महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज पर आए एक बयान को लेकर राजनीतिक हो रही है. इस विवाद ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का मूल्यांकन समकालीन राजनीतिक विमर्श के आधार पर किया जाना चाहिए या उनके ऐतिहासिक संदर्भ और वास्तविक योगदान की समग्र समझ के आधार पर. भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनका मूल्यांकन केवल युद्धों, विजय अभियानों या सत्ता-विस्तार की कसौटी पर नहीं किया जा सकता. छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे ही विरले ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं. उनका योगदान सैन्य सफलता से कहीं आगे जाकर राजनीतिक दृष्टि, प्रशासनिक नवाचार, सामाजिक समावेशन, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और स्वशासन की अवधारणा से जुड़ता है. समकालीन भारत में जब इतिहास को लेकर वैचारिक और राजनीतिक विवाद तेज़ होते जा रहे हैं, शिवाजी को समझने की जरूरत और भी बढ़ जाती है. एक प्रतीक या नारे के रूप में नहीं, बल्कि उनके समय, परिस्थितियों और विचारों के व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में.
कैसा था सत्रहवीं शताब्दी का भारत
सत्रहवीं शताब्दी का भारत गहरे राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था. मुगल साम्राज्य अपने विस्तार के चरम पर था, किंतु इसके साथ-साथ प्रशासनिक केंद्रीकरण, भारी कराधान और स्थानीय शक्तियों के दमन की प्रवृत्तियां भी तीव्र होती जा रही थीं. दक्कन क्षेत्र में यह असंतोष विशेष रूप से स्पष्ट था, जहां स्थानीय कृषक समुदाय, छोटे सरदार और क्षेत्रीय समाज स्वयं को दूरस्थ सत्ता से कटा हुआ महसूस कर रहे थे. मार्क्सिस्ट इतिहासकार सतीश चंद्र भी मानते हैं कि शिवाजी का उदय इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हुआ. उन्होंने सत्ता की वैधता को वंश, धर्म या साम्राज्यवादी शक्ति से नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा, स्थानीय स्वशासन और न्याय से जोड़ने का प्रयास किया.
शिवाजी का सबसे बड़ा योगदान 'हिंदवी स्वराज्य' की अवधारणा को एक व्यावहारिक राजनीतिक लक्ष्य के रूप में स्थापित करना था. स्वराज्य उनके लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि शासन की एक ऐसी पद्धति थी, जिसमें राज्य का उद्देश्य प्रजा की स्वतंत्रता, सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना था. यह उस समय के साम्राज्यवादी ढांचों से भिन्न था, जहां शासन का केंद्र अक्सर शासक का वैभव और सैन्य विस्तार हुआ करता था.

साल 1674 में रायगढ़ में हुआ उनका राज्याभिषेक केवल एक शासक का औपचारिक अभिषेक नहीं था, बल्कि विदेशी प्रभुत्व के लंबे दौर के बाद स्वदेशी शासन की प्रतीकात्मक पुनर्स्थापना भी था. इस स्वराज्य की विशेषता यह थी कि यह किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी पर आधारित था. आगे चलकर यही संरचना मराठा संघ के रूप में विकसित हुई, जिसने शक्ति के विकेंद्रीकरण और साझी राजनीतिक जिम्मेदारी की दिशा में स्पष्ट संकेत दिया.
शिवाजी की सैन्य रणनीति
सैन्य क्षेत्र में शिवाजी का योगदान भारतीय युद्ध-इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. उन्हें प्रायः 'गुरिल्ला युद्ध' के लिए जाना जाता है, किंतु यह उनकी रणनीतिक सोच का केवल एक पक्ष है. उन्होंने भूगोल को युद्ध-रणनीति का अभिन्न अंग बनाया. पर्वतीय क्षेत्र, घने जंगल और तटीय इलाक़े उनकी सैन्य योजना के केंद्र में थे.
तेज़ आक्रमण, सीमित समय में निर्णायक प्रहार, शत्रु की रसद और संचार व्यवस्था पर आघात और बाद में सुरक्षित ठिकानों की ओर लौटना, यही उनकी युद्धनीति का मूल था. शाइस्ता ख़ान पर पूना में किया गया साहसिक रात्रि-आक्रमण और सूरत पर धावा उनकी रणनीतिक सूझबूझ और मनोवैज्ञानिक युद्ध-नीति के उल्लेखनीय उदाहरण हैं.
किलों की नीति शिवाजी की सैन्य दृष्टि का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ था. सह्याद्रि की पर्वतमाला में स्थित किले केवल सैन्य चौकियां नहीं थे, बल्कि प्रशासनिक केंद्र, रसद-भंडार और शरणस्थली भी थे. तोरना, रायगढ़, प्रतापगढ़, पुरंदर और विशालगढ़ जैसे दुर्ग स्वराज्य की आत्मनिर्भर संरचना के प्रतीक बने. इन किलों के माध्यम से शिवाजी ने स्थायी शासन और सुरक्षा, दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया.
शिवाजी की 'ब्लू इकॉनमी' कैसी थी
शिवाजी की दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी समुद्री रणनीति थी. उस दौर में जब अधिकांश भारतीय शासक समुद्र को सीमित और संकुचित दृष्टि से देखते थे, शिवाजी ने समुद्री शक्ति के सामरिक और आर्थिक महत्व को समय रहते पहचाना. आज के समय में हम समझने के लिए इसे ही 'ब्लू इकॉनमी' की संज्ञा दे सकते हैं. कोंकण तट पर उन्होंने एक संगठित नौसेना विकसित की, समुद्री किलों का निर्माण कराया और यूरोपीय शक्तियों की बढ़ती नौसैनिक दखलंदाज़ी को चुनौती दी.
