रोडवेज़ बनाम रन-वे : यूपी की बसों और डिपो को विकास का इंतज़ार

रन-वे के दौर में रोड-वेज़ की बात. दास्सों कंपनी के जहाज़ों के सामने डिपो की वीरता का बखान बेहद ज़रूरी है. सर्वप्रथम डिपो की परिभाषा. डिपो उस एयरपोर्ट को कहते हैं जहां पर ज़मीन पर उड़नेवाली वाली बसें निकलती हैं और वापस आती हैं. यहां पर हर दिन लाखों यात्री बस से उतरते हैं, बस में चढ़ते हैं. बड़े बड़े एयरपोर्ट बिक गए लेकिन डिपो नहीं बिका है.

रन-वे के दौर में रोड-वेज़ की बात. दास्सों कंपनी के जहाज़ों के सामने डिपो की वीरता का बखान बेहद ज़रूरी है. सर्वप्रथम डिपो की परिभाषा. डिपो उस एयरपोर्ट को कहते हैं जहां पर ज़मीन पर उड़नेवाली वाली बसें निकलती हैं और वापस आती हैं. यहां पर हर दिन लाखों यात्री बस से उतरते हैं, बस में चढ़ते हैं. बड़े बड़े एयरपोर्ट बिक गए लेकिन डिपो नहीं बिका है. उत्तर प्रदेश के डिपो की कहानी सुनाने का मौका नहीं मिलता अगर आज कई ज़िलों के डिपो से बसों को प्रधानमंत्री के कार्यक्रम हेतु रवाना नहीं किया गया होता. इन सभी बसों के आगे बैनर लगे हैं. इन्हें कोड नंबर भी दिया गया है. इन सभी में गांव गांव से लोग लाए गए हैं. लोग भी और लाभार्थी भी. सुल्तानपुर की तरफ पहुंच रही इन बसों के कारण को कवर कर रहे थे क्योंकि जहां से ये बसें लाई गईं हैं वहां के यात्री सड़कों पर भटक रहे थे.

ये तो कार्यक्रम में लाए गए लोगों की दास्तां है, इनके कारण जो कहीं नहीं पहुंच सके उनकी दास्तां अब आगे देखिए. अगर आपसे कहा जाए कि रोडवेज़ यानी सरकारी बसों पर एक ललित निबंध लिखें तो आप लट-पटा जाएंगे. मुमकिन है कि आप इन बसों को कोसने लग जाइएगा. अगर आप इन बसों में नियमित चलने वाले हैं तो कई शिकायतों के बाद भी इन्हीं के आने-जाने के इंतज़ार का अद्भुत रस आपके भीतर प्रवाहित होता ही होगा.

और अगर आप इन बसों में नहीं चलते हैं तो यह भी मुमकिन है कि अपनी कार को लेकर इन बसों से चिढ़े रहते होंगे, डरे रहते होंगे. इन्हें ओवरटेक करते समय अपनी अपनी पसंद के ईष्ट को याद करते हैं कि जल्दी से इन्हें पार कर जाएं, पता नहीं कब ये बसें इधर-उधर मुड़ जाएं. मेरी राय में यह सब आपके मन की दुविधा और दुर्भावना है. भले ही आप राजनीति में लौह पुरुष को आदर्श मानते हों लेकिन लोहे के जैसी रोडवेज़ की इन बसों को देखते ही घबरा जाते हैं. इन बसों में प्रयुक्त लौह अयस्क की मात्रा के कारण ही आप रास्ता देने के लिए रास्ते में रास्ता खोजने लगते हैं. रोडवेज़ की बसों की खड़खड़ाहट से आपकी कार की कमोल त्वचा ठिठुर जाती है और हॉर्न बजाने से पहले कार साइड हो जाती है.

हर वक्त चमचमाती गाड़ियों को देखने की नज़र का जबसे विकास हुआ है उन तमाम नज़रों में ये बसें पिछड़ी नज़र आती हैं. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के अनुसार भारत में 66 प्रतिशत लोगों बसों से यात्रा करना पसंद करते हैं. बसें भी यात्रियों को खूब पसंद करती हैं तभी तो टूटी फूटी हालत में भी उन्हें ढोती रहती हैं.

