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क्या नेताओं का अहंकार इस दुनिया को नष्ट कर देगा?

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 14, 2026 20:59 pm IST
    • Published On जनवरी 14, 2026 20:52 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 14, 2026 20:59 pm IST
क्या नेताओं का अहंकार इस दुनिया को नष्ट कर देगा?

दूसरे विश्वयुद्ध पर केंद्रित अपनी कई खंडों की किताब 'द सेकंड वर्ल्डवॉर' के पहले खंड 'द गैदरिंग स्टॉर्म' की भूमिका में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल ने एक घटना का ज़िक्र किया था. वह बताते हैं कि उनसे अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ने पूछा कि इस युद्ध को क्या नाम दिया जाए? उन्होंने तत्काल जवाब दिया- 'ग़ैरज़रूरी युद्ध. वे लिखते हैं- 'ऐसा कोई युद्ध नहीं था जिसे रोकना इतना आसान था जितना इस युद्ध को, जिसने वह सबकुछ तहस-नहस कर दिया जो दुनिया में पुराने संघर्षों के बाद बचा हुआ था.'

दूसरे विश्वयुद्ध के बारे में कहा गया कि यह आने वाले सारे युद्धों को ख़त्म करने वाला आख़िरी युद्ध होगा. लेकिन हमने पाया कि दुनिया बार-बार युद्धों में उलझती रही. अमेरिका ने वियतनाम का बदनाम युद्ध लड़ने के अलावा इराक़-अफ़गानिस्तान सहित कई छोटे-छोटे देशों को तबाह कर दिया. भारत और चीन के बीच एक युद्ध, भारत और पाकिस्तान के बीच दो युद्ध हो गए- ऐसे युद्धों का असमाप्त सिलसिला चलता रहा.

लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं लगा था कि हम तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़े हैं. बेशक, तीसरे विश्वयुद्ध के अंदेशे को लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती रहीं. कभी कहा गया कि तीसरा विश्वयुद्ध पेट्रोल के लिए लड़ा जाएगा. फिर यह बात उछली कि पेट्रोल नहीं, पानी की कमी की वजह से तीसरा विश्वयुद्ध होगा. मगर अब हम देख रहे हैं कि राजनेताओं के टुच्चे अहंकार की वजह से दुनिया तबाही के कगार पर खड़ी है. बीते कुछ वर्षों में जैसे दुनिया का हर हिस्सा सुलग रहा है. 

रूस और यूक्रेन के बीच चार साल से युद्ध जारी है. बल्कि क़ायदे से यह युद्ध 2014 से ही टुकड़ा-टुकड़ा चलता रहा है. लेकिन 2022 से यह युद्ध एक नए दौर में दाख़िल हो गया. पहले लगता था कि यूक्रेन तीन दिन में घुटने टेक देगा. लेकिन कुछ नाटो और यूरोपीय देशों की मदद और कुछ तकनीक की वजह से युद्धों की बदलती प्रकृति के सहारे यूक्रेन अब भी पूरी तरह घुटने टेकने से इनकार कर रहा है. दुनिया ने देखा कि ज़मीन रौंदते टैंकों के सहारे चलने वाले पुराने युद्धों की जगह अब आसमान से टपकते ड्रोन युद्ध का नया मैदान बना रहे हैं और आने वाला दौर ऐसे ही ड्रोन्स और मिसाइल युद्धों का है.

तीन साल से ग़ाज़ा पट्टी में इज़रायल तबाही मचा रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध में फिर भी 14 हजार लोगों के मारे जाने की बात हो रही है, जबकि ग़ाज़ा पट्टी में तो 72 हजार से ज़्यादा फिलिस्तीनी मारे गए हैं. ग़ाज़ा पट्टी बिल्कुल खंडहर में बदल चुकी है और ट्रंप नेतन्याहू के साथ मिलकर बहुत अश्लील ढंग से इसके कायाकल्प की बात कर रहे हैं. 

इन सबके बीच आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच पुराने ज़ख़्मों की सीवन खुल गई और एक ठीकठाक युद्ध छिड़ गया. जैसे ये काफ़ी न हो, पहलगाम के आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर लांच किया और दक्षिण एशिया की दो ऐटमी शक्तियों के बीच युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई. अब इस युद्ध को रुकवाने का दावा कर डोनाल्ड ट्रंप अपने लिए नोबेल प्राइ़़ज़ मांग रहे हैं. 

जैसे यह सब काफ़ी न हो, अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित उठा लिया और अब उन पर मुक़दमा चला रहा है. दुनिया इस दादागीरी को देखकर हैरान है. रूस और चीन ने तो इसकी निंदा की, लेकिन हमारा देश चुप रह गया. यही नहीं ईरान में चल रहे प्रदर्शनों के बीच अमेरिका तेहरान पर हमले की धमकी भी दे रहा है. इसके अलावा ग्रीनलैंड पर उसकी नज़र है जो दरअसल अब तक डेनमार्क का स्वायत्त हिस्सा रहा है. ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के अमेरिकी फ़ैसले को वह यूरोप चुनौती दे रहा है जो नाटो समझौते से उसके साथ बंधा है. यानी नाटो के भी टूटने का ख़तरा है. इन सब हलचलों के बीच अगर बांग्लादेश और नेपाल को जोड़ लें तो समझ में आता है कि दुनिया वाकई आंख मूंदकर बारूद के ढेर पर चल रही है.

