विज्ञापन

स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं युवा, कैसे हुआ संघ का विस्तार

राजीव तुली
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 10, 2026 18:37 pm IST
    • Published On अगस्त 10, 2026 18:37 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 10, 2026 18:37 pm IST
स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं युवा, कैसे हुआ संघ का विस्तार

विजयादशमी, 27 सितंबर 1925. नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के घर पर कुछ युवाओं का (उस समय के जेन—जी का) एक संकल्प आकार ले रहा था. इन्हीं युवाओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी. स्थापना के समय डॉ. हेडगेवार के साथ भाऊजी कावरे, अण्णा सोहनी, विश्वनाथराव केलकर, बालाजी हुद्दार, बापूराव भेदी और मार्तंडराव जोग जैसे युवा जुड़े थे. स्थापना के दिन शाम को हुई सभा में 17 युवकों की सहभागिता रही. 28 मई 1926 को नागपुर के मोहितेवाड़ा मैदान में पहली नियमित दैनिक शाखा प्रारंभ हुई.

पहली शाखा में शामिल तरुणों ने मातृभूमि की रक्षा, व्यक्ति निर्माण और समाज को एकता के सूत्र में बांधने का प्रण लिया. अपने जीवन को संघ कार्य के लिए समर्पित करते हुए उन्होंने जिस युवा ऊर्जा का परिचय दिया, वह आगे चलकर एक ऐसे संगठनात्मक वटवृक्ष में बदल गई, जिसकी शाखाएं देश के कोने-कोने तक पहुंचीं.

संघ की स्थापना के बाद वही युवा देश के अलग-अलग हिस्सों में संघ कार्य के विस्तार के लिए गए. उन्होंने अपनी शिक्षा भी पूरी की और साथ-साथ संघ का कार्य भी प्रारंभ किया. इस तरह युवा संघ के लिए केवल संगठन की शुरुआत करने वाली शक्ति नहीं रहे, बल्कि उसके विस्तार और निरंतरता की मुख्य धुरी बने. युवा नेतृत्व की यह परंपरा आगे भी दिखाई दी. जब माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें श्री गुरुजी के नाम से जाना जाता है, संघ के दूसरे सरसंघचालक बने, तब उनकी आयु केवल 34 साल थी. इससे स्पष्ट होता है कि संगठन में युवाओं को जिम्मेदारी देने की परंपरा केवल प्रारंभिक दौर तक सीमित नहीं रही. वर्तमान में जिला और विभाग प्रचारकों की आयु 23 से 35 साल के बीच है, जबकि प्रांत प्रचारकों की औसत आयु 40-45 साल है.

विद्यार्थी और युवा संगठन की मुख्यधारा में

विद्यार्थियों और युवाओं को संगठन की मुख्यधारा से जोड़ने की यह परंपरा आगे चलकर संघ से प्रेरित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे छात्र संगठन के रूप में भी सामने आई. विद्यार्थी जीवन को शिक्षा के साथ सामाजिक दायित्व और राष्ट्र जीवन से जोड़ने की दृष्टि ने युवाओं के लिए संगठनात्मक कार्य का एक व्यापक क्षेत्र तैयार किया.

1948 में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान सत्याग्रह में विद्यार्थियों की बड़ी भूमिका रही. साल 1975 के आपातकाल के दौरान भी छात्रों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए सत्याग्रह किया. कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में विद्यार्थियों की यह सक्रियता बताती है कि युवा संघ से जुड़े सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं. आज करीब एक लाख स्थानों तक संघ का काम पहुंच चुका है. इनमें करीब 80 फीसदी स्वयंसेवक छात्र हैं. संगठनात्मक दायित्वों में भी युवा आगे हैं.

आंकड़े बताते हैं कि युवाओं में लोकप्रिय हो रहा है संघ

युवाओं को संगठन के केंद्र में रखने की यह परंपरा केवल इतिहास का विषय नहीं है. संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुत आंकड़े भी इसके विस्तार की तस्वीर सामने रखते हैं. 

