अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. ये चुनाव वहां की पूरी चुनावी प्रक्रिया की झलक दिखाते हैं. इन चुनावों में अमेरिकी लोकतंत्र की विविधता और उसकी ताकत देखने को मिलती है. बड़ी संख्या में उम्मीदवार गवर्नर, अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट की सीटों के लिए मैदान में उतरते हैं. इस बार सत्ता का संतुलन और चुनावी परिस्थितियां काफी विविध और दिलचस्प हैं. चुनाव में भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है. वे अमेरिका की सत्ता और प्रभाव के केंद्रों में एक मजबूत और प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं.
क्या युद्ध का समर्थन करते हैं अमेरिकी
चुनाव के संदर्भ में अमेरिका में एक ऐसी प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है,जिसे 'रैली बिहाइंड द फ्लैग' यानी राष्ट्रीय ध्वज के पीछे एकजुट होने की भावना कहा जाता है. इसके तहत अमेरिकी सरकार की ओर से की गई किसी भी सैन्य कार्रवाई के बाद राष्ट्रपति और सरकार के प्रति जनता का समर्थन बढ़ जाता है. ऐसा तब भी होता है, जब उस सैन्य कार्रवाई से दुनिया के दूसरे देशों की मुश्किलें बढ़ रही हों. इस तरह के मामलों में राष्ट्रीय समर्थन का आंकड़ा 71 फीसद तक पहुंच जाता है.
हाल ही में हुए अल जजीरा के सर्वेक्षण में भी लोगों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर असंतोष जताया है. सर्वेक्षण करने वालों के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप के शासन में लोगों की निजी आर्थिक स्थिति भी खराब हुई है.ऐसे में महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े मुद्दे,ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और टैरिफ यानी आयात शुल्क से जुड़े फैसले डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए अहम मुद्दे बन गए हैं. इन मुद्दों पर डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सरकार को घेर रही है.
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प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वेक्षण के मुताबिक, अमेरिका के 55 फीसद लोगों को लगता है कि चुनाव निष्पक्ष और बिना किसी पक्षपात के कराए जाएंगे. यह आंकड़ा पहले के 60 फीसद से अधिक के स्तर से नीचे है. इससे पता चलता है कि अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कम हुआ है.
राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता किस हालत में है
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता काफी कम है. आम अमेरिकी मतदाता महंगाई, बढ़ते सरकारी खर्च, बिलों और सरकार की गलतियों से परेशान हैं. इन मुद्दों के साथ राष्ट्रपति ट्रंप की व्यापक नीतियां भी अमेरिकी राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई हैं.
उदाहरण के तौर पर, मिशिगन राज्य में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल सैयद के प्राइमरी चुनाव जीतने का अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन उन्हें केवल एक फीसद वोट मिले और वह चुनाव हार गए. वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 के चुनाव और अपने दूसरे कार्यकाल यानी ट्रंप 2.0 के दौरान भी सर्वेक्षणों के अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन किया था. इससे चुनावी सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता और सटीकता पर सवाल उठते हैं. ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि अमेरिका के चुनावी नतीजे किस दिशा में जाएंगे.

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'द कन्वर्सेशन' का अनुमान है कि मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी सीनेट में अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सकती है. आम चुनावों में पार्टी की लोकप्रियता को लेकर किए गए सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी से 9.4 फीसद आगे दिखाई दे रही है.
इन सर्वेक्षणों के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती है. उनकी लोकप्रियता का स्तर माइनस 20.4 फीसद बताया जा रहा है. इससे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है.
क्या रिपब्लिकन पार्टी से बड़े हो गए हैं डोनाल्ड ट्रंप
रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक माइकल स्टील का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे बड़ी गलती यह की कि उन्होंने चुनाव को अपनी व्यक्तिगत छवि से जोड़ दिया. ट्रंप का व्यक्तिगत प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि इससे रिपब्लिकन पार्टी को होने वाला संभावित फायदा भी कम हो सकता है. इससे पार्टी के भविष्य और उसकी राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता है.
