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54.88 लाख करोड़ रुपये स्‍वाहा! कोई मलबे में तब्‍दील, कोई डूबा बेहिसाब, ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग में कौन-सा देश कितना बर्बाद हुआ?

US-Israel Iran War Loss: इकोनॉमिक रिसर्च फर्म सोलएबिलिटी के मुताबिक, यदि यह युद्ध जल्द नहीं रुका, तो दुनिया को 3.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 290 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान हो सकता है.

54.88 लाख करोड़ रुपये स्‍वाहा! कोई मलबे में तब्‍दील, कोई डूबा बेहिसाब, ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग में कौन-सा देश कितना बर्बाद हुआ?
Iran Israel US War Economic Loss: ईरान के साथ चल रही अमेरिका-इजरायल की जंग में किस देश को ज्‍यादा नुकसान हुआ?

Iran-US-Israel War Effects: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे भीषण युद्ध (Iran-Israel-US War) ने आधी दुनिया को बर्बादी की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है. युद्ध के मैदान से उठी आग की लपटें अब केवल सरहदों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसने ग्‍लोबल इकोनॉमी की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है. रिसर्च और आंकड़े बताते हैं कि इस युद्ध की वजह से अब तक दुनिया की GDP को करीब 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. ईरान में मची तबाही से लेकर वॉल स्ट्रीट और दलाल स्ट्रीट तक, हर तरफ ऐसा हाहाकार मचा है. ये तबाही, बहुत बड़ी आबादी का भविष्‍य संकट में डाल सकती है. 

इस महायुद्ध ने न केवल कच्चे तेल की कीमतों (CrudeOil Prices) को आसमान पर पहुंचा दिया है, बल्कि सप्लाई चेन टूटने से दुनिया भर में महंगाई का एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिससे निकलना नामुमकिन लग रहा है. जहां ईरान अपने सर्वोच्च नेतृत्व को खोने और बुनियादी ढांचे के मलबे में तब्दील होने से सबसे ज्यादा प्रभावित देश बनकर उभरा है, वहीं खाड़ी देशों की GDP और भारत जैसे विशाल बाजारों पर भी इसकी मार किसी गहरी चोट से कम नहीं है. ये जंग केवल दो-तीन देशों की जंग नहीं रह गई है, बल्कि एक ऐसा आर्थिक संकट बन चुका है, जो तबाही के पैमाने पर किसी विश्‍वयुद्ध से कम नहीं.  

सवाल ये है कि इस तबाही में सबसे ज्यादा किसे नुकसान हुआ और कौन सा देश बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है?

ईरान: मलबे में तब्दील होता देश

इस युद्ध की सबसे भयावह कीमत ईरान चुका रहा है. सीधी सैन्य कार्रवाई और हवाई हमलों ने ईरान को मानवीय और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर तोड़ दिया है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने देश को राजनीतिक अस्थिरता में झोंक दिया है.

जान-माल के नुकसान की बात करें तो ईरान में अब तक 7,300 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और 25,000 से ज्यादा लोग घायल हैं. अस्पताल, स्कूल और ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्थल खंडहर बन चुके हैं. चैथम हाउस की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि संघर्ष नहीं रुका, तो ईरान की GDP में 10% से ज्यादा की गिरावट आएगी, जिससे देश, कई दशक पीछे चला जाएगा.

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US: युद्ध की भारी कीमत चुका रहा अमेरिका

भले ही युद्ध ईरान की जमीन पर हो रहा हो, लेकिन अमेरिका की तिजोरी भी तेजी से खाली हो रही है. CSIS के मुताबिक, अमेरिका अब तक इस जंग में 7.49 लाख करोड़ रुपये ($80.4 बिलियन) फूंक चुका है.'फॉर्च्यून' के विश्लेषण के अनुसार, अगर ऊर्जा बाजारों और व्यापार में रुकावट जारी रही, तो अमेरिका को होने वाला कुल नुकसान 19.2 लाख करोड़ रुपये ($210 बिलियन) तक पहुंच सकता है.

