गुजरात को अपनी अगली सरकार चुनने के बमुश्किल 15 महीने पहले विजय रूपाणी ने आज मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उन्हें भाजपा हाईकमान से लिखित संदेश मिला था.
गुजरात में इसे "ऑपरेशन गांधीनगर" कहा जा रहा है, जिसकी बागडोर शक्तिशाली भाजपा महासचिव (संगठन) बी एल संतोष और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के हाथ में थी. दोनों ही नेता फिलहाल गुजरात में विधायकों से मुलाकात कर रहे हैं. संतोष ने कल रात गांधीनगर में रूपाणी से मुलाकात की और उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा. हाल ही में गांधीनगर के दौरे पर गए गृह मंत्री अमित शाह ने भी रूपाणी से मुलाकात की थी. सूत्रों के मुताबिक, शाह ने रूपाणी से कहा था कि वह अब उनकी और मदद नहीं कर सकते.
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भाजपा के आधिकारिक सूत्रों ने मुझे बताया कि 65 वर्षीय रूपाणी को हटाने का मुख्य कारण महामारी की दूसरी लहर से निपटने में नाकामी रही, जिसके चलते प्रधानमंत्री भी नाराज थे. अमित शाह के करीबी रूपाणी को 2016 में गुजरात के शीर्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. पीएम के गृह राज्य में महामारी नियंत्रण को लेकर रूपाणी के कई गलत कदम से प्रधानमंत्री मोदी नाखुश थे.

विजय रूपाणी और अमित शाह. (फाइल फोटो)
गुजरात उच्च न्यायालय ने मई, 2020 में रूपाणी प्रशासन को "अहमदाबाद अस्पतालों में मौतों की खतरनाक संख्या" के लिए फटकार लगाई थी. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता जो अब मुख्यमंत्री पद के लिए चर्चाओं में भी हैं, ने कहा, "रूपाणी महामारी से निपटने में पूरी तरह नाकाम रहे, यहां तक कि कंटेन्मेंट जोन्स में भी. शाह ने उन्हें महामारी से निपटने के लिए बेहतर और तेज कार्य के लिए कई बार बात की, लेकिन रूपाणी संकट से घबराए हुए लगे.
रूपाणी के इस्तीफा देने के पीछे यह कारण भी रहा कि वह पांच साल के कार्यकाल के बाद भी गुजरात प्रशासन को संभालने में असमर्थ लग रहे थे. वरिष्ठ अधिकारियों और विधायकों ने उनकी तुलना पीएम से की, जो राज्य में तीन बार के मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासन पर लोहे जैसी मजबूत पकड़ रखते थे. यहां तक कि विजय रूपाणी की तुलना में आनंदीबेन पटेल गुजरात में अपने सीएम कार्यकाल के दौरान अधिक नियंत्रण में थीं.
गौरतलब है कि अमित शाह ने आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए मजबूर किया था, जिसके बाद रूपाणी ने उनसे पदभार ग्रहण किया. आनंदीबेन पटेल के साथ अमित शाह की लंबी प्रतिद्वंद्विता गुजरात में मोदी कैबिनेट के वक्त से चली आ रही थी. रूपाणी शाह की पसंद थे और अब कोविड के चलते हाशिये पर हैं. विधायकों और अधिकारियों का यह भी दावा है कि रूपाणी के परिवार, विशेषकर उनकी पत्नी अंजलि रूपाणी को सीधे अधिकारियों को बुलाकर प्रशासन में हस्तक्षेप करते देखा गया. ये "सुपर सीएम" कहानियां पीएम को अच्छी नहीं लगीं.

विजय रूपाणी और उनकी पत्नी अंजलि रूपाणी. (फाइल फोटो)
रूपाणी सरकार के पतन के बारे में व्यापक जानकारी रखने वालों का मानना है कि यह कार्रवाई भाजपा को चुनाव से पहले गुजरात के अपने गढ़ में सत्ता विरोधी लहर को हटाने और शासन को मजबूत करने में मदद करेगी. पार्टी कथित तौर पर गुजरात में एक ''नया युवा चेहरा" और एक नई टीम चाहती थी.
गांधीनगर बीजेपी हलकों का मानना है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और मोदी के पसंदीदा मनसुख मंडाविया रूपाणी की जगह लेंगे. लेकिन महामारी की संभावित तीसरी लहर से पहले स्वास्थ्य पोर्टफोलियो में बदलाव पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है. साथ ही मंडाविया राज्यसभा सांसद हैं और उन्हें विधानसभा के लिए चुना जाना होगा, ऐसी स्थिति में उन्हें दिल्ली में ही रहना होगा.
गुजरात में इस बड़े सियासी उलटफेर के बाद ऐसा लगता है कि पीएम मोदी ने गुजरात की राजनीति में मजबूती से वापसी के साथ चुनावी बागडोर संभाल ली है. गुजरात के नए मुख्यमंत्री के चुनाव में पीएम सभी को आश्चर्यचकित कर सकते हैं. पीएम शुरू से ही विरोधियों और मीडिया को संशय की मझधार में रखना पसंद करते हैं.

विजय रूपाणी और पीएम मोदी (फाइल फोटो)
2017 में, बीजेपी ने 99 सीटों के साथ लगातार छठी बार गुजरात में सरकार बनाई. वहीं, कांग्रेस ने 77 सीटों पर जीत हासिल कर सभी को चौंका दिया था. यह चुनाव पीएम मोदी को शाह द्वारा दिए गए धन्यवाद के रूप में देखा गया था. लेकिन मोदी ने अपने मूल्यांकन के साथ गृह राज्य में अपनी अभियान यात्राओं में वृद्धि की और उन्हें मतदाताओं से भावनात्मक अपील करते देखा गया. पीएम के इस कदम के बाद से कांग्रेस राज्य में अपनी बढ़त खो चुकी है और अब गुजरात में पूरी तरह से अस्त-व्यस्त है.
रूपाणी के इस्तीफे यह तस्वीर साफ हो गई है कि मोदी और शाह द्वारा मुख्यमंत्रियों को हटाने में शक्ति का प्रयोग जारी है. उत्तराखंड में भी ऐसा ही हुआ, मार्च में राज्य की कमान संभालने वाले तीरथ सिंह रावत को हटाते हुए जुलाई में पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंप दी गई. कर्नाटक में बी एस येदियुरप्पा की जगह बी बोम्मई को लाया गया. इससे भी बड़ा सबूत यह कि जरूरत पड़ने पर मोदी-शाह चुनावों पर स्थायी रूप से केंद्रित हैं.
(स्वाति चतुर्वेदी लेखिका तथा पत्रकार हैं, जो 'इंडियन एक्सप्रेस', 'द स्टेट्समैन' तथा 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' के साथ काम कर चुकी हैं...)
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