AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी जिंदगी का हिस्सा हो चुका है, लेकिन क्या आप इस बात पर विश्वास कर पाएंगे कि दुनियाभर में रोड, रेलवे, टेलीकॉम, पावर जैसे इंफ्रा प्रोजेक्ट पर जितने पैसे खर्च किए जा रहे हैं, उनकी तुलना में एआई में ज्यादा निवेश किए जाएंगे. AI अब सिर्फ टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं रह गया है. ये तेजी से ग्लोबल इकोनॉमी में देशों की स्थिति और तरक्की को प्रभावित करने वाला अहम फैक्टर बनता जा रहा है. IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने सिंगापुर में बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिए अपनी स्पीच में कहा, 'चाहे आप इसे पसंद करें, नापसंद करें या इससे डरें, AI आ चुका है.'
उन्होंने कहा कि AI का असर इतना बड़ा हो सकता है कि इसमें होने वाला ग्लोबल निवेश, GDP के मुकाबले रेलवे, पावर ग्रिड या टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क बनाने में हुए निवेश से भी ज्यादा हो सकता है.
ग्लोबल ट्रेड में AI हार्डवेयर की हिस्सेदारी 10% से ज्यादा
IMF MD के मुताबिक, AI हार्डवेयर और उससे जुड़े टेक प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी दुनिया के कुल गुड्स ट्रेड में 10% से ज्यादा हो चुकी है. ये हिस्सा लगातार बढ़ रहा है.
यानी AI का असर सिर्फ सॉफ्टवेयर या टेक कंपनियों तक सीमित नहीं है. इसके लिए जरूरी हार्डवेयर और दूसरे टेक प्रोडक्ट्स अब ग्लोबल ट्रेड का एक बड़ा हिस्सा बन चुके हैं.
IMF-वर्ल्ड बैंक की बैठक में AI सबसे अहम मुद्दों में
अगले हफ्ते बैंकॉक में होने वाली IMF और वर्ल्ड बैंक की सालाना बैठक में ग्लोबल इकोनॉमी पर AI के बढ़ते प्रभाव को प्रमुख मुद्दों में रखा गया है.
IMF के 191 सदस्य देशों के वित्त मंत्री और सेंट्रल बैंक के गवर्नर इस बैठक में अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता और तेजी से बदलते दौर पर चर्चा करेंगे.
बैठक में खास तौर पर तीन बड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहने वाले हैं:
AI का तेज विस्तार, महंगी ऊर्जा और रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचता सार्वजनिक कर्ज.
ग्लोबल इकोनॉमी पर दो विपरीत ताकतों का असर
IMF के मुताबिक, इस समय ग्लोबल इकोनॉमी दो विपरीत दिशाओं में खिंच रही है.
एक तरफ ऊर्जा की सप्लाई में कमी से नकारात्मक झटका लग रहा है, जबकि दूसरी तरफ AI से डिमांड में बढ़ोतरी सकारात्मक झटका दे रही है.
इन दोनों ताकतों का असर अलग-अलग देशों और अर्थव्यवस्थाओं पर अलग तरीके से पड़ रहा है.
IMF-वर्ल्ड बैंक सालाना बैठक का एजेंडा
- AI का तेज विस्तार
- ऊर्जा की बढ़ती कीमतें
- सार्वजनिक कर्ज का रिकॉर्ड स्तर
- राजकोषीय घाटा और बढ़ती डेट-सर्विसिंग लागत
- ग्लोबल इकोनॉमी में बढ़ती अनिश्चितता
- महंगी ऊर्जा से महंगाई और ग्रोथ पर दबाव
ऊर्जा की बढ़ती लागत के साथ उर्वरक, भोजन और जरूरी औद्योगिक इनपुट की कीमतें भी बढ़ रही हैं. इस साल के सुपर अल नीनो ने खाद्य सुरक्षा को लेकर जोखिम और बढ़ा दिया है.
इसका असर दो तरफ दिखाई दे रहा है. एक तरफ महंगाई बढ़ने का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक विकास दर पर असर पड़ रहा है.
खाड़ी क्षेत्र से तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं.
रिकॉर्ड पब्लिक डेट भी बड़ी चिंता
सालाना बैठक में बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता फिस्कल डेफिसिट, सार्वजनिक कर्ज का रिकॉर्ड स्तर और कर्ज चुकाने की बढ़ती लागत भी चर्चा के अहम मुद्दे होंगे.
ग्लोबल पब्लिक डेट दूसरे विश्व युद्ध के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर के करीब पहुंच चुका है. इसके जल्द ही GDP के 100% से ज्यादा होने की संभावना जताई गई है.
यानी सरकारों के सामने एक तरफ आर्थिक विकास को बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बढ़ते कर्ज और उसके ब्याज का बोझ भी बढ़ रहा है.
युद्धों ने भी ग्लोबल ग्रोथ को दिया झटका
इस साल आर्थिक विकास पर सबसे ज्यादा दबाव उन अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है, जो युद्ध से प्रभावित हैं. यूक्रेन में युद्ध पांचवें साल में पहुंच चुका है, जबकि खाड़ी क्षेत्र में जारी युद्ध आठवें महीने में है.
इसके अलावा दुनिया के कई दूसरे हिस्सों में भी संघर्ष जारी हैं. इन संघर्षों का मानवीय नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा है.
ऐसे समय में IMF और वर्ल्ड बैंक की बैठक में AI को लेकर बढ़ती संभावनाओं के साथ ऊर्जा, महंगाई, कर्ज और युद्ध से पैदा हुई चुनौतियों पर भी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मंथन करेंगी.
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