उनकी नौसेना केवल रक्षा का साधन नहीं थी, बल्कि व्यापार मार्गों की सुरक्षा और राजस्व-सृजन से भी जुड़ी हुई थी. इस दृष्टि से शिवाजी को भारतीय समुद्री रणनीति का अग्रदूत माना जा सकता है. उन्होंने समुद्र को धार्मिक या व्यापारिक सीमाओं से निकालकर राज्य-शक्ति के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित किया.
शिवाजी का योगदान केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं था. उन्होंने एक सुव्यवस्थित, अनुशासित और अपेक्षाकृत पारदर्शी प्रशासनिक ढांचा तैयार किया. अष्ट प्रधान परिषद के माध्यम से विभिन्न विभागों के लिए उत्तरदायित्व तय किया गया. इससे सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण पर प्रभावी अंकुश लगा. राजस्व नीति में उन्होंने किसानों को शोषण से बचाने का प्रयास किया. भूमि-माप पर आधारित कर निर्धारण, ज़मींदारी और मनमाने करों पर नियंत्रण और संकट की स्थिति में कर-रियायत जैसी नीतियां उनकी प्रगतिशील सोच को दर्शाती हैं. सैनिकों और अधिकारियों को नगद वेतन देने की व्यवस्था ने लूट और भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों को सीमित किया. न्याय-व्यवस्था में भी नियमबद्धता और अनुशासन पर विशेष बल दिया गया. सैनिकों और अधिकारियों के लिए सख़्त आचार-संहिता लागू थी, इससे राज्य की नैतिकता और प्रशासनिक विश्वसनीयता बनी रही.
शिवाजी के शासन में धार्मिक सहिष्णुता
शिवाजी को अक्सर केवल धार्मिक पहचान के चश्मे से देखने का प्रयास किया जाता है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से उनका शासन धार्मिक सहिष्णुता और व्यावहारिक उदारता का उदाहरण था. उनके प्रशासन और सेना में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग सम्मिलित थे. धार्मिक स्थलों की रक्षा, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और जबरन धर्मांतरण के प्रति विरोध, ये सभी उनके शासन की नैतिक सीमाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं. उनके लिए निष्ठा और क्षमता प्राथमिक मानदंड थे न कि धार्मिक पहचान. यही कारण है कि उनके शासन में सामाजिक समावेश बना रहा और स्वराज्य एक साझा राजनीतिक परियोजना के रूप में विकसित हुआ.
सांस्कृतिक स्तर पर शिवाजी ने मराठी और संस्कृत भाषा को राजकीय संरक्षण प्रदान किया. उस समय फ़ारसी के प्रभुत्व वाले प्रशासनिक वातावरण में स्थानीय भाषा को महत्व देना केवल सांस्कृतिक गर्व का प्रश्न नहीं था, बल्कि शासन को जनता के निकट लाने का एक प्रभावी माध्यम भी था. मंदिरों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक परंपराओं के पुनरुद्धार में उनकी रुचि ने मराठा समाज को एक नई सांस्कृतिक पहचान प्रदान की.
इतिहासकारों की नजर में शिवाजी
मराठी बाखरों ने उन्हें 'हिरोइक लिबरेटर' के रूप में पेश किया है. वहीं जेम्स ग्रैंट डफ्फ जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन्हें 'प्लंडरर एंड फ्रीबूटर' के रूप में देखा. जदुनाथ सरकार जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने उन्हें एक 'राष्ट्र-निर्माता और स्वतंत्रता सेनानी' के रूप में पेश किया. पर्सियन क्रोनिकल्स ने उन्हें एक 'विद्रोही' के रूप में पेश किया. लेकिन यह बात ध्यान देने वाली है कि इतिहासकार भी अपने-अपने समय, काल और परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं. इसी कारण एक ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व को सभी ने अलग-अलग रूप में प्रस्तुत किया है. लेकिन आम नागरिकों के लिए यह परम आवश्यक है कि किसी भी ऐतिहासिक पुरुष को संतुलित रूप से जानने और समझने की कोशिश करें. शिवाजी के योगदान को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वे अपने समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों से निर्मित एक दक्ष शासक थे.
शिवाजी की ऐतिहासिक विरासत उनके जीवनकाल से कहीं आगे तक फैली हुई है. उनके द्वारा निर्मित सैन्य और प्रशासनिक संरचना के आधार पर मराठा शक्ति ने आगे चलकर मुगल साम्राज्य के केंद्रीकृत प्रभुत्व को गंभीर चुनौती दी.'स्वराज्य' की उनकी अवधारणा बाद के स्वतंत्रता आंदोलन में नए रूप में अभिव्यक्त हुई. आज जब इतिहास को लेकर विभिन्न वैचारिक संघर्ष सामने हैं, शिवाजी का योगदान यह स्मरण कराता है कि सच्चा नेतृत्व केवल विजय या विस्तार से नहीं, बल्कि न्याय, उत्तरदायित्व, दूरदर्शिता और साहस के संतुलन से आंका जाता है. उन्हें केवल एक योद्धा या प्रतीक के रूप में देखना उनके ऐतिहासिक महत्व को सीमित करना होगा. वास्तव में शिवाजी भारतीय राजनीतिक परंपरा में उस विचार के प्रतिनिधि हैं, जहां सत्ता का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, बल्कि संरक्षण होता है. अतः ऐतिहासिक पुरुषों का इस्तेमाल किसी राजनीतिक एजेंडे के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
( डिस्क्लेमर: लेखिका दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी हैं.वर्तमान में वे बिहार सरकार में असिस्टेंट कमिशनर, स्टेट टैक्सेज के पद पर कार्यरत हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)