ईरान-इजरायल, अमेरिका के बीच 28 फरवरी को जंग शुरू हुई. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हुआ. तेल के साथ गैस की सप्लाई रुकी और इसके बाद ही दुनियाभर के मार्केट में टेंशन की शुरुआत हो गई. इससे भारत देश भी अछूता नहीं रहा. इस टेंशन की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को जरूरी सामान और सप्लाई से जुड़ी परेशानी यानी सप्लाई साइड शॉक का सामना करना पड़ा.
NDTV के शो ‘द नंबर्स गेम' में देश के चार बड़े एक्सपर्ट नीलकंठ मिश्रा, आशिमा गोयल, समीर अरोड़ा और राजीव मंत्री ने भारत के सामने खड़ी 9 बड़ी आर्थिक चुनौतियों को आसान तरीके से समझाया. साथ ही कैसे देश इस समस्या से बाहर निकल सकता है, इसके बारे में बताया. चलिए ग्राफिक्स की मदद से समझते हैं कि आगे का रास्ता भारत के लिए कितना कठिन है.

india economic crisis due to middle east tension
1. पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े
कुछ ही दिन पहले पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई. हालांकि, दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत में ये बढ़ोतरी बहुत कम है. यूक्रेन और मिडिल-ईस्ट वॉर के बाद जहां मलेशिया में पेट्रोल 56%, पाकिस्तान में 55% और अमेरिका में 45% तक महंगा हुआ, वहीं भारत में ये इजाफा सिर्फ 3.2% से 3.4% के बीच रहा है. हालांकि एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्रा ने कहा, "ये 3 रुपये की बढ़ोतरी तो सिर्फ शुरुआत है. हमारा अनुमान है कि तेल कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कम से कम 15 रुपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी करनी होगी. बाजार को नई वैश्विक स्थिति के साथ तालमेल बिठाना ही होगा."

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2. तेल कंपनियों को हो रहा घाटा
टेंशन के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है, नतीजन कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में $100 प्रति बैरल के पार बनी हुई हैं. भारतीय तेल कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम लागत से कम कीमत पर ईंधन बेच रही हैं, जिससे उन्हें रोजाना करीब 1,000 से 1,600 करोड़ रुपये का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ रहा है. दिग्गज निवेशक समीर अरोड़ा ने कहा, "ये कहना गलत है कि सिर्फ ये कंपनियां डूब रही हैं, असल में ये भारत का नुकसान है. इस 1,000 करोड़ के दैनिक घाटे को चार हिस्सों में बांटना चाहिए. पहला, ओएनजीसी जैसी तेल कंपनियां मुनाफा कम करें. दूसरा, सरकार टैक्स घटाए. तीसरा, कंपनियां थोड़ा बोझ खुद उठाएं और चौथा, कुछ बोझ जनता पर डाला जाए."

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3. थोक महंगाई दर (WPI) में बड़ा उछाल
ईंधन और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर देश की थोक महंगाई दर पर पड़ा है. अप्रैल में आए आंकड़ों के अनुसार, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की महंगाई दर अचानक उछलकर 8.30% पर पहुंच गई है, जो पिछले कुछ तिमाहियों से काफी हद तक कंट्रोल में थी. एक्सपर्ट आशिमा गोयल ने समझाया कि, "थोक महंगाई दर में बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों का होता है, इसलिए इसमें तेज उछाल दिख रहा है. लेकिन राहत की बात ये है कि देश की एनर्जी इंटेंसिटी अब 70 के दशक जैसी नहीं है. सरकार की पॉलिसी की वजह से इसका पूरा असर फौरी तौर पर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ता."

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4. खुदरा महंगाई दर (CPI) पर बढ़ता दबाव
हालांकि खुदरा महंगाई दर अभी 3.40% से मामूली बढ़कर 3.48% पर है, लेकिन थोक महंगाई की इस बढ़ोतरी का असर जल्द ही आम आदमी की थाली और रोजमर्रा के सामानों तक पहुंच सकता है. कच्चे तेल के महंगे होने से प्लास्टिक पैकेजिंग और एडिबल ऑयल की कीमतें बढ़ने लगी हैं. नीलकंठ मिश्रा ने कहा, "अगर कच्चे तेल की कीमतें पूरे साल औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती हैं, तो वित्तीय वर्ष 2027 के लिए हमारा खुदरा महंगाई का अनुमान 4% से बढ़कर 5.3% तक जा सकता है."

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5. डॉलर के मुकाबले ऑल टाइम लो पर रुपया
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है. फरवरी में जो रुपया प्रति डॉलर 91 के स्तर पर था, वो अब गिरकर 95.93 के ऑल टाइम लो पर आ चुका है. रुपये की इस कमजोरी का असर भारत के इंपोर्ट पर होता है. भारत को दूसरे देशों से जरूरती सामान खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर भुगतान में देने होंगे. इस संकट पर समीर अरोड़ा ने सलाह देते हुए कहा कि, "हमे रुपये को 100 के स्तर तक गिरने का इंतजार नहीं करना चाहिए. क्योंकि हम 180 डॉलर बिलियन का इंपोर्ट करते हैं, रुपये में सिर्फ 1% की गिरावट से हमारा भारी नुकसान होता है. सरकार को एनआरआई बॉन्ड्स या दूसरे उपायों के जरिए बैंकों को आगे लाना चाहिए, जिससे देश में डॉलर आएं और करेंसी स्टेबल हो सके."