इन बसों के यात्रियों के मन में यह बस राज्य व्यवस्था का जीवित साहित्य है. इनकी फर्श बता रही है कि मानव आज भी यात्री हैं. बारिश और सर्दी के दिनों में खिड़कियों के होने का पता चलता है. अगर किसी यात्री के भाग्य में बिना शीशे वाली खिड़की मिल गई तो फिर उसकी रक्षा न तो मफलर कर सकता है और न छाता. इन बसों का गियर निजी मामला नहीं है बल्कि इनके बदले जाने की सूचना बस के हर यात्री को मिल जाती है चाहे वो कहीं बैठा हो. जब चालक स्टियरिंग घुमाता है तो हर यात्री के भीतर पौराणिक कथाएं जीवंत हो जाती हैं जैसे किसी ने अपनी उंगली से धरती को घुमा दिया है और इसी के साथ हम हम कलयुग से सतयुग की तरफ प्रस्थान करते हैं. रोडवेज़ की बसों में सफर कर रहे हैं.

रोडवेज़ की बसों के उल्लेखनीय योगदान की चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि ये बसें न होतीं तो आज यूपी की राजनीति में लड़ाकू विमानों के राजनीतिक योगदान को देखने के लिए हज़ारों या लाखों कैसे पहुंच पाते. यूपी के अखबारों में छपी चंद ख़बरों से पता चलता है कि बसों को इन दिनों प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रमों में लोगों को लाने के लिए लगाया जा रहा है. आप धीरज से सुनिएगा क्योंकि मैं धीरज से पढ़ने वाला हूं.

सुकून में दिखे कार्यकर्ता, प्रशासन पर भीड़ जुटाने का जिम्मा. अमर उजाला के अश्विनी सिंह की यह ख़बर कमाल की है. इस खबर के अनुसार बीजेपी के कार्यकर्ता सुकून में हैं और प्रशासन बीस हज़ार लोगों को भेजने का टारगेट पूरा कर रहा है. खबर में लिखा है कि अंबेडकर नगर ज़िले के सभी ब्लाक में 396 बसें भेजी गईं हैं जिनसे सरकारी कार्यक्रमों के लाभार्थी लाए जाएंगे और भीड़ भी. 15 नवंबर के दैनिक भास्कर की यह खबर है कि पीएम की रैली के लिए रोडवेज की 170 बसें सुल्तानपुर रवाना. प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में दो लाख लोगों को लाने का लक्ष्य रखा गया है और इसके लिए 2000 बसें लगाई जाएंगी. हिन्दुस्तान में छपी इस खबर के अनुसार पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के उद्गाटन समारोह में लोग शामिल हो संके इसलिए कन्नौज डिपो की 18बसें सुल्तानपुर और अयोध्या भेजी गई हैं. 14 नवंबर के हिन्दुस्तान की खबर है कि सुल्तनानपुर में भाजपा की रैली में बरेली रोडवेज की बसें गई हैं जिससे यात्री परेशान हैं. लोगों ने हंगामा किया. इस खबर में यह भी है अंबेडकरनगर प्रशासन ने बरेली से 75 गाड़ियां मांगी हैं. इसलिए बसों में कमी आ गई है. 15 नवंबर अमर उजाला के लखनऊ संस्करण की खबर है कि पीएम के प्रोग्राम में गईं रोडवेज की 40 बसें. भटक रहे हैं पांच हज़ार यात्री. 13 नवंबर के अमर उजाला में खबर छपी है कि अलीगढ़ मथुरा रूट पर नहीं मिली बस, इंतज़ार करते रहे यात्री. यह खबर 9 नवंबर की है अमर उजाला की. इससे पता चलता है कि रोडवेज मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों के लिए भी सेवा दे रहा है. रामपुर में सीएम की रैली होने वाली थी तो संभल डिपो की 11 बसें को रैली में लगा दिया गया. चंदौसी बस स्टैंड की 19 बसों को रामपुर में हुई मुख्यमंत्री की रैली के लिए भेज दिया गया. प्रशासन यह सेवा केवल प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए नहीं दे रहा है बल्कि गृह मंत्री अमित शाह के कार्यक्रमों के लिए भी दे रहा है. यह भी देखने को मिल रहा है कि कहीं पर कोई विभाग खर्चा दे रहा है तो कहीं पर कोई विभाग. जैसे पत्रिका और अमर उजाला की इस खबर के मुताबिक आज़मगढ़ में अमित शाह के कार्यक्रम के लिए PWD ने 40 लाख रुपये दिए. 15 नवंबर के अमर उजाला में ख़बर छपी है कि महोबा में प्रधानमंत्री का कार्यक्रम होना है 18 और 19 नवंबर को. इसके लिए 1600 बसें लगाई जाएंगी. खबर के मुताबिक ज़िलाधिकारी ने शासन को पत्र लिखा है कि उनके पास 1600 बसें नहीं हैं. रोडवेज की बस का एक दिन का किराया 22081 रुपया होता है. इस पर जो खर्च आएगा वो पैसा सिंचाई विभाग देगा. अमर उजाला ने लिखा है कि 18 और 19 नवंबर के लिए बसों के इंतज़ाम पर 7 करोड़ रुपया खर्च होगा.