खाड़ी देश: पानी और ऊर्जा का संकट

ईरान के पड़ोसी अरब देश (GCC) इस आग की तपिश सबसे ज्यादा महसूस कर रहे हैं.

  1. कुवैत और कतर: अगर अप्रैल के अंत तक युद्ध चला, तो इनकी GDP 14% तक गिर सकती है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हमलों के कारण 99% पीने का पानी (डीसैलिनेशन प्लांट) खतरे में है.
  2. UAE और सऊदी अरब: सऊदी की GDP में 3% और UAE की GDP में 5% की गिरावट का अनुमान है. अकेले UAE के शेयर बाजार को 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है.
  3. इराक: यहां के तेल क्षेत्रों में उत्पादन 70% तक गिर गया है, जो इराक की अर्थव्यवस्था की खतरे की घंटी है.

भारत पर असर: मार्केट में हाहाकार

भारत इस युद्ध का सीधा हिस्सा नहीं है, लेकिन इसके आर्थिक प्रभाव हर भारतीय की रसोई और जेब तक पहुंच रहे हैं.

  • शेयर बाजार में तबाही: युद्ध शुरू होने के बाद से भारतीय निवेशकों के करीब 37 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं.
  • महंगा तेल: कच्चा तेल जो फरवरी में $69 प्रति बैरल था, वह अप्रैल 2026 में $125.88 तक पहुंच गया है.
  • सरकारी खजाने पर बोझ: जनता को राहत देने के लिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये की कटौती की, जिससे सरकार को 1.5 लाख करोड़ रुपये का घाटा होगा.
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दुनिया के बाकी देशों में भी हाहाकार 

युद्ध के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन टूट गई है, जिससे दुनिया 1973 के तेल संकट से भी बुरे दौर में है.

  • पाकिस्तान: पाकिस्तान में स्कूलों को बंद कर 'वर्क फ्रॉम होम' लागू किया गया है.
  • श्रीलंका:  श्रीलंका ने तेल बचाने के लिए हर बुधवार सरकारी छुट्टी घोषित कर दी है.
  • फिलीपींस: फिलीपींस के राष्ट्रपति मार्कोस जूनियर ने 'नेशनल एनर्जी इमरजेंसी' का ऐलान कर दिया है.
  • चीन: चीन ने ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए चीन ने ईंधन के निर्यात पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है.

महंगाई: सिर्फ पेट्रोल-डीजल नहीं, काफी कुछ महंगा

पेट्रोलियम उत्पादों की कमी ने एक 'डोमिनो इफेक्ट' पैदा कर दिया है. केवल तेल ही महंगा नहीं है, बल्कि ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने और मैन्‍युफैक्‍चरिंग कॉस्‍ट बढ़ने से काफी कुछ महंगा हो रहा है.  

  • प्लास्टिक और टेक्सटाइल: प्लास्टिक बनाने वाला 'एथिलीन' 35% और औद्योगिक रसायन 'एक्रिलिक एसिड' 30% महंगा हो गया है. गुजरात के टेक्सटाइल हब में इनपुट कॉस्ट 50% तक बढ़ गई है.
  • खेती और भोजन: उर्वरकों (Fertilizers) की कमी के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में खाद्यान्न संकट और भीषण महंगाई पैदा होने की आशंका है.

क्या यह 'महामंदी' की आहट है?

OECD का अनुमान है कि वैश्विक विकास दर 3.3% से घटकर 2.9% रह जाएगी. इकोनॉमिक रिसर्च फर्म सोलएबिलिटी के मुताबिक, यदि यह युद्ध जल्द नहीं रुका, तो दुनिया को 3.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 290 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान हो सकता है. साफ है कि इस युद्ध में जीत किसी की भी हो, हार पूरी मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था की हो रही है.

(Research: NDTV Research Desk/ Sources: Chatham House, CSIS, UNDP, Solubility, OECD) 

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