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क्यों जरूरी है हर साख पर उल्लू का होना 

हिमांशु गुप्ता
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 04, 2026 13:08 pm IST
    • Published On अगस्त 04, 2026 13:04 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 04, 2026 13:08 pm IST
क्यों जरूरी है हर साख पर उल्लू का होना 

जैसे ही शाम ढलती है और अंधेरा छाने लगता है, भारत के खेतों, घने जंगलों और इंसानी बस्तियों में सुरक्षा की कमान इंसानों के हाथों से निकलकर कुछ शांत शिकारियों के पास चली जाती है. दिन के उजाले में कहीं छिपकर आराम करने वाले ये धैर्यवान और अत्यंत कुशल पक्षी रात के सन्नाटे में सक्रिय हो उठते हैं. जब भी हम 'पर्यावरण संतुलन' या जैव विविधता की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान बाघ, शेर और तेंदुए जैसे बड़े जीवों पर ही जाता है. लेकिन असल में, हमारी खाद्य सुरक्षा, फसलों की रक्षा और बीमारियों से सुरक्षा की एक बड़ी जिम्मेदारी रात के अंधेरे में सक्रिय रहने वाले इन मूक रक्षकों उल्लुओं के कंधों पर होती है.

भारत में पाए जाने वाले उल्लुओं की विविधता न केवल हमारी जैविक समृद्धि का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रकृति ने हर पारिस्थितिक तंत्र के लिए एक विशेष प्रहरी नियुक्त किया है. यूं तो उल्लुओं की हर एक प्रजाति प्रकृति के चक्र को चलाने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण और अनिवार्य है, लेकिन आइए पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी इस बड़ी भूमिका को समझने के लिए भारत में पाई जाने वाली तीन खास प्रजातियों के बारे में जानते हैं. 

छोटा कान उल्लू 

घास के विस्तृत मैदानों और दलदली इलाकों में सर्दियों के मौसम में दिखाई देने वाला छोटा कान उल्लू (Short-eared Owl) एक अद्भुत प्रवासी प्रजाति है. यह उल्लू मुख्य रूप से चूहों और छोटे कृन्तकों का शिकार करता है. ये जीव फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं. किसानों के लिए यह उल्लू किसी वरदान या प्राकृतिक कीटनाशक से कम नहीं है. सर्दियों के महीनों में ये उल्लू खेतों में चूहों की संख्या नियंत्रित करते हैं. इससे किसानों को महंगे और हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं करना पड़ता.इसका नतीजा यह होता है कि हमारी मिट्टी की सेहत बेहतर बनी रहती है और अनाज भी रसायन मुक्त रहता है.

छोटे काम वाले उल्लू सर्दियों में चूहों की संख्या नियंत्रित करने का काम करते हैं.

छोटे काम वाले उल्लू सर्दियों में चूहों की संख्या नियंत्रित करने का काम करते हैं.
Photo Credit: Himanshu Gupta

खकूसट / खूसटिया उल्लू

शहरी और ग्रामीण, दोनों ही इलाकों में आसानी से दिख जाने वाला खकूसट/खूसटिया (Spotted Owlet) आकार में छोटा जरूर है, लेकिन हमारी बस्तियों के आसपास इसकी भूमिका बेहद बड़ी है. यह मुख्य रूप से हानिकारक कीट-पतंगों, छोटे सरीसृपों और बिच्छुओं को खाकर हमारे आसपास के वातावरण को स्वच्छ और संतुलित रखता है. रात में बिजली के खंभों, खंडहरों या पुराने पेड़ों पर बैठा यह उल्लू अक्सर हमारी नजरों से बच जाता है, लेकिन इसकी चौबीसों घंटे की निगरानी हमारे घरों और खेतों को कीटों के प्रकोप से सुरक्षित रखती है.

