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This Article is From Aug 03, 2018

वे चालीस लाख लोग...

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 03, 2018 18:15 pm IST
    • Published On अगस्त 03, 2018 18:07 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 03, 2018 18:15 pm IST
चालीस लाख लोग आधा इ़ज़राइल बनाते हैं.
चालीस लाख लोग एक पूरा क्रोएशिया बनाते हैं.
चालीस लाख लोग एक पूरा कुवैत बनाते हैं.
चालीस लाख लोगों से दो बहरीन बन जाते हैं.
चालीस लाख लोग 12 आइसलैंड बनाते हैं.
चालीस लाख लोग एक पूरा मुल्क बनाते हैं.
आज हिंदुस्तान में एक मुल्क 40 लाख नागरिकताविहीन लोगों का है.
सरकार कह रही है कि इन 40 लाख लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के मौक़े दिए जाएंगे.
मान लें, इन 40 लाख लोगों में कुछ और लोग भी अपने दस्तावेज़ों के ज़रिेए ख़ुद को भारत का वैध नागरिक साबित कर लेंगे.
लेकिन बहुत सारे लोग ऐसे होंगे जिनके पास यह साबित करने का कोई कागज़ नहीं होगा कि वे 1971 से पहले भी भारत या असम में रहते थे.
यानी एक मुल्क नागरिकताविहीन संदिगध लोगों का बचा रहेगा.
भारत इस मुल्क का क्या करेगा?
क्या उन्हें बांग्लादेश भेज देगा?
लेकिन बांग्लादेश कह चुका है कि असम का नागरिकता रजिस्टर भारत का अंदरूनी मामला है, उसका कोई नागरिक भारत में नहीं है.
फिर भारत क्या करेगा?
क्या उन्हें किसी कन्सन्ट्रेशन कैंप में रखेगा?
क्या लाखों लोगों को ऐसे किसी कैंप में अनंत वर्षों तक रखना संभव है?
बेशक, इन सबसे जुड़े प्रतिप्रश्न भी हैं.
क्या वाकई बांग्लादेश से बहुत सारे लोग 1971 के बाद भारत नहीं आए हैं?
क्या यह उचित नहीं है कि उन्हें उनके देश वापस भेज दिया जाए?
क्या भारत दूसरे नागरिकों की मजबूरियों का बोझ ढोता रहेगा?
जाहिर है, राजनीतिक राष्ट्रवाद की भाषा इन प्रश्नों के जवाब के लिए पर्याप्त नहीं है.
इतिहास और भूगोल कई बार मुल्कों को सिकुड़ने और फैलने की वजह देते है.
जो बड़े मुल्क होते हैं, वे इन विडंबनाओं को पचाते चलते हैं.
भारत ने भी इस विडंबना को पचाने की कोशिश की.
लेकिन जो नई विडंबनाएं भारतीय समाज में उभरीं उन्होंने नागरिकता के इस सवाल को कहीं ज़्यादा विडंबनापूर्ण बना डाला है.

मामला सिर्फ 40 लाख लोगों का नहीं रह गया है, एक बहुत बड़ी आबादी को यह संदेश देने का भी है कि अंततः यह देश यहां रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं का है. बाकी लोगों को उनकी शर्तों पर जीना पड़ेगा.

असम के नागरिकता रजिस्टर से उठने वाला असली अंदेशा यही है- यह सिर्फ 40 लाख लोगों की नागरिकता तय करने का मामला नहीं है, करोड़ों दूसरे लोगों को यह दिखाने का मामला भी है कि वे भारत में अपनी नागरिकता को असंदिग्ध न मानें. उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक साबित करने की कोशिश तो अरसे से चल रही है. जनसंघ ने 'हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान' जो नारा एक दौर में दिया था, उसकी अप्रासंगिकता भले वह समझने लगी हो, लेकिन आज़ादी के बाद से ही संघ परिवार मध्यवर्गीय हिंदू घरों को यह समझाने में लगा हुआ है कि 1947 के विभाजन के बाद बाकी भारत को सिर्फ हिंदुओं का होना था. दुहराने की ज़रूरत नहीं कि भारतीयता की अवधारणा की सबसे इकहरी और क्रूर व्याख्या यही थी. यह वही व्याख्या है जो पिछले कुछ वर्षों में एक उन्मादी भीड़ के जेहन में बस चुकी है. इस भीड़ को लगता है कि जो उसके विश्वासों पर नहीं चलता, जो उसके खानपान पर अमल नहीं करता, जो उसके पहनावे और रहन-सहन से अलग है, वह संदिग्ध है, अभारतीय है. गाय के नाम पर हिंसा, बिरयानी के नाम पर ताने, दाढ़ी के नाम पर उत्पीड़न इसी प्रवृत्ति का विस्तार है.

