वसंत ऋतु को आमतौर पर चारों तरफ रंग-बिरंगे फूलों के खिलने का समय माना जाता है. हिमालय की सुरम्य गोद में पाए जाने वाले 'वाइल्ड हिमालयन चेरी'को स्थानीय भाषा में 'पदम' (Prunus Cerasoides) कहते हैं. यह 'पदम' प्रकृति के इस सामान्य नियम को चुनौती देता है. जब सर्दियों की दस्तक के साथ अन्य वनस्पतियां पतझड़ के बाद सुप्त अवस्था (डॉर्मेंसी) में चली जाती हैं, तब यह पेड़ पूरी खूबसूरती के साथ खिलकर पहाड़ों को जीवंत कर देता है.
हिमालय पर कहां पाया जाता है पदम
यह पेड़ मुख्य रूप से हिमालय के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में, 1200 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है. अक्टूबर से फरवरी के बीच, जब पहाड़ों में कड़ाके की ठंड पड़ती है, तब पदम की सूखी, पत्तीविहीन टहनियां हल्के गुलाबी और सफेद फूलों के जीवंत चंदवे (कैनोपी) में बदल जाती हैं. ऊंचे पहाड़ों की बर्फीली हवाओं और कोहरे के बीच इन फूलों का खिलना किसी दिव्य चमत्कार जैसा लगता है, जो कठोर और नीरस शीतकालीन परिदृश्य को एक कोमल और आकर्षक रूप दे देता है.
पक्षियों के लिए जीवनदायिनी अमृतधारा यह पेड़ सर्दियों के कठिन महीनों में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक सच्चे जीवनरक्षक की भूमिका निभाता है. जब अत्यधिक ठंड के कारण चारों ओर भोजन और फलों का भारी संकट होता है, तब पदम के फूल और उनमें छिपा मीठा रस स्थानीय पक्षियों के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत बनते हैं.
इस मौसम में इन पेड़ों पर विभिन्न हिमालयी पक्षियों का एक अनोखा मेला लग जाता है. इनमें हिमालयन बुलबुल (Himalayan Bulbul), इंडियन व्हाइट-आई (Indian White-Eye), सनबर्ड्स और रसेट स्पैरो (Russet Sparrow) प्रमुखता से शामिल हैं. जहां छोटे और फुर्तीले इंडियन व्हाइट-आई अपनी पतली चोंच से फूलों का मीठा रस (नेक्टर) चूसते हैं, वहीं रसेट स्पैरो फूलों के बीच छिपे सक्रिय कीटों को ढूंढकर अपना आहार बनाते हैं. इसी तरह, अपने विशिष्ट सिर की कलगी वाली सुंदर हिमालयन बुलबुल भी इन शाखाओं पर चहकती हुई फूलों के रस और उनके छोटे फलों का आनंद लेती है. अन्य प्रवासी पक्षियों के साथ मिलकर इन प्रजातियों की यह चहल-पहल न केवल उन्हें कड़ाके की ठंड में जीवित रखती है, बल्कि जाने-अनजाने में पेड़ों के परागण (Pollination) और उनके वंश विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

पदम के पौधे पर बैठी एक इंडियन व्हाइट-आई.
Photo Credit: Himanshu Gupta
आयुर्वेद और तिब्बती उपचार पद्धति में दवा है पदम
सांस्कृतिक, औषधीय और आर्थिक महत्व हिमालयी समुदायों और लोक संस्कृति में पदम के पेड़ को पवित्रता, धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है. इसके शुभ धार्मिक महत्व के साथ-साथ पारंपरिक चिकित्सा में भी इसका बड़ा योगदान है. आयुर्वेद और स्थानीय तिब्बती व पहाड़ी उपचार प्रणालियों में इसकी छाल, पत्तों और लकड़ी का उपयोग पथरी, पीठ दर्द, सूजन और त्वचा से जुड़ी कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता रहा है. इसके अलावा, सर्दियों में इस गुलाबी चादर को देखने के लिए बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमी और फोटोग्राफर्स पहाड़ों का रुख करते हैं, इससे स्थानीय पर्यावरण-पर्यटन (Eco-Tourism) को भी बढ़ावा मिलता है.
वाइल्ड हिमालयन चेरी प्रकृति की उस अद्भुत और अदम्य क्षमता का जीवंत उदाहरण है, जो विपरीत और कठोर परिस्थितियों में भी न केवल खुद को मुस्कुराते हुए बनाए रखती है, बल्कि संकट के समय में दूसरों को भी जीवन और आश्रय देती है. यह अनोखा पेड़ हमें सिखाता है कि कठिन समय में भी कैसे खिलकर संसार को सुंदर बनाया जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक पक्षी-प्रेमी और प्रकृति को निहारने वाले हैं. उन्हें पक्षियों की तस्वीरें लेना और उनके बारे में लिखना पसंद है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)