पांच अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से विशेष संवैधानिक दर्जा हटाया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे साहसिक और दूरगामी फैसलों में से एक था. सात साल बीत जाने और आठवें वर्ष में प्रवेश करने के इस मौके पर, इस निर्णय का आकलन न तो आत्मसंतुष्ट जयघोष के साथ होना चाहिए न ही रूढ़िवादी संदेह के साथ बल्कि एक ईमानदार, विद्वत्तापूर्ण तराजू पर तौलकर. दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कदम को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया. देशभर में इसका व्यापक स्वागत हुआ. लेकिन सात साल पर्याप्त समय है यह पूछने के लिए: क्या हासिल हुआ, क्या अभी अधूरा है और भविष्य की समृद्धि के आगे अब भी कौन-सी छायाएं मंडरा रही हैं.
अनुच्छेद 370 हटने से किसे हुए सबसे अधिक फायदा
अनुच्छेद 370 हटाने के पक्षधरों का तर्क था कि यह प्रावधान अलगाववाद, भ्रष्टाचार और एक वंशवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखने का कानूनी बहाना बन गया था. इसमें आम कश्मीरी गरीब रहा जबकि एक छोटा-सा तंत्र मालामाल हुआ. सात साल बाद इस तर्क का सबसे मजबूत प्रमाण पर्यटन क्षेत्र में मिलता है. साल 2023 से 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर में कुल 7.85 करोड़ पर्यटक आए, जबकि 2016-18 की समान अवधि में यह संख्या मात्र 4.76 करोड़ थी. वर्ष 2024 में अकेले रिकॉर्ड 2.35 करोड़ पर्यटक पहुंचे, जिनमें 65,452 विदेशी शामिल थे. यह कोविड-काल की मंदी से एक नाटकीय वापसी और वादी में सामान्य जीवन बहाली का प्रतीक बना. बुनियादी ढांचे में निवेश, केंद्रीय कल्याण योजनाओं का विस्तार, और अनुच्छेद 35ए के भेदभावपूर्ण अधिवास प्रावधानों को हटाना, इन सबको वास्तविक एकीकरण और आर्थिक मुख्यधारा में शामिल करने के कदमों के रूप में पेश किया गया. एक दशक के अंतराल के बाद 2024 में हुए विधानसभा चुनाव ने भी इस नई व्यवस्था को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान की.
लेकिन सबसे बड़ी अधूरी प्रतिबद्धता स्वयं राज्य के दर्जे की बहाली है. जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने को वैध ठहराया, तो उसने स्पष्ट रूप से केंद्र को निर्देश दिया कि विधानसभा चुनाव के बाद 'जल्द से जल्द' राज्य का दर्जा बहाल किया जाए. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में एक निर्वाचित सरकार अक्टूबर 2024 से सत्ता में है. इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर उपराज्यपाल के अधीन एक केंद्र शासित प्रदेश ही बना हुआ है. अब्दुल्ला ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत 40 से अधिक राजनीतिक नेताओं को पत्र लिखकर संसद से राज्य का दर्जा बहाल करने का कानून बनाने की अपील की है. नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी तो और आगे बढ़कर अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली की मांग करते हैं, जबकि कांग्रेस ने 'हमारी रियासत,हमारा हक' के बैनर तले विरोध मार्च के साथ एक समानांतर अभियान शुरू किया है. अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट में समय-सीमा तय कर राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई हुई, हालांकि अदालत ने इसका तरीका और समय-सीमा केंद्र के विवेक पर छोड़ दिया. अदालत ने हाल ही में यह भी टिप्पणी की कि राज्य के दर्जे पर कोई भी फैसला पहलगाम हमले के सुरक्षा प्रभावों को नजरअंदाज नहीं कर सकता.
कब पूर्ण राज्य बनेगा जम्मू कश्मीर
यहीं पर विद्वत्तापूर्ण निष्पक्षता को समर्पण के बिना सहानुभूति दिखाने की जरूरत है. बिना पूर्ण विधानसभा वाले किसी अन्य केंद्र शासित प्रदेश को इतने लंबे समय तक राज्य का दर्जा न देने का कोई उदाहरण भारत के संघीय संवैधानिक ढांचे में नहीं मिलता है. जम्मू-कश्मीर में तो विभाजन के करीब सात साल बाद और एक निर्वाचित सरकार के सत्तासीन होने के डेढ़ साल बाद भी यह प्रश्न लंबित है. सुरक्षा तर्क समझ में आते हैं, लेकिन अनिश्चितकालीन देरी उस लोकतांत्रिक वैधता को ही कमजोर करता है, जो 2024 के चुनाव से हासिल होनी थी. यह जोखिम भी उठाता है कि अलगाववादी विमर्श को यह संदेश मिले कि मुख्यधारा की चुनावी राजनीति वास्तविक सत्ता नहीं दे सकती. नई दिल्ली की सतर्कता समझ में आती है, लेकिन राजनीतिक सावधानी को स्थायी संवैधानिक विसंगति नहीं बनने देना चाहिए.
आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर वास्तव में मिश्रित है. सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में पर्यटन का योगदान 2019-पूर्व के लगभग 6-7 प्रतिशत से बढ़कर अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लगभग 9-9.5 प्रतिशत हो गया. यह पर्यटन-आधारित विकास की ओर एक संरचनात्मक बदलाव दर्शाता है. लेकिन यह वृद्धि भौगोलिक रूप से असंतुलित और सुरक्षा झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनी हुई है. वैष्णो देवी जैसे तीर्थस्थलों की ओर बढ़ते धार्मिक पर्यटन के कारण जम्मू संभाग कुल पर्यटकों की संख्या का 85 फीसद से अधिक हिस्सा रखता है, जबकि कश्मीर वादी जिसे बदलने के लिए यह पूरी कवायद मुख्य रूप से की गई थी, वहां पहलगाम हत्याकांड के बाद पर्यटकों की संख्या 2024 के 98 लाख से घटकर 2025 में 12 लाख से भी नीचे आ गई. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब पर्यटन का जीएसडीपी में योगदान सात प्रतिशत से नीचे रह गया है. यह दिखाता है कि एक ही आतंकी हमला सालों की मेहनत से हासिल आर्थिक बहाली को मिटा सकता है. पर्यटन के अलावा, निजी औद्योगिक निवेश, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजन और सरकारी नौकरियों और बागवानी से आगे बढ़कर विविधीकरण अब भी अधूरे काम हैं, जबकि बेरोजगारी और कुशल युवाओं का पलायन वादी की अर्थव्यवस्था पर बोझ बना हुआ है.
जम्मू कश्मीर में घटता सीमा पार आतंकवाद
जम्मू-कश्मीर के भविष्य के लिए सबसे गंभीर चुनौती सीमा-पार आतंकवाद का बना रहना है, वास्तव में, उसका रूप बदलना है न कि उसका खत्म होना. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविक उपलब्धियां हासिल हुई हैं. इसके मुताबिक 2024 में आतंकी घटनाएं पिछले सालों की तुलना में 47 फीसद घटीं. वहीं मारे गए आतंकवादियों की संख्या 2019 के 157 से घटकर 2024 में 68 रह गई. यह विदेशी घुसपैठियों और हाइब्रिड आतंकियों दोनों के खिलाफ सुरक्षा बलों की सफल कार्रवाई को दर्शाती है. लेकिन 2025 ने एक कठोर याद दिलाई कि यह खतरा खत्म नहीं हुआ है, बस उसका रूप बदला है. पहलगाम की सुंदर वादियों में 22 अप्रैल 2025 का लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े बंदूकधारियों ने 26 नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. मरने वालों में अधिकांश हिंदू थे. उन्हें उनका धर्म पूछकर मार गया था. 2008 के मुंबई हमलों के बाद यह सबसे भीषण आतंकी हमला था. इसने भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' को जन्म दिया. इसके तहत पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों पर हमले किए गए.
शोध से एक स्पष्ट प्रवृत्ति सामने आती है- शुरुआती सुरक्षा-प्रेरित शांति का दौर (2019-2020), फिर हाइब्रिड, कम-दृश्य वाले उग्रवाद का पुनरुत्थान (2021-2023) और 2024 से एक 'घातक वृद्धि' का दौर. इसमें पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और प्रवासी मजदूरों पर हुए हमले शामिल हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि उग्रवाद का भूगोल कश्मीर वादी से दक्षिण की ओर जम्मू संभाग के राजौरी, पुंछ, डोडा और कठुआ जिलों की ओर खिसक गया है. ये वो इलाके हैं जिन्हें लंबे समय से शांतिपूर्ण माना जाता था. यह दिखाता है कि घुसपैठ के रास्ते और भूभाग का दुरुपयोग बस स्थानांतरित हुआ है, खत्म नहीं हुआ है. 2025 में 35 घटनाओं में 46 आतंकवादी मारे गए, कुछ अनुमानों के अनुसार भले ही कुल हिंसा 25 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई, यह याद दिलाता है कि सुरक्षा उपलब्धियां वास्तविक हैं लेकिन स्थितियां बदल जाने के योग्य भी हैं. लश्कर-ए-तैयबा जैसे पाकिस्तान से चल रहे आतंकवादी संगठन और उनके मुखौटा संगठन हमला करने की मंशा और क्षमता दोनों रखते हैं.
जम्मू कश्मीर के सामने चुनौतियां क्या क्या हैं
पांच अगस्त 2019 के सात साल बाद, अनुच्छेद 370 हटाने की मूल उपलब्धि निर्विवाद है- जम्मू-कश्मीर 1947 के बाद से किसी भी समय से अधिक संवैधानिक और प्रशासनिक रूप से भारतीय संघ में एकीकृत है. राज्य ने चुनाव करवाने, पर्यटन को पुनर्जीवित करने और संगठित उग्रवाद को पूरी तरह खत्म न भी किया हो तो भी, कम करने में पर्याप्त लचीलापन दिखाया है. लेकिन कागज पर एकीकरण, व्यवहार में सुलह के समान नहीं है. पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली, एक नाजुक पर्यटन क्षेत्र से आगे व्यापक आर्थिक अवसर प्रदान करना और एक सीमा-पार आतंकी तंत्र को निर्णायक रूप से हराना, जो पीछे हटने के बजाय बस अनुकूलित हुआ है, इस परियोजना के तीन अधूरे काम बने हुए हैं. भारत का दीर्घकालिक हित समय से पहले जीत की घोषणा करने में नहीं, बल्कि सुरक्षा उपलब्धियों को स्थायी राजनीतिक विश्वास में बदलने में है, क्योंकि एक सुरक्षित, समृद्ध और वास्तव में स्वशासित जम्मू-कश्मीर ही एकीकरण का वह संस्करण है जो नई दिल्ली की किसी भी एक सरकार से आगे भी टिका रहेगा. यह आशावाद निराधार नहीं है, यह पिछले सात सालों में हासिल की गईं कठिन उपलब्धियों पर टिका हुआ है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति अब उस विश्वास-निर्माण की दिशा में मुड़े जिसकी वादी और उसके पार का जम्मू-लद्दाख क्षेत्र, दोनों को सख्त जरूरत है. साहस से लिया गया फैसला अब सहनशील, समावेशी राजनीति से पूरा होना चाहिए, यही अगले चार-पांच सालों की सच्ची परीक्षा होगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)