प्रसिद्ध उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा 1975 में बिहार में बाढ़ की विभीषिका पर लिखा गया रिपोर्टाज “ऋणजल-धनजल' (जल की कमी और जल की अधिकता) लगभग 50 वर्षों बाद भी बिहार में बाढ़ की वही कहानी याद दिलाता है, जिसका हम अभी अनुभव कर रहे हैं. राज्य के 15 जिलों में हाल की बाढ़ ने लगभग 50 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित किया है, जिससे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और बाढ़ के बाद स्वास्थ्य संबंधी आपदाओं का खतरा पैदा हुआ है. प्रभावित जिलों में मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया, खगड़िया, कटिहार, लखीसराय, पटना, मुंगेर, समस्तीपुर, बक्सर, बेगूसराय, भागलपुर, वैशाली, सारण और भोजपुर शामिल हैं. बिहार के फ्लड मैनेजमेंट इम्प्रूवमेंट सपोर्ट सिस्टम सेंटर (FMISC) के अनुसार, राज्य का कुल 73.06 % क्षेत्र बाढ़ की आशंका से ग्रस्त है.आमतौर पर नेपाल से दक्षिण दिशा में और नीचे की ओर बहने वाली नदियां जैसे कोसी, गंडक (नेपाल में नारायणी), बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा समूह की नदियां और बिहार में कमला बलान कोसी और गंगा में मिलने से पहले अपना बाढ़ का मैदान बनाती हैं.
मॉनसूनी बारिश ने बिहार में बहने वाली लगभग सभी नदियों, जिनमें गंगा भी शामिल है, का जलस्तर बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप 15 जिलों में बाढ़ आ गई. अगस्त के अंत में नेपाल में 26 अगस्त को आई आकस्मिक बाढ़ (फ़्लैश फ्लड) के समय कोसी नदी का जलस्तर पहले ही बढ़ गया था.
मॉनसूनी बारिश बाढ़ जैसी स्थिति क्यों पैदा कर रही है
भारतीय उपमहाद्वीप में मॉनसून सदियों से एक प्राकृतिक घटना रहा है हालांकि नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों से आने वाला पानी उत्तर बिहार के कुछ जिलों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा करता है, लेकिन आमतौर पर यह कुछ दिनों तक रहता है. राज्य के मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग इसके अनुकूल हो चुके हैं. समस्याएं तब पैदा होती हैं जब नदियों को मानव निर्मित तटबंधों और बांधों से नियंत्रित किया जाता है. जब उनके प्रवाह में व्यवधान होता है तो मॉनसूनी बारिश से आए अतिरिक्त पानी के कारण वे दोनों किनारों के क्षेत्रों में फैलने की कोशिश करती हैं, लेकिन मानव बस्तियों, तटबंधों, बुनियादी ढांचों की स्थापना और बांधों के कारण वे ऐसा नहीं कर पातीं, जिसकी परिणति बाढ़ के रूप में होती है. बिहार में कोसी नदी पर बने तटबंध अक्सर जलजमाव की घटनाओं को जन्म देते हैं, जिससे स्वास्थ्य और कृषि से संबंधित समस्याएं पैदा होती हैं. 2008 में कोसी तटबंध में कुसाहा दरार ने जान-माल और बुनियादी ढांचे का भारी नुकसान किया था, जिसमें लगभग 500 लोगों की मौत हुई और लगभग आठ जिलों में करीब 30-35 लाख लोग प्रभावित हुए. यह घटना तब हुई जब कोसी नदी का जलस्तर कम था, लेकिन तटबंध के खराब रखरखाव, गाद जमाव और मानवीय लापरवाही ने इस घटना को जन्म दिया था. शहरों में खराब जल निकासी भी एक कारण है, जब मॉनसूनी बारिश को मानव बस्ती वाले क्षेत्रों से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता. निचले इलाकों में वनों की कटाई के अलावा सरकारी स्तर पर वनारोपण भी सिर्फ एक कागजी काम रह गया है. ये वह कारण हैं जिनकी वजह से मॉनसूनी बारिश का पानी का प्रवाह व्यवस्थित नहीं हो पाता और फलतः नदियों में उफान आने पर बाढ़ आ जाती है.

