इस साल मई में दिल्ली में न्यूनतम तापमान 30-33 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा, जबकि अधिकतम तापमान 44-46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से पांच डिग्री सेल्सियस अधिक था. राजस्थान के श्रीगंगानगर, मध्य प्रदेश के खजुराहो और उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया. इस गर्म और शुष्क 'लू' की स्थिति ने बाहरी जोखिम और संपर्क दोनों को बढ़ा दिया है. अब ये गर्मियों के तापमान में कभी-कभार आने वाला उछाल भर नहीं रह गया है. 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एंवायरमेंट एंड वॉटर' (सीईईडब्लू) का बीते 40 साल का विश्लेषण बताता है कि भारत में भीषण गर्मी की चुनौती न केवल बढ़ी है, बल्कि यह पहले की तुलना में अधिक तेज और लंबे समय तक रहने लगी है. रात का तापमान और उमस (आर्द्रता) बढ़ने के कारण गर्मी की समस्या और अधिक व्यापक हो गई है. भारत के 57 फीसद से अधिक जिलों, जो कि देश की तीन-चौथाई आबादी का घर हैं, उनके सामने अधिक से अत्यधिक उच्च गर्मी का जोखिम पैदा हो गया है.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि गर्मी का जोखिम केवल तापमान से नहीं, बल्कि खतरे (हैजर्ड), जोखिम के प्रभाव (एक्सपोजर) और संवेदनशीलता (वल्नरेबिलिटी) को मिलाकर तय होता है. दूसरे शब्दों में जोखिम न केवल भीषण गर्मी की तीव्रता और इसकी अवधि पर निर्भर करता है, बल्कि इससे भी तय होता है कि कौन-कौन इससे प्रभावित हो रहा है और आबादी, बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) और प्रणालियां इसके प्रति कितनी संवेदनशील हैं.
कैसा होना चाहिए हीट एक्शन प्लान
गर्मी का सामना करने के लिए भारत की प्रतिक्रिया हीट एक्शन प्लान (HAPs) पर केंद्रित है, जो कि उचित है. यह हीट एक्शन प्लान तय करते हैं कि सरकारों को लू (हीटवेव) चलने से पहले, उसके दौरान और बाद में क्या कदम उठाने चाहिए. लेकिन गर्मी का सामना करने की हमारी क्षमता (हीट रेजिलिएंस) इस बात पर टिकी होती है कि लोग तमाम चेतावनियों को समझ पाते हैं या नहीं, उन पर भरोसा करते हैं या नहीं और क्या इन चेतावनियों के साथ ऐसी सेवाएं भी उपलब्ध हैं, जो लोगों को इस दिशा में प्रयास करने में मदद कर सकें. इस पूरी व्यवस्था में लोगों का व्यवहार सबसे ज्यादा मायने रखता है. यह जोखिम के प्रति सोच, सामाजिक मानकों, सरकारी संस्थाओं के प्रति भरोसा, पानी, कूलिंग (ठंडक) और स्वास्थ्य देखभाल जैसे संसाधनों की सुलभता जैसे कारकों पर निर्भर करता है. इस चुनौती का सामना करने के लिए निम्न प्राथमिकताएं प्रमुखता से सामने आती हैं-
सबसे पहले, गर्मी की चेतावनियों को उपयोग में आने लायक सार्वजनिक जानकारी बनाना जरूरी है यानी भारतीय मौसम विभाग (IMD) के येलो, ऑरेंज और रेड अलर्ट केवल तकनीकी संकेत बनकर नहीं रह जाने चाहिए. इन चेतावनियों को स्थानीय स्तर पर कार्रवाई योग्य निर्देशों में बदला जाना जरूरी है. इनमें इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि स्कूलों को क्या कदम उठाने हैं बाहर या खुली जगहों पर हो रहे काम को कब रोक देना चाहिए, पानी और कूलिंग स्पेस (ठंडे स्थान) कहां-कहां पर उपलब्ध हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को कब अलर्ट हो जाना है.ये सावधानियां येलो अलर्ट आने के साथ ही शुरू हो जानी चाहिए. ऑरेंज अलर्ट आने के साथ ही बाहर मौजूद जोखिम को कम करते हुए सबसे पहले प्रभावित होने वाले संवेदनशील समूहों तक समय पर चेतावनी पहुंचा दी जानी चाहिए. वहीं रेड अलर्ट जारी होने के साथ ही कामकाज के समय में बदलाव, कूलिंग सेंटरों को खोलने,स्वास्थ्य निगरानी और सार्वजनिक जनसंपर्क को तेज करने जैसे कदम उठाने चाहिए.