बड़ा डुण्डुल/धारिया डूंडूल उल्लू

आमतौर पर माना जाता है कि सभी उल्लू केवल रात में ही सक्रिय होते हैं, लेकिन बड़ा डुण्डुल/धारिया डूंडूल (Asian Barred Owlet) इस धारणा को बदल देता है. यह उल्लू दिन के उजाले और शाम के धुंधलके में भी सक्रियता से शिकार करता है. यह जंगलों में छोटे पक्षियों, टिड्डों और अन्य कीड़ों की आबादी को नियंत्रित कर वन पारिस्थितिकी तंत्र के चक्र को सुचारू बनाए रखता है. इसकी मौजूदगी जंगलों के स्वास्थ्य और वहां की हरियाली का एक महत्वपूर्ण संकेतक है. 

दूसरे उल्लुओं से इतर यह धारीदार उल्लू दिन में भी शिकार करने में लगा रहता है.

दूसरे उल्लुओं से इतर यह धारीदार उल्लू दिन में भी शिकार करने में लगा रहता है.
Photo Credit: Himanshu Gupta

उल्लुओं को खतरा किससे है 

दुर्भाग्य से, भारत में उल्लुओं की इस अद्भुत जीती-जागती दुनिया पर आज संकट के बादल मंडरा रहे हैं. हमारे समाज में आज भी इन्हें लेकर कई तरह के अंधविश्वास और रूढ़ियां प्रचलित हैं. तांत्रिक प्रथाओं और गलत धारणाओं के कारण दीपावली के दौरान इनका अवैध शिकार और तस्करी होती है. वहीं तेज हो रहे शहरीकरण और पुराने और खोखले पेड़ों की कटाई से उल्लुओं के प्राकृतिक घोंसले नष्ट हो रहे हैं. यदि यह सब चलता रहा तो इन उल्लुओं का खत्म हमारी खेती, खाद्य सुरक्षा और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएगा.

संतोष की बात यह है कि अब भारत में इन मूक रक्षकों को बचाने के लिए गंभीर प्रयास शुरू हो चुके हैं. भारत सरकार के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत उल्लुओं के शिकार और उनके व्यापार को पूरी तरह प्रतिबंधित कर इसे एक दंडनीय अपराध बनाया गया है. इसके साथ ही, वन्यजीव व्यापार निगरानी नेटवर्क (ट्रेफिक) और विश्व वन्यजीव कोष-भारत (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया) जैसी संस्थाएं जमीनी स्तर पर काम कर रही हैं. वन्यजीव अधिकारियों को अवैध व्यापार रोकने में सहायता के लिए विशेष 'उल्लू पहचान पत्र' और आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि वे जब्त की गई प्रजातियों की तुरंत पहचान कर सकें. देश के कई हिस्सों में स्थानीय समुदायों और बच्चों को 'उल्लू हमारे मित्र हैं' जैसे जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से प्रेरित किया जा रहा है. जंगलों में कृत्रिम घोंसले लगाए जा रहे हैं ताकि उनके प्राकृतिक आवासों की कमी को पूरा किया जा सके.

 भारत सरकार ने कानून बनाकर उल्लुओं के शिकार और व्यापार को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है.

भारत सरकार ने कानून बनाकर उल्लुओं के शिकार और व्यापार को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है.
Photo Credit: Himanshu Gupta

उल्लू केवल रात के अंधेरे में उड़ने वाले शिकारी जीव नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पारिस्थितिक तंत्र के अनिवार्य और मजबूत स्तंभ हैं. यदि हम इनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करें, समाज में फैले अंधविश्वासों को चुनौती दें और इनके महत्व को समझें, तो यह न केवल इस अनोखे पक्षी के लिए, बल्कि मानव जाति और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सुरक्षित एवं संतुलित भविष्य सुनिश्चित करेगा.

(डिस्क्लेमर: हिमांशु गुप्ता एक पक्षी-प्रेमी और प्रकृति को करीब से निहारने वाले व्यक्ति हैं. उन्हें पक्षियों की तस्वीरें लेना और उनके बारे में लिखना पसंद है.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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