IDBI बैंक के प्राइवेटाइजेशन पर बड़ा फैसला हुआ है. सरकार ने 52878 करोड़ रुपये में बैंक की करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी बेचने को मंजूरी दे दी है. बैंक में अब Canada Inc कंपनी की 60.72% हिस्सेदारी होगी. वहीं सरकार की इसमें 15 फीसदी हिस्सेदारी बचेगी, जबकि LIC की करीब 19 फीसदी हिस्सेदारी बचेगी. अगले 3 साल तक बैंक का नाम नहीं बदला जाएगा.
सरकार के पास अब 34% हिस्सेदारी
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट में लिए गए फैसलों के बारे में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान बताया कि कैबिनेट ने IDBI बैंक की स्ट्रैटजिक रिस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी मिली है. उन्होंने कहा, इसके लिए एक स्ट्रैटजिक पार्टनर सेलेक्ट किया गया है और इस पार्टनर की मदद से बैंक में नई पूंजी डाली जाएगी.
केंद्रीय मंत्री के मुताबिक देश के फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में ये सबसे बड़े FDI का माध्यम हो सकता है. इस रीस्ट्रक्चरिंग के बाद भारत सरकार और एलआईसी का IDBI बैंक में 34% हिस्सेदारी बनी रहेगी.
IDBI बैंक में कितनी हिस्सेदारी बेचेगी LIC और सरकार?
केंद्र सरकार और LIC की IDBI बैंक में 94.72 फीसदी हिस्सेदारी है. इसमें केंद्र सरकार की 45.47 फीसदी, जबकि LIC की 49.24% हिस्सेदारी है.
जैसा कि पहले से प्रस्ताव था, केंद्र सरकार अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है, जबकि LIC अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है. इस तरह कुल 60.72% हिस्सेदारी कनाडा इंक कंपनी को बेची जा रही है.
डील पूरा होते ही केंद्र सरकार के पास बैंक में 15 फीसदी, जबकि LIC के पास 19 फीसदी हिस्सेदारी बच जाएगी. कनाडा.इंक कंपनी को 60.72% हिस्सेदारी के साथ मैनेजमेंट कंट्रोल यानी बैंक प्रबंधन पर नियंत्रण भी मिल जाएगा.
CCEA ने दी विनिवेश को मंजूरी
आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने IDBI बैंक के रणनीतिक विनिवेश को मंजूरी दी थी. समिति की बैठक में M/s Canada Inc. को IDBI बैंक का रणनीतिक खरीदार मंजूर किया गया, जिसकी पैरेंट कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लिमिटेड है.
बैंक में हिस्सेदारी बेचने के लिए दो चरणों में बोली प्रक्रिया अपनाई गई. इस प्रक्रिया में कई स्तरों पर जांच और फैसले लिए गए. इसमें अंतर-मंत्रालयी समूह (IMG), विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप (CGD) और कैबिनेट मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह वाले वैकल्पिक तंत्र (AM) की भूमिका रही.
कैसे तय की गई बैंक में 60.72% हिस्सेदारी की कीमत?
ऐसे सौदों में पहले से कोई निश्चित न्यूनतम बोली कीमत तय नहीं होती. बोली लगाने वाली कंपनियां खुद बैंक का मूल्यांकन करती हैं और गोपनीय तरीके से सीलबंद लिफाफे में अपनी बोलियां जमा करती हैं.
इसके अलावा, स्वतंत्र एजेंसियां भी बैंक की उचित कीमत का आकलन करती हैं. उनके मूल्यांकन को बोली की उचितता जांचने के लिए तुलनात्मक आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इससे यह आकलन करने में मदद मिलती है कि कंपनियों की ओर से लगाई गई बोली बैंक की उचित कीमत के अनुरूप है या नहीं.
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