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6. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार निकाल रहे पैसा
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों (FIIs) का पैसा निकालना लगातार जारी है. जंग के बाद यानी मार्च से 13 मई तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 23.44 बिलियन डॉलर की कैपिटल निकाल चुके हैं. एक्सपर्ट राजीव मंत्री ने कहा, "वैश्विक स्तर पर कॉस्ट ऑफ कैपिटल बदल चुकी है. ब्याज दरें बढ़ने से हर इमर्जिंग मार्केट को अलग नजरिये से देख रहे हैं. विदेशी निवेशकों को वापस लाने का बस एक ही तरीका है कि हम सप्लाई-साइड रिफॉर्म्स की रफ्तार को थामने ना दें."

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7. कमर्शियल एलपीजी के दाम बढ़े
ग्लोबल स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में लगी आग का असर घरेलू रसोई गैस (LPG) और खेती-किसानी के लिए जरूरी फर्टिलाइजर पर भी पड़ रहा है. अगर सरकार इन कीमतों का पूरा बोझ जनता पर नहीं डालती है, तो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ना तय है. कमर्शियल गैस सिलेंडर की बात करें तो मार्च 2026 में एक सिलेंडर की कीमत 1884.50 रुपये थी, जो अप्रैल में बढ़कर 2,078.50 और मई में 3071.50 रुपये हो गई. इस मुद्दे पर एक्सपर्ट नीलकंठ मिश्रा ने कहा, "पिछले साल के औसत 70 डॉलर के मुकाबले तेल का 15 डॉलर प्रति बैरल महंगा होना भारत की जीडीपी के 1% के बराबर का झटका है. अभी के समय तेल $100 के पार है, यानी हमारी अर्थव्यवस्था पर जीडीपी का करीब 2% का दबाव है. सरकार फर्टिलाइजर और एलपीजी पर सब्सिडी देकर जनता को कुछ हद तक बचाएगी, लेकिन इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा."

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8. शेयर बाजार में गिरावट का दौर जारी
मिडिल ईस्ट का टेंशन, टूटते रुपये और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के चलते सेंसेक्स में गिरावट का दौर जारी है. जंग से पहले 27 फरवरी को जहां 81287 के लेवल पर था जो अब गिरकर 15 मई को 75238 के स्तर पर है. हालांकि एक्सपर्ट आशिमा गोयल ने पॉजिटिव माहौल का जिक्र करते हुए बताया, "शॉर्ट टर्म में बाजार में पैनिक हो सकता है, लेकिन भारत की ताकत उसकी डायवर्सिटी है. वैश्विक स्तर पर चल रहीं एआई (AI) की चर्चाएं अभी बबल भी हो सकता है जो कल को फट जाए. ऐसे में भारत अपनी कई प्लानिंग पर काम कर रहा है, जो लॉन्ग टर्म में अच्छे रिजल्ट दे सकती है."

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9. रेटिंग एजेंसियों ने दी जीडीपी ग्रोथ के लिए चेतावनी
दुनियाभर की उथल-पुथल और मिडिल ईस्ट में चल रही टेंशन को देखते हुए दुनिया की बड़ी रेटिंग एजेंसियों और ब्रोकरेज फर्मों ने भारत की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) को बड़ी चेतावनी दी है. मूडीज ने भारत के विकास दर अनुमान 6.8% से 6.0% कर दिया है. ओईसीडी ने देश के ग्रोथ अनुमान को सीधे 1.5% कम करके 7.6% से 6.1% कर दिया. हालांकि मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि युद्ध जल्द खत्म होगा और स्थितियां सुधरेंगी, देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 6.2% से बढ़कर 6.7% रह सकती है. विकास दर को लेकर आशिमा गोयल ने कहा, "ये करीब 1% की गिरावट का अनुमान है, जैसा हमने यूक्रेन वॉर के समय भी देखा था. लेकिन हमें ये याद रखना चाहिए कि हम बहुत ऊंची ग्रोथ रेट से नीचे आ रहे हैं. इस संकट का सामना करने के लिए हमें चालू खाता घाटे को सुधारने पर फोकस करना होगा."
एक्सपर्ट इस बात पर सहमत दिखे कि भारत की अर्थव्यवस्था की नींव अभी भी मजबूत है. अगर सरकार शॉर्ट‑टर्म में रुपये की गिरावट को काबू करने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए, जैसे बॉन्ड में टैक्स छूट देकर ज्यादा डॉलर जुटाना और साथ ही लॉन्ग‑टर्म में ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देना, तो भारत इस संकट से निकल सकता है.
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