट्रांसपोर्ट का बड़ा हिस्सा संभालता था. अगर यहां दबाव बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में और उछाल संभव है.
IEA का रेड जोन अलर्ट
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने चेतावनी दी है कि जुलाई-अगस्त 2026 तक तेल बाजार रेड जोन में जा सकता है. इसकी वजह है
- गर्मियों में बढ़ती फ्यूल डिमांड
- मिडिल ईस्ट से नए एक्सपोर्ट की कमी
- ग्लोबल तेल भंडार में गिरावट
- सप्लाई चेन पर लगातार दबाव
IEA के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो दुनिया को सप्लाई शॉक का सामना करना पड़ सकता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है इतना अहम?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे अहम तेल ट्रांजिट पॉइंट माना जाता है. यहां किसी भी तरह का व्यवधान सीधे ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतों को प्रभावित करता है. मौजूदा तनाव ने कमर्शियल स्टॉक्स पर दबाव बढ़ाया है और इससे एनर्जी मार्केट में उतार-चढ़ाव बनी हुई है.
निवेशकों और भारत पर क्या असर?
अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं तो भारत जैसे आयातक देशों पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर पेट्रोल-डीजल कीमतों, ट्रांसपोर्ट कॉस्ट, महंगाई और कई सेक्टरों पर पड़ सकता है. फिलहाल निवेशकों की नजर ईरान-अमेरिका वार्ता और मिडिल ईस्ट सप्लाई स्थिति पर टिकी है.
तेल बाजार फिलहाल भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई संकट और बढ़ती मांग के बीच फंसा हुआ है. ईरान के रुख ने बाजार में नई चिंता पैदा कर दी है. आने वाले हफ्तों में अगर बातचीत आगे नहीं बढ़ती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
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