क्या ये सारी घटनाएं अलग-अलग हैं या इनका कोई सिरा आपस में जुड़ता है? ध्यान से देखें तो ये सारे सिरे आपस में जुड़ते हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो नई विश्व-व्यवस्था बनी थी, वह दो ध्रुवों में बंटी हुई एक शीतयुद्ध लड़ती रही. लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका के एकाधिकार की छुपी हुई कोशिशें अब बिल्कुल स्पष्ट घोषणाओं में बदल चुकी हैं और दुनिया एक नई वैश्विक अव्यवस्था की जद में है. इन सबके बीच ट्रंप बिल्कुल तानाशाहों की तरह पेश आ रहे हैं और शायद यह समझ नहीं पा रहे कि इस तानाशाही रवैये से उनका ‘MAGA' यानी ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' सबसे ज़्यादा चोटिल होगा.

लेकिन यह अमेरिका का मामला नहीं है, बाक़ी दुनिया का भी है. रूस और चीन और पूरा यूरोप एक हद तक ट्रंप के आगे सरेंडर कर सकते हैं, लेकिन जहां उन्हें लगा कि अमेरिकी रुख उनके हितों के ख़िलाफ़ जा रहा हैं- जो जा भी रहे हैं, उनके तेल सौदों पर आंच आ रही है, उनके बाक़ी कारोबार भी प्रभावित हो रहे हैं- वहां वो किसी भी विकल्प तक जाने से शायद गुरेज न करें.

क्या यह ऐटमी हमलों का भी विकल्प हो सकता है? सारे तर्क इसके ख़िलाफ़ हैं. हिरोशिमा-नागासाकी के भयावह अनुभव अब तक कोई भूला नहीं है. परमाणु शक्तियों के पास अब इतने बम हैं कि धरती एक बार नहीं कई बार तबाह हो जाए. ‘न्यूक्लियर डेटरेंस' यानी ऐटमी प्रतिरोध का मुहावरा असल में इसी समझ से निकला है कि परमाणु बम से लैस शक्तियां एक-दूसरे के ऊपर नाभिकीय हमले नहीं करेंगी. बल्कि ज्यादातर देश जिस न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन की बात करते हैं, उसमें भी यह स्पष्ट है कि कोई भी देश पहले नाभिकीय हमला नहीं करेगा.

लेकिन इसके बावजूद कई देश नाभिकीय विकल्पों के बारे में सोचने और उसकी धमकी देने से बाज़ नहीं आए हैं. ईरान और उत्तर कोरिया अपने निशाने अमेरिकी शहरों तक को बता चुके हैं. बीते दिनों पाकिस्तान ने भी हल्का इशारा किया कि उसके पास ऐटम बम है और कोई उसे कमजोर न समझे. तो नाभिकीय विकल्प अपनी सारी बंदिशों के बावजूद दुनिया के देशों के पास बचे हुए हैं.

कुछ साल पहले उपन्यासकार केन फॉलेट का एक उपन्यास आया- नेवर. उपन्यास की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति (जो एक महिला है) को उस बंकर में ले जाया जाता है जहां किसी परमाणु हमले की सूरत में उन्हें रहना है. वह मन ही मन सोचती हैं कि किसी भी सूरत में वह ऐसे हमले की नौबत आने नहीं देंगी. यही ख्याल चीन का भी है. किसी भी सूरत में नाभिकीय हमला नहीं होना चाहिए. लेकिन हालात इस तरह पलटते जाते हैं कि चीन पहले अमेरिकी प्रतिष्ठानों पर नाभिकीय हमले करने का आदेश देता है और फिर अमेरिकी राष्ट्रपति चीन के 50 ठिकानों पर ऐटमी हमलों का आदेश देती हैं. उपन्यास के अंत में यह आदेश देते हुए वे रो रही हैं.

यह एक सामान्य सा उपन्यास है. लेकिन हक़ीक़तन हम एक ख़तरनाक मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं. नेताओं के अहंकार की वजह से तीसरे विश्वयुद्ध की नौबत आई तो धरती के तबाह होने की नौबत भी आएगी. यह शायद आइंस्टीन ने कहा था कि उन्हें नहीं मालूम, तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन यह मालूम है कि चौथा विश्वयुद्ध फिर पत्थरों से लड़ा जाएगा. क्योंकि हम अपनी दुनिया को फिर पाषाण काल में पहुंचा चुके होंगे. तो ख़तरे की घंटी बज रही है- सवाल है, इसे रोकेगा कौन?

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं. 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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