आज सुल्तानपुर में हुए कार्यक्रम के लिए यूपी के कई डिपो वीरान हो गए. उनकी बसें लोगों को लाने चली गईं जिनका नाम इस कार्यक्रम के लिए लाभार्थी रखा गया है. जल्दी ही वो दिन आएगा जब सरकार ही लाभार्थी को दिए जाने वाले अनुदान से प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में लाने का खर्चा काट लेगी.

आइये अब तनिक इस डिपो का दर्शन करें. यह फैज़ाबाद अयोध्या का मुख्य डिपो है. अगर पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर लड़ाकू विमान उतर सकते हैं तो रोडवेज की बसें भी कम लड़ाकू नहीं हैं. वे रोज़ इन गड्ढों से लड़ती हुई इनमें उतरती हैं और इनसे निकल जाती हैं. डिपो के भीतर की यह तस्वीर संयुक्त राष्ट्र के हंगर इंडेक्स के समान लगती है जिसमें भारत की जनता काफी भूखी नज़र आती है. यह डिपो भी राजकीय भूख का शिकार है और विकास नाम के अन्न की प्रतीक्षा में इसका पेट सिकुड़ गया है. प्रमोद श्रीवास्तव अपने कैमरे से डिपो की चांद सी सतह इसलिए दिखा पाए कि आज यहां की बसें प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में चली गई हैं. वर्ना आम दिनों में यहां 15-20 हज़ारों का आना-जाना लगा रहता है. सबकी निगाह आने वाली और जाने वाली बस पर होती है. नीचे देखने की फुर्सत किसी को नहीं होती है. डिपो की इमारतें पुरानी हो चुकी हैं अत: उम्र के अनुसार जर्जर भी हैं. इनकी हालत बता रही है कि किसी ने इनकी मरम्मत का साहस नहीं किया होगा. प्रमोद का कहना है कि यहां महिलाओं के लिए कोई शौचालय नहीं है. जिनके लिए शौचालय है उन्हें पुरुष कहते हैं और उनके शौचालय में कोई दरवाज़ा नहीं है. इस डिपो के भीतर ही गंदगी और कूड़े का अंबार देखने की व्यवस्था करा दी गई ह. इसके लिए लड़ाकू विमान से कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है. यात्रियों के लिए बने इस विश्राम स्थल और टिकट प्राप्ति स्थल का दर्शन भी कर लीजिए. आप समझ सकेंगे कि क्यों सरकार पूर्वाचंल एक्सप्रेस-वे का विज्ञापन देती है और रोडवेज की बसों का विज्ञापन नहीं देती है जिससे लाखों लोग हर दिन चलते हैं. जब टूटी फूटी बसों को लेकर टूटी फूटी सड़कों पर रोडवेज के चालक-परिचालक चला सकते हैं तो कभी भी इस विश्राम स्थल के गिर जाने की आशंका को खारिज करते हुए यहां चालक परिचालक विश्वास के साथ आराम भी करते हैं. भारत की ग़रीब जनता न्यूनतम सुविधा में जीना जानती है और वह इन बसों में यात्रा कर साबित भी कर देती है. एक ग़ैर ज़रूरी जानकारी यह है कि यहां खड़ी बसों में कइयों के टायर खराब हैं. कई दिनों से टायर ठीक नहीं होने के कारण खड़ी हैं जबकि इस डीपो की हर दिन की कमाई 16 लाख के करीब बताई जाती है. आज डिपो ख़ाली है, यहां की बसें चली गई हैं, शायद किसी को पता है कि बसों के इंतज़ार में यात्री यहां भटकते ज़रूर आएंगे तो उनके लिए LED स्क्रीन वाली बस लगा दी गई है ताकि वे भी देख सकें कि यहां की बसें इसी कार्यक्रम में गई हैं जिसके प्रसारण में प्रधानमंत्री दिखाई दे रहे हैं. अयोध्या के बाहर एक स्टेशन बना है लेकिन यह डिपो नहीं है. यहां पर हाईवे से गुज़रने वाली बसों से यात्रियों को उतारा और चढ़ाया जाता है. अयोध्या में मेले के समय भीड़ भाड़ के समय बाहर से आई टूरिस्ट बसों को यात्रियों के वाहनों को यहां पार्क करा दिया जाता है. बाहर के लोगों के लिए दृश्य अच्छा होना चाहिए.

