Gold Vs Silver Vs Copper: दुनियाभर के कमोडिटी बाजारों में सोने और चांदी के अलावा अब एक और इंडस्ट्रियल मेटल ने रिकॉर्ड तोड़ तेजी के साथ खलबली मचा दी है. यहां कॉपर यानी तांबे की बात हो रही है. लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर (तांबा) की कीमतें ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गई हैं. अमेरिका की ओर से संभावित आयात टैरिफ की आशंका, ग्लोबल स्तर पर घटती माइन सप्लाई, AI और डेटा सेंटर्स समेत इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के कारण कॉपर की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है. केडिया एडवायजरी का मानना है कि इस साल यानी 2026 के बाकी बचे 4 महीने के दरमयान भी कॉपर में तेजी का रुख मजबूती से बरकरार रह सकता है.
वहीं दूसरी ओर सोने और चांदी की बात करें तो MCX पर सोना 1.53 लाख/10 ग्राम के भाव पर, जबकि चांदी 2.40 लाख/किलो के करीब ट्रेड करती दिखी.
LME पर कॉपर का रिकॉर्ड, MCX पर क्या हाल?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में LME पर तीन महीने का कॉपर बेंचमार्क रिकॉर्ड ऊंचाई को छूते हुए 14,500 से 14,600 डॉलर प्रति मीट्रिक टन के पार निकल गया है. जानकारों का अनुमान है कि जिस तरह से वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो रही है, उसे देखते हुए कॉपर के लिए 15,000 डॉलर का स्तर छूना भी आसान हो सकता है. चीन में मैन्युफैक्चरिंग सीजन की शुरुआत और स्टेट ग्रिड की मजबूत मांग से भी इस मेटल को जबरदस्त सपोर्ट मिल रहा है.
दूसरी ओर घरेलू कमोडिटी मार्केट MCX पर कॉपर 1,387-1,388 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बना हुआ है और इसने अभी तक 1,400 रुपये से ऊपर नया ब्रेकआउट हासिल नहीं किया है. हालांकि केडिया एडवायजरी के अनुसार, इसका लॉन्ग टर्म आउटलुक पॉजिटिव बना हुआ है.
अमेरिका के टैरिफ नियमों और सप्लाई में खिंचाव का असर
कमोडिटी एक्सपर्ट और केडिया एडवायजरी के MD अजय केडिया के मुताबिक, अमेरिका में संभावित टैरिफ नियमों के डर से ट्रेडर्स ने भारी मात्रा में रिफाइंड कॉपर की खेप अमेरिका भेजनी शुरू कर दी है, जिससे LME वेयरहाउसों में स्टॉक तेजी से घटा है. इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर खदानों से उत्पादन घटने और डिमांड-सप्लाई में आए बड़े अंतर ने शॉर्ट-टर्म सप्लाई संकट को और गहरा दिया है, जिससे कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है.
भारतीय बाजार और मैन्युफैक्चरिंग पर असर
ग्लोबल मार्केट में तेजी के बावजूद पिछले कुछ दिनों में भारतीय रुपये में मजबूती के कारण घरेलू बाजार में MCX कॉपर की कीमतों में आंशिक स्थिरता रही है और यह करीब 1,387-1,388 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है. हालांकि, भारत अपनी रिफाइंड कॉपर की अधिकांश जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, ऐसे में वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने से देश में मैन्युफैक्चरिंग लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का बजट बढ़ने के साथ व्यापार घाटे पर दबाव पड़ सकता है.
आगे कैसी रहेगी कॉपर की चाल?
अजय केडिया के मुताबिक, एआई डेटा सेंटर, ग्रिड विस्तार, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में निवेश इसकी खपत को तेजी से बढ़ा रहे हैं. टैरिफ से जुड़े इन्वेंट्री बदलाव और शॉर्ट कवरिंग ने इस तेजी को और बढ़ावा दिया है. हालांकि मासिक चार्ट तकनीकी रूप से खिंचे हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन कीमतें प्रमुख मूविंग एवरेज से ऊपर बनी हुई हैं, जो कंसोलिडेशन के बाद एक तेजी के लंबे समय के रुख और आगे की बढ़त का समर्थन करती हैं. उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों के लिए भी कॉपर में तेजी का रुख बरकरार है. बुनियादी कमियां (शॉर्टेजेस), शॉर्ट टर्म कंसोलिडेशन और बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद और ज्यादा लाभ का संकेत दे रहे है.
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