Latest and Breaking News on NDTV

2026 की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के आंकड़ों के अनुसार, एक वर्ष में देशभर में 5,500 से अधिक नई शाखाएं शुरू हुईं. शाखाओं की संख्या करीब 6,000 की वृद्धि के साथ 88,000 से अधिक हो गई और शाखा संचालित होने वाले स्थान 55,000 से अधिक हो गए. विस्तृत आंकड़ों के अनुसार शाखाओं की संख्या 83,129 से बढ़कर 88,949 और स्थानों की संख्या 51,740 से बढ़कर 55,683 हो गई.

नई पीढ़ी की संघ से जुड़ने की रुचि डिजिटल माध्यम में भी दिखाई देती है. 2012 से 2026 तक 'Join RSS' के माध्यम से करीब 26 लाख पंजीकरण हुए हैं. इनमें 22 से 35 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की हिस्सेदारी 62 फीसद है. यह औपचारिक सदस्यता का आंकड़ा नहीं, बल्कि संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त करने वाले लोगों का आंकड़ा है.

हर वर्ष करीब 1.25 लाख लोग 'Join RSS' के माध्यम से संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त करते हैं. यानी संगठन के साथ संवाद का एक बड़ा हिस्सा नई और युवा पीढ़ी से हो रहा है.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में लाखों युवा

युवाओं से संवाद का एक बड़ा क्षेत्र अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद है. वर्तमान में परिषद की 4,195 इकाइयां, 4,540 संपर्क केंद्र और 5,638 महाविद्यालय इकाइयां हैं. इसकी कुल सदस्यता 77,26,129 छात्रों की है. इतनी बड़ी छात्र भागीदारी बताती है कि विद्यार्थी क्षेत्र में युवा केवल दर्शक या समर्थक की भूमिका में नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं. शिक्षा से जुड़े प्रश्नों से लेकर सामाजिक विषयों तक विद्यार्थियों की सक्रियता इस युवा शक्ति को दिशा देने का माध्यम बनती है.

इस समय शाखाओं की संख्या 83,129 से बढ़कर 88,949 और स्थानों की संख्या 51,740 से बढ़कर 55,683 हो गई है.

इस समय शाखाओं की संख्या 83,129 से बढ़कर 88,949 और स्थानों की संख्या 51,740 से बढ़कर 55,683 हो गई है.

युवा और किशोर पीढ़ी के साथ संवाद का एक बड़ा क्षेत्र शिक्षा है. संघ से प्रेरित संगठन विद्या भारती के अंतर्गत 12,068 औपचारिक विद्यालय और 10,178 अनौपचारिक शिक्षा केंद्र संचालित हैं. इस तरह कुल 22,246 शैक्षणिक संस्थान हैं. इन संस्थानों में 1,52,624 शिक्षक औपचारिक विद्यालयों में और 10,234 शिक्षक अनौपचारिक शिक्षा केंद्रों में कार्यरत हैं. कुल शिक्षकों की संख्या 1,62,858 है.

औपचारिक विद्यालयों में 33,32,774 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जबकि 2,53,435 विद्यार्थी अनौपचारिक शिक्षा केंद्रों में नामांकित हैं. इस प्रकार कुल 35,86,209 विद्यार्थी इस शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हैं. ये विद्यार्थी मुख्य रूप से Gen-Z और Gen-Alpha की नई पीढ़ी से आते हैं. अर्थात शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी के साथ संवाद का दायरा लाखों विद्यार्थियों तक पहुंचता है. यहां शिक्षा के साथ संस्कार, सामाजिक दायित्व और राष्ट्र जीवन से जुड़ने की दृष्टि विकसित करने का प्रयास होता है.

प्रशिक्षण और अनुभव का हस्तांतरण

युवा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने के साथ उनके प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाता है. 2026 में 83 संघ शिक्षा वर्ग और 12 कार्यकर्ता विकास वर्ग आयोजित हुए.इनमें 18,842 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया.संघ की कार्यपद्धति में वरिष्ठ और युवा कार्यकर्ताओं के बीच अनुभव का हस्तांतरण भी महत्वपूर्ण है. वरिष्ठ अधिकारी अपने अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं. इससे एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी की ऊर्जा के साथ जुड़ता है.

