Gratuity Payment Rules India: नौकरीपेशा इंसान के लिए ग्रेच्युटी सिर्फ एक बोनस नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद भविष्य की फाइनेंशियल सेफ्टी का एक मजबूत आधार है. लेकिन क्या जानते हैं कि आपकी एक छोटी सी गलती या नियमों की जानकारी ना होना आपके हाथों से लाखों रुपये फिसलवा सकता है? हालांकि नए लेबर कोड के आने से कई नियम बद रहे हैं, जिससे कर्मचारियों को आसानी होगी.
अक्सर कर्मचारी ग्रेच्युटी को लेकर कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनका खामियाजा उन्हें रिटायरमेंट या नौकरी बदलते समय भुगतना पड़ता है. तो फिर चलिए इस खबर में आपको बताते हैं कि ग्रेच्युटी क्या है और वो कौन सी गलतियां हैं जिनसे आपको हर हाल में बचना चाहिए.
ग्रेच्युटी क्या है?
ग्रैच्युटी वो अमाउंट है जो कोई कंपनी या संस्था अपने कर्मचारी को तब देती है, जब वो कर्मचारी लंबे समय तक ईमानदारी से काम करने के बाद नौकरी छोड़ता है या रिटायर होता है. ये पैसा सैलरी का हिस्सा नहीं होता, बल्कि कंपनी की ओर से दिया गया अलग से फायदा होता है.
इन गलतियों को करने से बचें
- 5 साल के नियम को हल्के में लेना
ग्रेच्युटी पाने की पहली शर्त है किसी एक संस्थान में कम से कम 5 साल की लगातार सर्विस. कई बार कर्मचारी दूसरी नौकरी के चक्कर में 4 साल 10 महीने या 4 साल 11 महीने में नौकरी छोड़ देते हैं. यहां वो सबसे बड़ी गलती करते हैं. भले ही आपने 4 साल और 11 महीने काम किया हो, लेकिन कानूनी तौर पर 5 साल का पीरियड पूरा करना जरूरी हो जाता है. ऐसे में अगर आप 5 साल से पहल नौकरी छोड़ते हैं, तो आप अपनी पूरी ग्रेच्युटी से हाथ धो बैठेंगे.

Gratuity Payment Rules India
- नॉमिनेशन फॉर्म भरने में गलती
अक्सर हम नौकरी जॉइन करते समय खूब सारे कागजों पर साइन करते हैं, जिनमें से एक फॉर्म F यानी नॉमिनेशन फॉर्म होता है. कई कर्मचारी इसमें गलत जानकारी भर देते हैं. पर याद रखें, अगर भगवान ना करे कर्मचारी के साथ कोई अनहोनी हो जाए, तो ग्रेच्युटी का पैसा किसे मिलेगा, ये आपका नॉमिनेशन ही तय करता है. इसलिए अगर नॉमिनी अपडेट नहीं है या गलत है, तो परिवार को इस पैसे के लिए कानूनी चक्कर काटने पड़ सकते हैं.
- ग्रेच्युटी कैलकुलेशन को ना समझना
क्या आप जानते हो कि आपकी ग्रेच्युटी कितनी बनेगी? लोग अक्सर मानते हैं कि ये पूरी सैलरी पर मिलती है, जबकि ऐसा नहीं है. ग्रेच्युटी सिर्फ आपकी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता पर बेस्ड होती है. इसके लिए अलग से एक फॉर्मूला (पिछली सैलरी (बेसिक + डीए) x 15/26) x कंपनी में बिताए गए साल) है. इस फॉर्मूले के बारे में पता ना होने की वजह से कर्मचारी कंपनी के दिए गए कम पेमेंट को भी सही मान लेते हैं. इसलिए जरूरी है कि आप अपनी कैलकुलेशन खुद करना सीखें.
- टैक्स नियमों को अनदेखा करना
भले ही ग्रेच्युटी एक बड़ा रिवॉर्ड है, लेकिन ये पूरी तरह टैक्स फ्री नहीं होती. प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी पर टैक्स छूट की एक फिक्स लिमिट है. अभी की बात करें तो इसकी सीमा 20 लाख रुपये है. ऐसे में ग्रेच्युटी इस सीमा से ऊपर जाती है, तो एक्सट्रा अमाउंट पर आपको इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स देना होगा.
- नौकरी से निकाले जाने पर
ग्रेच्युटी आपकी मेहनत का हक है, इसमें कोई भी शक नहीं है. पर ध्यान रखें कि इसे छीना भी जा सकता है. मान लीजिए अगर किसी कर्मचारी को चोरी, धोखाधड़ी या कंपनी को नुकसान पहुंचाने की वजह से नौकरी से निकाला जाता है, तो कंपनी के पास उसकी ग्रेच्युटी रोकने का कानूनी अधिकार होता है.
- 6. कंपनी की पॉलिसी और पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट के बीच कंफ्यूजन
भारत में दो तरह की कंपनियां होती हैं. पहली वो जो पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत आती हैं और दूसरी वो जो इसके नियमों में नहीं बंधी होती. अगर आपकी कंपनी में 10 से ज्यादा कर्मचारी हैं, तो वो इस कानून के दायरे में है. कुछ कंपनियां अपनी अलग ग्रेच्युटी पॉलिसी रखती हैं जो सरकारी नियमों से बेहतर हो सकती हैं. कर्मचारियों को ये नहीं पता होता कि वे किस लेवल में आते हैं, जिससे वो अपने हक का पूरा फायदा नहीं उठा पाते.
- नौकरी बदलने के बाद समय पर क्लेम ना करना
नौकरी छोड़ने के बाद ग्रेच्युटी के लिए क्लेम करने की एक समय सीमा होती है. हालांकि कंपनियां खुद ही सेटलमेंट कर देती हैं, लेकिन कर्मचारी को भी एक्टिव रहना चाहिए. अगर आप कई सालों तक अपनी ग्रेच्युटी क्लेम नहीं करते, तो बाद में इसका प्रोसेस और कठिन हो सकता है.
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