दुनिया के एक छोटे कोने में मौजूद बड़ी सी एक दुनिया. हमेशा लोगों से आबाद रहने वाली दुनिया, जिसका ज़िक्र उड़ती धूलों, समंदर की लहरों, चढ़ते सूरज की किरणों, नदी के बहाव और गुरूब-ए-आफ़ताब को निहारती नज़रों में देखने को मिलता है. यानी हर उस होंठ पर जिसको क़िस्सों और कहानियों से मोहब्बत है और इस ख़ूबसूरत दुनिया के बारे में बताने को आतुर रहता है. कई मामलों में इस दुनिया को नए दौर का रहनुमा कह कर पुकारा गया. जिस भी तरफ़ नज़र उठाओ सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ूबसूरत एहसास की वजहें. हर ओर से आने वाली मधुर स्मृति और सदियों पुरानी यादों को समेटी हुई आवाजें, जिसका एहसास बहरे कान को भी हो जाए. नज़ारे ऐसे कि नाबीना शख़्स भी मुस्कुरा दे. बगीचे ऐसे, जिसमें सारे आलम के आला क़िस्म के फूलों की मौजूदगी. जितने ज़्यादा रंग-बिरंगे बग़ीचे, उतने ही क़िस्म के अतरंगी जंगल भी, रेगिस्तान भी, पहाड़ भी, समंदर तो बताया ही लेकिन उसी समंदर में लहरों से लड़ते ख़्वाब भी.
सब कुछ शानदार चल रहा होता है. सुबह होती है, शाम होती है और ढेर सारी ख़ुशियां लुटाते हुए ज़िंदगी तमाम भी होती रहती है. सब अपने ख़्वाबों में अलग-अलग तरह से खोए रहते हैं. कुछ लोग आराम कर रहे थे, कुछ शरीर पसीने से लथपथ थे, कुछ दिल तेज़ी से धड़क कर रहे, कुछ आंखें उम्मीद से चमक रहीं थीं, कुछ होंठ मुस्कुरा रहे थे, कुछ मुखड़े फूल जैसे खिले हुए थे, कुछ चेहरे किसी गहरी सोच में गुम थे, कुछ जगहों पर शोर था, कुछ इलाक़ों में बहुत कुछ कर गुज़रने का ज़ोर था. कहने का मतलब यही है कि कहीं वीरानियत के मंज़र नहीं थे. जो भी जहां भी था, जिस हाल में था, वक़्त गुज़र रहा था.
इक रोज़ शाम बड़ी धीमी गुज़र रही थी. दिन सूखा था. बारिश के मौसम आ गए थे, लेकिन पानी की उम्मीद नहीं जगी थी. ऐसे प्यासे मौसम में तूफ़ान आया. यह तूफ़ान कोई आम तूफ़ान नहीं था, यह ऐसा बवंडर था, जो अपने साथ कई चीज़ें उड़ा रहा था. या फिर यूं कहें कि अपने दायरे में आने वाली हर उस चीज़ को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहा था, जो उड़ाई जा सकती थीं. इसी ज़ोर ज़बरदस्ती के बीच किसी कारखाने में जल रही भट्टी से चिंगारी आ गई. इसी दरमियान एक लापरवाह चपरासी वाले खुले हुए दफ़्तर से कुछ काग़ज़ के टुकड़े आ गए. कहीं से आग में शामिल होने के लिए घी के रूप में भी कुछ आ गया.
ख़ैर, आगे की कहानी सुनिए. तूफ़ान के असर में आकर उड़ने वाली सभी चीज़ें एक साथ खूबसूरत बगीचे की तरफ़ बढ़ीं और कुछ उस जंगल की तरफ भी, जिसमें लोगों के साथ अनबोल प्राणी भी अपनी ख़ुशियों की वजहें ढूंढ़ते थे. इसके बाद क्या हुआ होगा? अंदाज़ा लगाइए... हां, हां! आप जो सोच रहे हैं, वही हुआ. चिंगारी गिरी और भड़क उठी आग, उसका साथ देने के लिए तमाम चीज़ें पहले से ही मौजूद थीं. ऐसा लगा हवा भी थोड़ी उग्र हुई.
कुछ वक़्त बाद आग पर काबू पाया गया. लेकिन उसका असर कई अरसों तक देखने को मिला. सुरीलेपन से माहौल को ख़ुशनुमा बनाने वाली आवाज़ों की जगह खामोशी छा गई. खामोश रहने वाली ख़ास इमारतों पर चढ़कर लोग शोर मचाने लगे.
इस पूरी गहमागहमी के बीच सबसे ज़्यादा नुक़सान किसने झेला मालूम है? वही, जिनका सहारा कोई नहीं होता, वे ख़ुद होते हैं या उनका ख़ुदा होता है. इंसानों की समझ के मुताबिक, नासमझ प्राणी. तूफ़ान और आग की मनमानी चलने के बाद, जंगल के पेड़ों पर बने कई घोंसले उजड़ गए थे. वे महज घोंसले नहीं होते हैं, वे उनका संसार होते हैं. कुछ घोंसले हवा में उड़कर गायब हो गए, कुछ पर आग का असर हुआ. अब उन पंछियों का सहारा सिर्फ आसमान रह जाता है. उसी को वे अपना घर समझने लगते हैं, लेकिन वो उनका घर नहीं होता है, वो होता है वक़्त से लड़ने का ज़रिया, संघर्ष करते रहने का की वजह. ऊपर से पानी बरस रहा होता है, भीगी-भीगी हवाएं चल रही होती हैं, तेज़ धूप निकल रही होती है. सुबह, दोपहर, शाम और रात सब उसी आसमान और ज़मीन के बीच में पहले जैसी होती है, लेकिन सिर ढंकने के लिए छत नहीं होती. बारंबार आवाज़ लगाने के बाद भी इन पंछियों की आवाज़ सुनने वाले लोग ना के बराबर होते हैं. जो सुन रहे होते हैं, वो सिर्फ़ सुन सकते हैं, उनका आशियाना नहीं बना सकते. जो उनकी दुनिया फिर से सजा सकते हैं, वे उनकी आवाज़, चीख़ में तब्दील होने के बाद भी सुनना नहीं चाहते हैं. वे आसमान को ओढ़कर ख़ामोश ज़मीन बन जाते हैं और... इन सबके बीच पंछी तड़प रहे होते हैं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)