भारत और विदेशों में कुछ जनमत विश्लेषकों का मानना है कि मध्यावधि चुनाव करीब आने के साथ ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के जरिए अमेरिकी सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया. इसका मकसद अमेरिकी राष्ट्र की ताकत और उसके 'अमेरिकन ड्रीम' को मजबूत करना था. इसके साथ ही, इससे राष्ट्रपति के रूप में अपने बाकी कार्यकाल के दौरान रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश भी की गई.
इस आधार पर कहा जा सकता है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति, खासकर इजरायल और ईरान को लेकर उनकी नीतियों पर जनता की प्रतिक्रिया की बड़ी परीक्षा होंगे. इन चुनावों का असर अमेरिका की घरेलू राजनीति और आने वाले समय की घटनाओं पर भी पड़ेगा.
अमेरिकियों के सामने मुद्दे क्या हैं
अर्थव्यवस्था की स्थिति, लोक कल्याण, अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की मुश्किलें और नस्ल से जुड़े मुद्दे भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. इसके अलावा उच्च शिक्षा, पुराने बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीति जैसे मुद्दे भी अमेरिकी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगे.
चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप की घरेलू और विदेश नीति का भविष्य क्या होगा. डेमोक्रेटिक पार्टी इन चुनावों में बड़ी जीत की उम्मीद कर रही है. हालांकि, आखिरी समय में मतदाताओं का फैसला बदलने और सर्वेक्षणों में शामिल लोगों के चयन से जुड़े मुद्दे भी चुनाव के नतीजों पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
सीनेट में चार सीटों की बढ़त भी डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. इससे सीनेट में किस पार्टी का नियंत्रण होगा और व्हाइट हाउस यानी राष्ट्रपति कार्यालय को कितनी राजनीतिक ताकत मिलेगी, यह तय होगा. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनावी नतीजे राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक राजनीतिक रणनीति पर लगाम लगाएंगे या फिर उन्हें अपनी 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए नई ताकत देंगे? यह देखना भी दिलचस्प होगा कि दूसरे राजनीतिक विवादों के बीच अमेरिकी मतदाता क्या फैसला करते हैं.

इस चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में कमी आई है.
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अगर डेमोक्रेट ताकतवर हुए तो क्या करेंगे राष्ट्रपति ट्रंप
रिपब्लिकन पार्टी ने ईरान युद्ध को लेकर नरम रुख अपनाने की कोशिश की है. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा है कि अमेरिका ईरान के साथ युद्ध जारी रखने के लिए अड़ा हुआ नहीं है. ईरान के साथ हालात सामान्य करने के लिए बातचीत के संकेत भी दिए गए हैं. इस बयान को डेमोक्रेटिक पार्टी के उस आरोप के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें कहा जाता है कि राष्ट्रपति ट्रंप युद्ध समर्थक हैं और लगातार युद्ध की स्थिति बनाए रखना चाहते हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप को एक और झटका तब लगा, जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी संख्या में मतपत्रों को रद्द करने की उनकी मांग खारिज कर दी. इससे डेमोक्रेटिक पार्टी को मजबूती मिली है. राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पुराने अंदाज में डेमोक्रेटिक पार्टी को धमकी भी दी है. उन्होंने कहा है कि अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में कोई विधेयक लाती है, तो वह उसे वीटो कर देंगे. जब ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी मुश्किल में होते हैं, तो वह अक्सर इस तरह की बयानबाजी करते हैं. मध्यावधि चुनाव को लेकर ट्रंप ने एक और राजनीतिक दांव चला है. उन्होंने कहा है कि अगर डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो वह अमेरिकी राजनीति में दोनों दलों के बीच सहयोग की परंपरा को फिर से मजबूत करने के लिए उसके साथ मिलकर काम कर सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में अंतरराष्ट्रीय संबंध और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बारे में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहम होना जरूरी नहीं है.)