खराबी नरेंद्र मोदी स्टेडियम की पिच में नहीं, अंग्रेज़ बल्लेबाज़ों के 'कौशल' में है...

जब भी कभी भारतीय या एशियाई बल्लेबाज़ों की ऑस्ट्रेलियाई या न्यूज़ीलैंड की पिचों पर कलई खुली, तो इन देशों के मीडिया ने अपना ही नैरेटिव (कहानी, कथा, नज़रिया) चलाया. पिछले दिनों ही ऑस्ट्रेलियाई पिच पर भारत के 36 रन पर ढेर होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के अग्रणी अख़बारों ने भारतीय बल्लेबाज़ों को 'डरपोक' तक करार दिया था

खराबी नरेंद्र मोदी स्टेडियम की पिच में नहीं, अंग्रेज़ बल्लेबाज़ों के 'कौशल' में है...

तीसरे टेस्ट की पिच को लेकर इंग्लैंड के पूर्व दिग्गजों की बयानबाजी अभी भी जारी है

तेज़ पिचों पर साहस, टर्निंग ट्रैक पर कौशल और धीमी पिचों पर बल्लेबाज़ों के धैर्य की परीक्षा होती है. क्या साहस और कौशल दो अलग-अलग बातें हैं...? साहस में कौशल का कितना समावेश है...? कौशल में साहस का कितना समावेश है...? जब बात क्रिकेट की आती है, तो कौशल में किन-किन तत्वों का समावेश होता है...? वास्तव में किसी भी व्यवसाय में साहस और कौशल के बीच अटूट रिश्ता है. इनमें से एक का भी साथ छूट जाए, तो मंज़िल भी छूट जाती है.

जब बल्लेबाज़ बाउंसी या घसियाली पिच पर बैटिंग करता है, तो उसके साहस की परीक्षा ज़्यादा होती है. उछाल के साथ-साथ तेज़ी जितनी बढ़ती जाती है, 'साहस का सेंसेक्स' भी ऊंचा होता चला जाता है. पिछली सीरीज़ में ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर चेतेश्वर पुजारा की छाती, पसलियों पर गेंद खाती तस्वीरें अभी भी क्रिकेटप्रेमियों के ज़हन में होंगी. तब पुजारा ने साहस का शानदार परिचय दिया था. लेकिन तेज़ पिचों पर उठती हुई गेंदों, दोहरे उछाल के समक्ष, बहुत ज़्यादा स्विंग और सीम (टप्पा पड़कर बाहर या भीतर आती गेंदों) के सामने कौशल (तकनीक + फुटवर्क + ध्यान वगैरह) की भी खासी परीक्षा होती है. ज़रा '70 के दशक की शुरुआत में विंडीज़ की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ पेस चौकड़ी के सामने बिना हेलमेट के सुनील गावस्कर की बैटिंग की तस्वीर की कल्पना कीजिए. क्रिकेट इतिहास में साहस + कौशल का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही ढूंढे मिले.

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बात स्पिन की करते हैं. स्पिन के सामने कितने साहस की ज़रूरत होती है...? मान लो, अगर तेज़ पिचों पर साहस करीब 70 प्रतिशत दरकार होता है, तो घुमाव लेती पिचों पर कौशल भी इतने ही फीसदी की ज़रूरत अख्तियार कर लेता है. घुमाव, उछाल आदि तत्व जितने बढ़ते जाते हैं, कौशल की परीक्षा भी बढ़ती जाती है. कौशल मतलब, बेहतरीन फुटवर्क, बेहतरीन तकनीक (बल्ले और पैड के बीच गैप न होना, आदि), धैर्य वगैरह. और इस कौशल में भी फुटवर्क थोड़ा आगे-पीछे हो, तो चलेगा, लेकिन तकनीक की 'कसावट' में छेद तो बिल्कुल भी नहीं चलेगा.

मतलब यह है कि साहस और कौशल बल्लेबाज़ी विद्या के दो अनिवार्य तत्व हैं. यह अलग बात है कि साहस का कौन-सी पिच पर कितने फीसदी इस्तेमाल होता है और कौशल का पिच विशेष पर कितना! साल 1987 में पाकिस्तान के भारत दौरे में 3-17 मार्च तक बेंगलुरू (तब बंगलौर) के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेले गए टेस्ट में भारत को मिले 221 रन के टारगेट का पीछा करते हुए भारत 204 पर सिमट गया था और 16 रन से टेस्ट हार गया था. गावस्कर ने 96 रन की पारी खेली थी, जिसे सनी तकनीकी कौशल के हिसाब से करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी मानते हैं. वजह - कई मौकों पर गावस्कर ने कहा कि गेंद 90 डिग्री से टर्न ले रही थी. हार के बावजूद सनी को इसी तकनीकी कौशल के लिए 'मैन ऑफ द मैच' चुना गया था. क्या अहमदाबाद में इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए तीसरे टेस्ट में घुमाव और उछाल कुछ इस तरह का था...?