यही क्रम संगठनात्मक नेतृत्व में भी दिखाई देता है. अपेक्षाकृत कम आयु में दायित्व संभालने वाले कार्यकर्ता आगे बढ़ते हैं और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में अपने अनुभव को विकसित करते हैं. इससे संगठन में नेतृत्व की निरंतर नई पीढ़ी तैयार होती रहती है.

सेवा के माध्यम से युवा शक्ति

युवा ऊर्जा का एक दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र सेवा कार्य है. आपदा, महामारी या संकट की स्थिति में संघ से जुड़े सेवा कार्यों में युवा कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभाते हैं. बाढ़, प्राकृतिक आपदा और कोरोना महामारी जैसी परिस्थितियों में सेवा भारती तथा अन्य सेवा गतिविधियों के माध्यम से राहत और सहायता का काम किया गया.

कोरोना महामारी के दौरान 2020-21 में 3,42,000 स्वयंसेवकों ने 67,000 स्थानों पर सेवा कार्य किया. इस दौरान 50 लाख परिवारों तक राशन किट पहुंचाई गई और तीन करोड़ लोगों तक भोजन के पैकेट पहुंचाए गए. सामान्य वर्षों में भी संघ परिवार की ओर से करीब 15,000 चिकित्सा शिविर प्रतिवर्ष आयोजित किए जाते हैं. इन सेवा कार्यों में युवा कार्यकर्ताओं को समाज की वास्तविक परिस्थितियों से सीधे जुड़ने का अवसर मिलता है. वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा का यह मेल सेवा कार्यों को आगे बढ़ाता है.

युवा शक्ति की दिशा

युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ऊर्जा होती है. यही ऊर्जा सही दिशा में चले तो निर्माण करती है और नकारात्मकता से प्रभावित हो तो टकराव को जन्म दे सकती है. इसलिए सवाल युवा शक्ति का नहीं, उसकी दिशा का है. भारत की परंपरा में स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए प्रेरणा रहे हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खान, अब्दुल हमीद, सावरकर और वीर गोकुला जैसे राष्ट्रनायकों ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि युवा शक्ति व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित हो सकती है.

आरएसएस की स्थापना के समय से ही बड़ी संख्या में युवक-युवतियां इससे जुड़ी हुए हैं.

आरएसएस की स्थापना के समय से ही बड़ी संख्या में युवक-युवतियां इससे जुड़ी हुए हैं.

आज युवा शक्ति के सामने तकनीक, उद्यम और नवाचार के नए अवसर हैं. डिजिटल इंडिया, भारतनेट और यूपीआई जैसी पहलों ने गांवों और छोटे शहरों के युवाओं के लिए नए रास्ते खोले हैं. स्मार्टफोन के माध्यम से युवा ऑनलाइन कारोबार, कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स से जुड़ रहे हैं. यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फ्रीलांसिंग जैसे माध्यम उन्हें वैश्विक बाजार से जोड़ रहे हैं.

युवा शक्ति को केवल विरोध और आक्रोश की दृष्टि से देखना उसके व्यापक सामर्थ्य को सीमित करना होगा. लोकतंत्र में गलत नीतियों और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन उसी ऊर्जा को शिक्षा, तकनीक, उद्यम, सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

एक शताब्दी, नई पीढ़ी के साथ

1925 में कुछ युवाओं ने नागपुर में एक छोटी-सी शाखा से जो शुरुआत की थी, वह 100 साल की यात्रा पूरी कर एक व्यापक वटवृक्ष बन चुकी है. संघ की 100 वर्ष की इस यात्रा को केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी युवा शक्ति को सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व से जोड़ने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है. युवा ऊर्जा केवल परिवर्तन की शक्ति नहीं, राष्ट्र निर्माण की शक्ति भी है. जरूरत केवल यह तय करने की है कि उस ऊर्जा को किस दिशा में लगाया जाए.

(डिस्क्लेमर: लेखक राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणीकार हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
RSS, Mohan Bhagwat, Gen Z 2026
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com