लू चलने पर क्या करें और क्या न करें
दूसरी बात यह कि लोगों को यह साफ तौर पर बताने की जरूरत है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है. इस तरह की सलाह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के मुताबिक होनी चाहिए. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के मुताबिक गर्मी से बचाव के कुछ सरल उपाय इससे होने वाली परेशानी (Heat Exhaustion) और लू लगने (Heat Stroke) के जोखिम को घटा सकते हैं. जैसे लोगों को सीधे धूप में जाने से बचना चाहिए, खासकर दोपहर 12 से तीन बजे के बीच घर में ही रहना चाहिए. लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना (हाइड्रेटेड रहना) चाहिए, ताकि शरीर में इसकी कमी न होने पाए. भीषण गर्मी के दौरान वयस्कों को प्रतिदिन 3-5 लीटर पानी पीना चाहिए. अधिक पसीना निकलने के कारण शरीर में पानी, नमक और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करने के लिए ओआरएस (ORS) (खास तौर पर लंबे समय तक पसीना निकलने के बाद) पीना चाहिए. घर से बाहर निकलने पर हल्के रंग और ढीले सूती कपड़े पहनने चाहिए. छाता, टोपी और धूप के चश्मे जैसे साधन भी गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं. आईएमडी (IMD), एनडीएमए (NDMA) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) जैसे प्राधिकरणों ने अत्यधिक गर्मी वाले घंटों के दौरान कठिन शारीरिक परिश्रम और खुले स्थानों पर काम न करने की चेतावनी देते हैं.गर्मी में खुले स्थान पर काम करने वाले मजदूर गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील (Vulnerable) होते हैं. उन्हें काम करते समय टोपी या गमछा से अपना सिर ढककर रखना चाहिए, थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर आराम करते रहने और खुद को ठंडा रखने के लिए अपने सिर और गर्दन पर गीला कपड़ा रखने जैसी सलाह दी जाती है.
लू चलने पर क्या न करें
गर्मी में क्या नहीं करना है, यह जानना भी बहुत जरूरी है. सबसे अधिक संवेदनशील लोगों, जैसे बुजुर्गों, बच्चों, खुले स्थानों पर काम करने वाले मजदूर और पहले से किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों चिन्हित कर उनकी मदद करना भी बहुत जरूरी है. तेज गर्मी के दौरान चक्कर आना, कमजोरी, मितली (जी मिचलाना), भ्रम या बेहोशी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) होने पर शराब, चाय, कॉफी या कार्बोनेटेड ड्रिंक्स (सोडा आदि) को पीने से बचना चाहिए. बच्चों और पालतू जानवरों को बंद खड़ी गाड़ियों में नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि कुछ ही मिनटों में गाड़ी के अंदर का तापमान उनके लिए खतरनाक हो सकता है. अगर किसी व्यक्ति में गर्मी का असर (हीट स्ट्रेस) दिखाई दे, तो उसे छायादार स्थान पर ले जाएं, उसके शरीर को पानी या गीले कपड़े से ठंडा करें, पीने के लिए तरल पदार्थ देने के साथ चिकित्सकीय मदद भी दें. हमें यह याद रखना चाहिए कि लू लगना (हीट स्ट्रोक) एक मेडिकल इमरजेंसी है.