एक तरफ रन-वे पर विकास का प्रदर्शन है तो दूसरी तरफ रोडवेज भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है. मुझे पता था कि आप वाराणसी के बस डिपो को भी देखना चाहेंग. वाराणसी जापान के क्योटो शहर की पार्टनर सिटी है. भारत में बहुत कम शहर हैं जिनका विदेशों में पार्टनर है. हमारे सहयोगी अजय सिंह क्योटो के पार्टनर वाराणसी के बस डिपो से जैसी तस्वीरें भेजी हैं उसी के अनुकूल शब्द अवतरित हुए हैं. एक बस को प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, इसकी हालत बता रही है कि जब तक इस खंडहर हो चुकी बस के चलने की उम्मीद है तब तक भारत के लोकतंत्र के बचे रहने की उम्मीद की जा सकती है. इस डिपो में प्रवेश करती यह बस उदाहरण सहित बता रही है कि बिना रन-वे के भी रोडवेज की बसें चलती हैं और उबड़-खाबड़ सतह को समतल मान कर चलती हैं. इन बसों ने दिखा दिया है कि एक दिन सड़कें गायब भी हो जाएं तब भी ये गायब नहीं होने वाली हैं. इनका होना सड़कों के होने पर निर्भर नहीं करता है. इस बीच आप वाराणसी डिपो के महिला शौचालय का हाल देख सकते हैं. निगेटिव लोग शौचालय के बाहर कूड़े के संग्रह पर नज़र डालेंगे लेकिन पोज़िटिव लोग राहत की सांस लेंगे कि शौचालय तो है. बढ़िया बाटे. यहां पर नोटिस ही टांग दिया है कि सभी गाड़ियां सुल्तानपुर की रैली में गई हैं. प्रशासन की यह पारदर्शिता प्रशंसनीय है. कोई बात किसी से छिपाई नहीं जा रही है. जब यहां की गंदगी किसी से नहीं छिपाई जा रही है तो बसों के न होने की सूचना क्यों छिपाई जाए. इस सूचना को प्राप्त कर बहुत से यात्री डिपो में इधर उधर ताकते दिखे ताकि कहीं से आती हुई बस दिख जाए उनके घर जाती हुई बस मिल जाए. इस बस में सवार होने वाले की भीड़ देखकर एक बार लग सकता है कि सारे यात्री कहीं इसी एक बस में न आ जाएं. ऐसा प्रतीत हुआ कि बस के भीतर कोई फिल्म लगी है और बाहर लोग टिकट के लिए लाइन में लगे हैं. इस बस को देख कर यात्री बेसब्र हो गए हैं और अपनी धक्का मुक्की की क्षमता का परीक्षण व प्रदर्शन कर रहे हैं कि अभी भी इस तरह से सीट प्राप्त करने की योग्यता वे रखते हैं या नहीं. बस में बैठे यात्रियों को लग रहा है कि आज बस नहीं मिली है बल्कि सौभाग्य प्राप्त हुआ है. एक तरफ जहां हज़ारों लोग बस से वंचित हो गए वहीं ये कुछ लोग बस को प्राप्त हुए हैं. आफत के इस समाचार में आप राहत की तस्वीर भी देखिए. थोड़ा आइटम चेंज होता है तो बारात के नाश्ते का आनंद ही कुछ और होता है. डिपो केवल जीवित और युवा बसों का स्थल नहीं है बल्कि यह वृद्धाश्रम का भी काम करता है. वृद्ध या मृत हो चुकी बसें भी यहां खड़ी हैं, याद दिलाती हैं कि न तब बदला न अब बदला. जीवन और मृत्यु दो ही सत्य हैं बाकी जगत मिथ्या है. 
 