जब भी कभी भारतीय या एशियाई बल्लेबाज़ों की ऑस्ट्रेलियाई या न्यूज़ीलैंड की पिचों पर कलई खुली, तो इन देशों के मीडिया ने अपना ही नैरेटिव (कहानी, कथा, नज़रिया) चलाया. पिछले दिनों ही ऑस्ट्रेलियाई पिच पर भारत के 36 रन पर ढेर होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के अग्रणी अख़बारों ने भारतीय बल्लेबाज़ों को 'डरपोक' तक करार दिया था. हालांकि, यह अपवाद भर था और अपवाद की समीक्षा ऐसे शब्दों से नहीं होती, लेकिन इस अपवाद से इतर फिर भी अगर '90 के दशक की शुरुआत में जब पर्थ की पिच पर दिग्गज भारतीय बल्लेबाज़ ग्रेग मैक्टरमॉट की गेंद छाती या हेलमेट पर खाते थे, तब भी ऑस्ट्रेलियाई या एशिया से बाहर का मीडिया भारतीय बल्लेबाज़ों के लिए 'डरपोक' जैसे विशेषणों का इस्तेमाल किया करता था. मतलब, इन बल्लेबाज़ों में साहस का अभाव था और कुछ प्रतिशत कौशल का भी.

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इस नैरेटिव को न केवल भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों ने स्वीकारा, बल्कि भारतीय मीडिया ने भी अपने पटल पर अंकित कर लिया. शायद ही कभी भारतीय मीडिया इस नैरेटिव के साथ सामने आया कि पिच खराब थी. क्या कभी आया...? अगर यदा-कदा तेज़ गेंदबाजों के अनुकूल पिच बनाने की बात मीडिया में कही गई, तो इसके बचाव के लिए इसी दौर में घरेलू लाभ (होम एडवांटेज) का नैरेटिव गढ़ लिया गया. भारतीय मीडिया ने 'खराब पिच' रूपी कुतर्क से टीम का बचाव करने की कोशिश भी नहीं की. सही ही किया, क्योंकि यहां से सुधार का रास्ता बचा हुआ था.

जिस तरह तेज़ पिचों पर साहस + कौशल की ज़रूरत पड़ती है, ठीक उसी तरह टर्निंग ट्रैक पर साहस से कहीं ज़्यादा कौशल (तकनीक) की ज़रूरत पड़ती है. क्या इंग्लैंड के खिलाफ तीसरे टेस्ट का आयोजन स्थल नरेंद्र मोदी स्टेडियम टर्निंग ट्रैक था...? करीब 60-70 प्रतिशत था. क्या मोदी स्टेडियम की यह पिच उस वानखेड़े स्टेडियम भी ज़्यादा खतरनाक (बहुत ज़्यादा घुमाव + बहुत ज़्यादा उछाल + अप्रत्याशित उछाल या दोहरा उछाल) थी, जहां नवंबर, 2004 में ऑस्ट्रेलिया के तिहारे शतकवीर पूर्व दिग्गज बल्लेबाज़ माइकल क्लार्क ने करीब छह ओवरों में सिर्फ नौ रन देकर 6 विकेट लिए थे...?

अहमदाबाद में तीसरे टेस्ट में इंग्लैंड के बल्लेबाज़ों ने अंगुलियों के स्पिनर (अक्षर पटेल, रविचंद्रन अश्विन) के खिलाफ विकेट गंवाए, कलाई के स्पिनरों के खिलाफ नहीं, जिनमें तुलनात्मक रूप से कहीं ज़्यादा घुमाव और विविधता होती है. मोदी स्टेडियम की पिच पर कई मौकों पर गेंद टप्पा खाने के बाद बहुत ज़्यादा घूमी, लेकिन इंग्लैंड के लगभग सभी बल्लेबाज़ बॉलर की कलाई देखकर गेंद को पढ़ने की नाकामी, हवा में गति के मिश्रण से गच्चा खाना और खराब शॉट चयन का शिकार बने. वे अति घुमाव के खिलाफ आउट नहीं हुए. जब वे गेंद को स्पिन के साथ खेलने के लिए गए, तो गेंद बाहरी किनारे को चूमते हुए निकल गई और कभी स्पिन के विपरीत खेलने का प्रयास किया, तो गेंद सीधी रहते हुए गिल्लियां बिखेर गई. ऐसा भी नहीं था कि गेंदों में दोहरा उछाल था और गेंद कभी बहुत नीची रह रही थी या कभी उछाल से चौंकाते हुए बल्लेबाज़ की आंखें खोल दे रही थी.