तीसरा, लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के प्रयास समुदाय के नेतृत्व में होने चाहिए. कई लोग तब तक यह नहीं मानते हैं कि उन्हें लू लग सकती है, जब तक कि उन्हें लू लग न जाए. बाकी लोग गर्मी के जोखिम को तो जानते हैं, लेकिन समय पर कदम नहीं उठा पाते हैं, क्योंकि उनके आसपास पानी, छायादार जगह, काम से छुट्टी या सेहत की देखभाल जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी होती है.ऐसे में फ्रंटलाइन वर्कर्स,रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्लूए), स्कूलों, नियोक्ताओं, यूनियनों, रेहड़ी-पटरी के समूहों और स्थानीय स्वयंसेवकों को गर्मी से जुड़े जनजागरूकता और संचार (हीट कम्युनिकेशन) में शामिल होना चाहिए. घर-घर जाकर लोगों की जानकारी लेने, एसएमएस (SMS) और व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए अलर्ट भेजने, लाउडस्पीकर से घोषणाएं करने, ओआरएस (ORS) का वितरण, सार्वजनिक पेयजल केंद्र बनाने और संवेदनशील लोगों के आस-पास के निवासियों की सूची बनाने जैसे कदम लोगों की जान बचा सकते हैं.
अधिक गर्मी में सबसे अधिक खतरा किन लोगों को होता है
चौथा, हीट एक्शन प्लान में गर्मी के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील लोगों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. बाहर या खुले स्थानों पर काम करने वाले मजदूरों, गिग वर्कर्स (ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़कर काम करने वाले लोग), निर्माण श्रमिक, सफाईकर्मी, ट्रैफिक पुलिस, बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पहले से दूसरी बीमारियों से पीड़ित लोग गर्मी के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं.ऐसे लोगों को घर के अंदर रहने की सलाह देना भर ही काफी नहीं है. सरकारों और निजी कंपनियों को गर्मी के हिसाब से काम के घंटों में बदलाव करना चाहिए, छायादार विश्रामस्थल बनाने चाहिए, गर्मी के दौरान हीट ब्रेक सुनिश्चित करना चाहिए, पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ाने और आपातकालीन देखभाल की व्यवस्था को और मजबूत बनाना चाहिए. स्कूलों को भी हीट प्रोटोकॉल लागू करने की जरूरत होती है. स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और ठंडक देने वाली सुविधाएं बनाने की जरूरत है. लोगों में व्यवहार परिवर्तन से जुड़े सुझाव तभी कारगर होते हैं, जब उनमें सहायता करने वाली जरूरी सेवाएं उपलब्ध हों.
भारत में 300 से अधिक शहर अपना हीट एक्शन प्लान बना चुके हैं. इसे अब 4,800 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों तक विस्तार देने की जरूरत है. इसके साथ ही आपदा कोषों (डिजास्टर फंड्स), विकास योजनाओं और हीट इंश्योरेंस (गर्मी के लिए बीमा) जैसे साधनों के रूप में उपलब्ध वित्त पोषण (फाइनेंसिंग) तक पहुंच बनाने की भी जरूरत है. सीईईडब्ल्यू ने वार्ड और तहसील स्तर पर गर्मी और संवेदनशीलता का आकलन (हीट एंड वल्नरेबिलिटी असेसमेंट) करने में अब तक 140 से अधिक शहरों और जिलों की सहायता की है. इस दौरान ऐसे क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं, जहां पर उच्च तापमान, खराब आवासीय स्थितियां, हरियाली की कमी, जल संकट और संवेदनशील आबादी जैसे कारण मौजूद हैं. जिस तरह से भीषण गर्मी बढ़ रही है, शहरों को सुरक्षित, किफायती और ऊर्जा-कुशल (एनर्जी-एफिशिएंट) एक्टिव कूलिंग के लिए अपनी तैयारी जारी रखनी चाहिए. गर्मी से निपटने की कार्य योजनाएं और संचार जमीनी वास्तविकताओं पर आधारित होने चाहिए न कि सामान्य वार्षिक सलाहों पर.
(डिस्क्लेमर: अनुष्का गोस्वामी और प्रेरणा ओझा, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) में रिसर्च एनालिस्ट के रूप में काम करती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)