एक ही बात का अफसोस है कि इतनी मेहनत से तैयार इस कार्यक्रम को यूपी सरकार रोडवेज की बसों और डिपो में नहीं दिखाएगी. न ही विपक्ष के लोग गांव गांव में इसे लेकर ले जाकर दिखाएंगे. कोई नहीं देखेगा फिर भी डिपो के विकास का यह कार्यक्रम बना रहा हूं. इसे देखते ही लोगों को गर्व होगा कि वे बिना विकास वाले डिपो और बसों में यात्राएं कर रहे हैं और बिना विकास के भी जी सकते हैं. लड़ाकू विमान की ज़रूरत ही नहीं है. 

क्या आप जौनपुर डिपो का भी हाल जानना चाहेंगे? पूछ ले रहा हूं, क्या पता आप बोर हो गए हों. जौनपुर भी उसी पूर्वांचल का हिस्सा है जहां आज एक एक्सप्रेस-वे उद्घाटित हुआ है और उस पर लड़ाकू विमान अवतरित हुआ है. आलोक पांडे सुल्तानपुर में थे. पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन और लड़ाकू विमान के उतरने की अद्भुत घटना को कवर करने.

इन खबरों से यह भी समझ आ रहा है कि चुनाव आयोग की आचार संहिता की वर्तमान व्यवस्था बेकार हो चुकी है. उसे बदलने की ज़रूरत है क्योंकि सरकारों ने इसकी काट निकाल ली. आचार संहिता से पहले के तीन चार महीनों में रैलियों को सरकारी कार्यक्रम का नाम देकर हर तरह की नैतिकताओं का अचार बना दिया जाता है. चुनाव आयोग को क्या अब आचार संहिता तीन महीने पहले नहीं लगा देनी चाहिए या क्या यह अच्छा नहीं होता कि चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल भी दस बीस साल का हो जाए ताकि आचार संहिता की ज़रूरत ही न पड़े. इसे एक पैटर्न के रूप में देखिए. चुनावी राज्यों में न जाने कितने मंत्रियों का दौरा बढ़ जाता है, कार्यक्रम होने लगते हैं यह सब सरकारी ख़र्चे पर होता है. आपने अनुराग द्वारी की रिपोर्ट देखी होगी जिसमें उन्होंने बताया था कि भोपाल में होने वाले प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए 23 करोड़ खर्च हुए. खबरों के मुताबिक आदिवासी कल्याण विभाग का भी पैसा इसमें खर्च हुआ है. मध्य प्रदेश के तमाम ज़िलों से दो लाख आदिवासियों को लाने का लक्ष्य रखा गया था जिसके लिए 13 करोड़ का बजट बनाया गया. इसके बाद भी कई कुर्सियां खाली रह गईं और जो लाए गए उनके रहने खाने और आने जाने पर राज्य सरकार ने पैसा खर्च किया. कितना पैसा बर्बाद हुआ एक दिन की सभा में.

16 मई 2017 की द वियार की एक खबर है. कृष्ण कांत की यह खबर इसलिए बता रहा हूं ताकि आपको एक प्रथा का अहसास हो. मोदी की सभा में भीड़ जुटाने के लिए स्वच्छता अभियान का पैसा इस्तमाल हुआ.