इंग्लैड की पहली पारी में चार बल्लेबाज़ LBW और तीन बल्लेबाज़ बोल्ड हुए. दूसरी पारी में भी उसके चार बल्लेबाज़ LBW और तीन बल्लेबाज़ बोल्ड हुए. अगर पिच में अप्रत्याशित घुमाव, उछाल होता, तो उसके ज़्यादार बल्लेबाज़ों के कैच विकेटकीपर / नज़दीकी फील्डरों के हाथों में समाए होते. दूसरी पारी में कीपर पंत के दस्तानों में महज दो कैच आए. इनमें से भी एक नंबर 11 एंडरसन का था. ऐसे में पिच कहां से खराब थी...? अनेक बार गेंद बल्ले और पैड के बीच से निकली. क्या बॉलर की ग्रिप देखकर गेंद न पढ़ पाने की विफलता, हवा में मिश्रण से गच्चा खाना और पर्याप्त डिफेंसिव तकनीक के न होने से खराब पिच से कोई रिश्ता है...? एक फीसदी भी नहीं. जिस नंबर 3 पर टीम का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ होता है, उस क्रम पर जॉनी बेयर्स्टो के 'बैटिंग तेवर' को क्या कहा जाए...? बेयर्स्टो को पता ही नहीं था कि वह कहां हैं, क्यों हैं और क्या कर रहे हैं. वास्तव में, इंग्लैंड के ऐसे कई बल्लेबाज़ थे, जो मैदान में एन्ट्री लेने से पहले ही मानसिक रूप से आउट हो चुके थे.

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Photo Credit: Twitter

तो जब तेज़ पिच पर साहस बल्लेबाज़ का बड़ा गुण हो सकता है, तो गेंदबाजों की करीब 70 फीसदी मददगार पिच (खराब नहीं) पर कौशल (तकनीक + फुटवर्क आदि) क्या एक बड़ा गुण नहीं है...? बिना स्पिनरों से निपटने की कला या इस तरह की पिच पर खुद को साबित किए बिना क्या किसी बल्लेबाज़ को पूर्ण माना जा सकता है...? लेकिन साबित करना तो छोड़िए, अंग्रेजों के तो इस पिच पर तोते उड़ गए. तीसरे टेस्ट में पौने दो दिन के भीतर मैच खत्म ज़रूर हुआ, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस अवधि में 20 विकेट नहीं गिरे. वास्तव में सवाल अनगिनत हैं. और जवाब यह है कि खराबी नरेंद्र मोदी स्टेडियम की पिच में नहीं, मेहमान बल्लेबाज़ों की सोच और तकनीकी कौशल में हैं. और बड़ा सवाल यह है कि जब तेज़ पिच पर किसी बल्लेबाज़ी विफलता को डर या योग्यता में कमी जैसे शब्दों से नवाजा जा सकता है, तो इस तरह की पिच पर कौशल के अभाव को बड़ी खामी क्यों नहीं माना जा सकता...?

अंग्रेज़ी टीम के पूर्व स्पिनर मोन्टी पनेसर ने भारत आते ही अपने पहले इंटरव्यू में कहा कि अगर चौथे टेस्ट में भी ऐसी ही पिच निकलती है, तो ICC को मैदान को दिए जाने वाले प्वाइंट्स काट लेने चाहिए. आप 200 फीसदी गलत हैं, मोन्टी. अगर इंग्लैंड मैच जीतता, तो क्या तब भी ऐसा ही बयान देते...? शायद तब इंग्लिश या विदशी मीडिया कुछ ऐसा ऐसा लिखता, "स्पिन खेलने के चैम्पियन अपने घर में ही हुए ढेर" वगैरह. सच यह है मोन्टी, अगर इंग्लैंड बल्लेबाज़ फिर नाकाम होते हैं, तो आप उनके स्पिन खेलने की कला की योग्यता के प्वाइंट्स काटिए, क्योंकि एक-दो को छोड़कर आपके ज़्यादातर बल्लेबाज़ों को अभी भी स्पिनरों को समझने (बॉलर की ग्रिप देखकर) पर काम करना है. खेलने की बात तो छोड़ ही देते हैं.

मनीष शर्मा ndtv.in में डिप्टी न्यूज़ एडिटर हैं...


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