- एसबीआई की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की तीसरी तिमाही में जीडीपी 8 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकती है.
- ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और अन्य गतिविधियों से खपत बढ़ी है जबकि शहरी इलाकों में खरीदारी में तेजी आई है.
- भारत 27 फरवरी से जीडीपी के बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करने जा रहा है.
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही शानदार खबर आई है. दुनिया भर में चल रही आर्थिक उथल-पुथल के बावजूद भारत की विकास दर (GDP Growth) रफ्तार पकड़ रही है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल की तीसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 8 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर सकती है, जो यह दिखाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है.
गांव और शहर दोनों जगह बढ़ी डिमांड
एसबीआई के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में खेती और अन्य कामों में तेजी आने से वहां खपत बढ़ी है. वहीं, पिछले त्योहारी सीजन के बाद से शहरों में भी लोग जमकर खरीदारी कर रहे हैं. एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार की मदद और लोगों की बढ़ती आमदनी की वजह से घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है, जो हमारी अर्थव्यवस्था को ताकत दे रही है.
27 फरवरी को होगा बड़ा बदलाव
भारत अपनी जीडीपी मापने के तरीके में एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है. अब जीडीपी का बेस ईयर (Base Year) 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया जाएगा. इसकी नई सीरीज 27 फरवरी को जारी होगी. इस बदलाव का मकसद डिजिटल शॉपिंग और नई सर्विस सेक्टर जैसी एडवांस इकोनॉमिक एक्टिविटी को सही तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है. इससे देश की आर्थिक तस्वीर और साफ होकर उभरेगी.
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह
जीडीपी कैलकुलेशन के नए तरीके में अब जीएसटी (GST) रिकॉर्ड, ई-वाहन रजिस्ट्रेशन और नेचुरल गैस की खपत जैसे बारीक आंकड़ों को भी शामिल किया जाएगा. इससे इनफॉर्मल सेक्टर का बेहतर आकलन हो सकेगा. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस रिफॉर्म के बाद भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी जगह और मजबूत कर सकता है.
वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत का दम
जहां दुनिया भर में तनाव, डिजिटलीकरण एंड डीकार्बोनाइजेशन जैसे कारण आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है, वहीं भारत की विकास दर स्थिर है. ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भी भारत की विकास दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है. घरेलू मांग और सरकार की सही नीतियों के कारण भारत वैश्विक मंदी के संकेतों के बीच भी मजबूती से खड़ा है.
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