असम में बन रहे नागरिकता रजिस्टर पर लौटें. अगर 40 लाख लोगों में आधे लोग अपनी नागरिकता साबित न कर पाए तो क्या होगा? क्या सरकार उन्हें किन्हीं शिविरों में रखेगी? क्या उन्हें अपराधी मान कर उन पर मुक़दमा चलाया जाएगा? चूंकि इतने लोगों पर मुक़दमा चलाना संभव नहीं होगा तो क्या उन्हें एक साथ निबटाने के ज़्यादा पैशाचिक तरीक़े सोचे जाएंगे? इस बीच, चूंकि ये नागरिक हों या न हों, मगर ज़िंदा लोग होंगे जिन्हें भूख लगेगी, प्यास सताएगी, चिंता रुलाएगी, उनके बच्चे होंगे, उनके भविष्य की फ़िक्र होगी, तो ये लोग क्या करेंगे? क्या इन्हें रोज़गार मिलेगा? क्या इनके बच्चों को पढ़ने की सुविधा मिलेगी? ये किन घरों में रहेंगे?

ये वे सवाल हैं जिनके जवाब राष्ट्रवाद की सुगठित परिभाषाओं के भीतर नहीं, मनुष्यता के व्यापक दायरे में सोचने होंगे. राष्ट्र बेहद बहुमूल्य होते हैं. मगर वे अंतिम सत्य नहीं होते. बीसवीं सदी का नक्शा देख लें- यह समझ में आ जाएगा कि देश कितनी बार टूटते और जुड़ते हैं. जिन मुल्कों ने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध लड़े, वे इक्कीसवीं सदी में एक हो चुके हैं. ख़ुद भारत तीन हिस्सों में बंट चुका है. कभी लाहौर वाले भी हिंदुस्तान को अपना मुल्क कहते थे और ढाका वाले भी.

नागरिकताएं भी बदलती रहती है. बेल्जियम की मदर टेरेसा भारत की हो गईं, ईसाई फ़ादर कामिल बुल्के राम के हो गए. बहुत सारे भारतीय दूसरे देशों के नागरिक हो चुके हैं. ये आप्रवासी भारतीय पराये नहीं हैं- शायद आज की तारीख़ में कुछ ज़्यादा ही देशभक्त बने हुए हैं. प्रधानमंत्री अपने दौरों में ख़ास तौर पर ऐसे भारतीयों से मिलने का एक कार्यक्रम रखते हैं. ऐंटिगा बता रहा है कि उसने प्रधानमंत्री के 'मेहुल भाई' को भारत के अनापत्ति प्रमाण पत्र के बाद अपनी नागरिकता दे दी.

जो लोग तीस-चालीस या पचास बरस पहले भारत आ गए होंगे, वे भी धीरे-धीरे भारतीय हो चुके हैं. इनकी यहां शादियां हुई होंगी, बच्चे हुए होंगे. वे बच्चे आख़िर किस मुल्क के कहलाएंगे? मिट्टी भी अपने बाशिंदों को अपना कुछ हक़, अपनी कुछ महक देती है. भारतीयता सरकारों का दिया हुआ प्रमाण पत्र नहीं होती, वह एक मिज़ाज भी है. भारतीय होने के लिए सरकारों के प्रमाण पत्र भर नहीं चाहिए होते हैं.

दुनिया का कोई देश नहीं है जो अपने यहां बाहर वालों को बसाता नहीं चलता. बाहर वाले भीतर वाले होते चलते हैं और समाज के लेनदेन से कुछ ख़ुद बदलते हैं, कुछ समाज को बदलते हैं. बंद मुल्क बड़े मुल्क नहीं होते.

भारत एक बड़ा मुल्क है. सिर्फ़ भूगोल और जनसंख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि अपनी उस ऐतिहासिक विरासत की वजह से भी जिसमें दुनिया भर के लोग आते गए, भारतीय होते चले गए. यह मौका इस भारतीयता को और विस्तार देने का हो सकता है. समाज और सरकार को अपना दिल बड़ा करना चाहिए. वरना 40 लाख लोगों का एक नागरिकताविहीन समाज हमारे भीतर एक रिसते हुए ज़ख्म की तरह बना रहेगा, हमें कुछ कमज़ोर भी करेगा, कुछ क्रूर भी बनाएगा. संकट बस इतना है कि जब हर असहमति भरे सुझाव को देशद्रोह की नज़र से देखने का चलन बन गया हो, तब ऐसा सुझाव कौन दे, और कौन इसकी पहल करे.

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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