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World Down Syndrome Day 2026: समझ और साथ से बदलेगी सोच

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 21, 2026 23:05 pm IST
    • Published On मार्च 21, 2026 15:30 pm IST
    • Last Updated On मार्च 21, 2026 23:05 pm IST
World Down Syndrome Day 2026: समझ और साथ से बदलेगी सोच

डाउन सिंड्रोम बीमारी नहीं बल्कि एक जेनेटिक स्थिति है. सही सहयोग और स्वीकार्यता के साथ हर व्यक्ति सम्मान और खुशहाल जीवन जी सकता है. विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस 2026 इसी समझ और साथ का संदेश देता है.

क्यों खास है यह दिन
21 मार्च को दुनिया भर में World Down Syndrome Day 2026 मनाया जाता है. इस साल की थीम Improve Our Support Systems यानी हमारी सहयोग प्रणाली को बेहतर बनाना है. एम्स के मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर रोहित गुप्ता बताते हैं कि डाउन सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं बल्कि एक जेनेटिक स्थिति है, जिसमें chromosome 21 की एक अतिरिक्त कॉपी होती है. ऐसे लोगों को बराबरी के अधिकार, सम्मान और अवसर मिलना जरूरी है और समाज की सोच में बदलाव ही सबसे बड़ा कदम है.

देखभाल और सही शुरुआत क्यों जरूरी

रोहित गुप्ता कहते हैं कि इस स्थिति को समझने के साथ सही देखभाल भी जरूरी है. जिन परिवारों में पहले किसी करीबी रिश्तेदार के बच्चों में यह स्थिति रही हो या जहां गर्भावस्था में जोखिम की आशंका हो, उन्हें समय रहते जांच और सलाह जरूर लेनी चाहिए. गर्भावस्था के दौरान जांच से कई मामलों में पहले ही जानकारी मिल सकती है.

उन्होंने बताया कि डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों में बदलाव मुख्य रूप से शरीर की बनावट और विकास की गति में दिखते हैं. सामान्यतः चेहरा थोड़ा सपाट होना, आंखों का आकार अलग होना और मांसपेशियों में कमजोरी जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं. इसके साथ ही बच्चों का बोलना, चलना और सीखना सामान्य बच्चों की तुलना में थोड़ा देर से होता है और बौद्धिक विकास भी धीमा हो सकता है.

ऐसे में जन्म के बाद शुरुआती थेरेपी, पढ़ाई में सहयोग और नियमित स्वास्थ्य जांच बच्चों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं. इस समस्या में मुख्य भूमिका परिवार की होती है, जो बच्चों की स्थिति के प्रति स्वीकार्यता के साथ जरूरी सहयोग और समर्थन देकर उनके विकास में मदद कर सकता है.

अकेलेपन के खिलाफ साथ जरूरी

रोहित गुप्ता कहते हैं कि जब समाज डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों को अपनाता है और उनके साथ जुड़ता है, तब वे बेहतर मानसिक और सामाजिक जीवन जी पाते हैं. उन्होंने ऐसे उदाहरण भी बताए, जहां जानकारी और समझ की कमी के कारण कुछ अभिभावक बेहद निराश हो जाते हैं. ऐसे हालात यह जरूरी कर देते हैं कि समाज में डाउन सिंड्रोम के लिए जागरूकता का माहौल बनाया जाए.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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