सात साल में प्रधानमंत्री के अभी तक जितने भी कार्यक्रम हुए हैं उन पर खर्च होने वाली धनराशि के बारे में प्रधानमंत्री ही बता सकते हैं ताकि इस बजट को दुगना किया जा सके. क्योंकि खर्च कम करने की बात से महंगाई के सपोर्टर आहत हो सकते हैं. इन सबसे सरकारी परिवहन को कितना घाटा होता है इसकी कोई चिन्ता नहीं करता है लेकिन इसी घाटे के नाम पर जब इन्हें बेचा जाता है तब सब घाटा घाटा चिल्लाने आ जाते हैं. CAG ने अपनी एक रिपोर्ट में गुजरात राज्य परिवहन निगम के घाटे पर विस्तार से बताया है. जब यह रिपोर्ट आई थी तब DNA नामक अखबार ने इसके राजनीतिक इस्तमाल को लेकर ख़बर छापी थी. DNA की यह रिपोर्ट सितंबर 2018 की है. यह रिपोर्ट गुजरात के बारे में है. इस रिपोर्ट में सीएजी और विधानसभा में दिए गए आंकड़ों का ज़िक्र है.

इस रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए GSRTC का दोहन करती जा रही है. सीएजी ने कहा है कि गुजरात की आबादी बढ़ी है लेकिन इन बसों के यात्री घट गए हैं. बसों की संख्या भी घटी है. DNA ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि किस तरह राज्य सरकार राजनीतिक काम में इस्तमाल के बाद बसों का पैसा नहीं देती है. सरकारी रिकार्ड से पता चलता है कि 2016-17 के दौरान इन बसों का अधिकतम इस्तमाल हुआ जब राज्य में चुनाव होने वाले थे. सरकार ने इन बसों का इस्तमाल उन तमाम रैलियों में किया है जिनमें प्रधानमंत्री या केंद्र या राज्य के प्रतिनिधि शामिल थे. 2016-17 में इस्तमाल इन बसों के लिए सरकार ने 36 करोड़ चुका दिए हैं फिर भी 15 करोड़ रुपये बाकी हैं. ये उस रिपोर्ट में लिखा था.

इस तरह सरकारी बसों के निगम को घाटे में पहुंचा दिया जाता है और जनता को पैदल कर दिया जाता है. वह घर पहुंचने के लिए या अपने काम की जगह पहुंचने के लिए परेशान घूमती रहती है. कितना अच्छा होता अगर सरकारी बसों और बस डिपो में हुए विकास की तस्वीर का विज्ञापन हर दिन छपता तब शायद जनता को बसों में लाद कर विकास दिखाने के लिए नहीं ले जाया जाता.


चुनावों में धर्म और रक्षा के इस्तमाल को गौर से देखिए. विकास की पैकेजिंग में रक्षा सेवाओं का इस्तमाल बहुत सावधानी से किया जा रहा है. आम आदमी भी इस पैकेजिंग का हिस्सा है. उसके आस-पास विकास नहीं हुआ है तो उसे उस जगह पर लाया जाएगा जहां विकास हुआ है. बस डिपो में विकास नहीं देखा तो एक्सप्रेस वे का विकास देखना होगा. वह विकास के करीब जाकर भी विकास से दूर खड़ा रहेगा. आसमान से उतरने वाला विमान वापस आसमान में चला जाएगा और लौट कर वह उसी बस में सवार होगा जो खड़खड़ाती हुई उस डिपो में जाएगी जो खंडहर जैसा हो चुका है.

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आज प्रेस दिवस है. प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत का हाल यूपी के बस डिपो के जैसा ही है. सूचनाएं गोदी मीडिया के डिपो में कैद हो चुकी हैं. वहां की तस्वीर बाहर नहीं आने वाली है. आप बिना सच्चाई वाली सूचनाओं के उपभोक्ता हैं. नाम की मिठाई है मगर चीनी नहीं है क्योंकि सही सूचनाएं आपके ख़ून का प्रवाह बढ़ा देंगी और यह आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा. अच्छा यही होगा कि लोग मुर्दा बने रहें.