पटना में जलजमाव
लेकिन पटना जैसे शहरों में जहां लगभग तीसेक किलोमीटर तक अनियोजित शहरीकरण हुआ है, खराब जल निकासी व्यवस्था एक प्रमुख कारण है. इसके अलावा शहर की भौगोलिक स्थिति, क्योंकि यह सोन, गंगा और पुनपुन नदियों के संगम पर स्थित है, शहर में नालों की सफाई न करने की निष्क्रियता भी बाढ़ जैसी स्थिति को बढ़ावा देती है. 2019 में पटना में आई पिछली बाढ़ ने तबाही मचा दी थी, लेकिन सरकारी तंत्र उससे सीख नहीं ले सका. 2019 की बाढ़ पटना की पॉश कॉलोनियों तक पहुंच गई थी और भूतल पानी में डूब गए थे. स्थानीय नाले उफान पर आ गए थे, लेकिन फिर से ऐसा हुआ है.इस क्रम में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हम सिर्फ प्रशासन को उत्तरदायी ठहराकर इससे बच निकल नहीं सकते. नागरिकों को पर्यावरण और बाढ़ जैसे मुद्दों के लिए संवेदनशील बनाना होगा.अगर बारिश के पानी के बहाव में रुकावट आती है और नदीतल (रिवरबेड) का अतिक्रमण बरक़रार रहता है तो शहरी क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाएं बनी रहेंगी.
गाद जमाव (सिल्ट डेपोज़िशन)
पहले यह एक आम घटना थी कि बिहार के राजनेता और मंत्री नेपाल से कोसी और गंडक बैराज के माध्यम से अतिरिक्त पानी छोड़े जाने को उत्तर बिहार में बाढ़ का कारण बताते थे, लेकिन अब यह परंपरा कम से कम शीर्ष स्तर पर तो रुकती हुई नज़र आती है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य के पूर्व जल संसाधन मंत्री संजय झा लगातार फरक्का बैराज, जो 1975 में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में चालू हुआ था, में गाद जमाव के मुद्दे को उठा रहे हैं. 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि बांग्लादेश के लिए पानी देने की बात करती है. और यह तब भी ज़ारी रहता है जब बिहार के ऊपरी क्षेत्रों में जलस्तर कम क्यों न हो, फलतः इससे पेयजल और कृषि संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं. इस बैराज ने बिहार के ऊपरी क्षेत्रों में गाद (सिल्ट) जमाव किया है, जिससे गंगा का नदी तल ऊंचा हो गया है. नदीतल का ऊंचा होना जल धारण क्षमता को कम करता है और यह बार-बार बाढ़ का कारण बनता है.
सीमा-पार तंत्र (ट्रांसबाउन्डरी मैकेनिज्म) और उससे आगे
बिहार में बाढ़ निस्संदेह एक ट्रांसबाउन्डरी मुद्दा है. उत्तर बिहार की लगभग सभी नदियां तिब्बत, नेपाल से नीचे की ओर बहती हैं और गंगा में मिलती हैं. अब बांग्लादेश के साथ गंगा संधि भी बिहार के जलस्तर को प्रभावित करती है। नेपाल से केंद्रीय जल आयोग के साथ एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मौजूद है, लेकिन अधिक मजबूत रियल टाइम डेटा साझाकरण, उपग्रह आधारित निगरानी और ऐआई (AI)- आधारित जलवैज्ञानिक चेतावनियों की आवश्यकता है, लेकिन नदियों से निपटने के हमारे दृष्टिकोण में बदलाव की भी आवश्यकता है. वनीकरण, नदी तल में न्यूनतम हस्तक्षेप, एक उचित गाद प्रबंधन तंत्र (सिल्ट मैनेजमेंट सिस्टम) और शहरों में जल निकासी की व्यवस्था भी बाढ़ से निपटने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.
(लेखक- डॉ. निशांत कुमार भारद्वाज क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, दिल्ली-एनसीआर कैंपस में मीडिया स्टडीज के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर और सहायक प्रोफेसर हैं और उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पर्यावरण संचार में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है.
(लेखक- डॉ. अक्षय कुमार क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, दिल्ली-एनसीआर कैंपस में मीडिया स्टडीज के सहायक प्रोफेसर हैं और उन्होंने लगभग एक दशक तक जम्मू और कश्मीर में पत्रकारिता की है)