भारत का किसान महीने का इतना कम कमाता है?

किसान आंदोलन में शामिल किसान किसी अहं की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. वे दशकों से खेती को लेकर सरकारों के वादों का हश्र देख रहे हैं. अपने आस-पास के लोगों को खेती से अलग होते देख रहे हैं.

भारत का किसान महीने का इतना कम कमाता है?

पता था कि लोगों की नज़र उन बैंकों के बहीखाते पर है जिनके यहां दो खरब डॉलर से अधिक NPA हो चुका था. इस कारण बैंकों को बुरी नज़र से देखा जाने लगा था. इसका समाधान निकाल लिया गया है. बैंकों के सारे बुरे लोन को निकाल कर एक दूसरे बैंक में जमा कर दिया जाएगा और उसका नाम बैड बैंक होगा. इससे होगा ये कि बाकी सारे बैंक गुड हो जाएंगे. बैड बैंक के लिए किस तरह दलीलें तैयार की जाती हैं, आप 2016-17 का आर्थिक सर्वेक्षण पढ़ सकते हैं. 5वीं सदी के किसी महापुरुष का कथन निकाल लाया जाता है और बैड बैंक को गुड बैंक बताने का प्रयास किया जाता है. किसान भी कर्ज़ में डूब कर आत्महत्या करता है, बर्बाद हो जाता है उसे कर्ज़े से मुक्ति दिलाने के लिए बैड बैंक नहीं है. कॉरपोरेट के लिए बैड बैंक है. उसी तरह सब्सिडी केवल किसानों को नहीं मिलती है बल्कि ऑटो और टेक्स्टाइल इंडस्ट्री को भी मिलती है ताकि वे तकनीकि सुधार करें. प्राइवेट सेक्टर तकनीकि में सुधार करे, इसके लिए सरकार पैसे दे रही है. सरकार से अगर आपको तरह-तरह से पैसे चाहिए तो कॉरपोरेट हो जाइये. कॉरपोरेट पर लाखों करोड़ों रुपये की मेहरबानी बरसाकर बाकी 80 करोड़ के लिए झोला सहित मुफ्त राशन तो मिल ही रहा है. इस तरह बैड बैंक वो बुरा बच्चा है जिसकी परवरिश अच्छी सरकार करेगी. 

भारत का किसानों की आमदनी दोगुनी होने का साल 2022 है. जुलाई 2018 से जुलाई 2019 के बीच भारत के सांख्यिकी मंत्रालय ने एक सर्वे किया है. कृषि परिवारों की कमाई और खर्चे का पता लगाने का प्रयास किया गया है. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के इन आंकड़ों को लेकर सरकार ही बात नहीं कर रही है कि भारत का किसान जुताई से दिन का 27 रुपया ही कमाता है. आधा डॉलर से भी कम कमा रहा है. यूरोप में गाय को 2 डॉलर की सब्सिडी मिलती है. नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जोसेफ स्टिगलिट्स ने कहा है कि विकासशील देशों में गरीब होने से अच्छा है, यूरोप में गाय होना जिसे रोज की तकरीबन 2 डॉलर की सब्सिडी मिलती है. 2018-19 में भारत का एक कृषक परिवार खेती और अन्य कार्यों से महीने का 10,218 रुपये कमा रहा था. 2012-13 में यह 6,426 रुपये प्रति माह हुआ करता था. छह साल में 6 हज़ार से रेंगकर 10,000 पर किसान पहुंचे हैं तो उनकी कमाई कैसे बढ़ रही है आप समझ सकते हैं. महामारी के दो साल 2020, 2021 में क्या हालत हुई होगी, आप समझ  सकते हैं. बिज़नेस स्टैंडर्ड के अभिषेक वाघमरे ने नेशनल सैंपल सर्वे का विश्लेषण करते हुए बताया है कि कि छह साल में मुद्रा स्फीति का भाव निकाल देने पर केवल खेती से होने वाली आय 21 प्रतिशत ही बढ़ी है. इस हिसाब से 2018-19 में भारत का किसान खेती से केवल 3,798 रुपये कमा रहा था. 2012-13 में उस पर 47,000 का कर्ज था जो 2018-19 में 74, 121 रुपया हो गया है?  यही नहीं सैंपल सर्वे से पता चलता है कि किसानो की ज़मीन का आकार पहले से भी छोटा हुआ है. 

इस सर्वे मे दिख रहा है कि किसान की खेती से कमाई नहीं हो रही है. वह पेट पालने के लिए मज़दूर बन रहा है. क्या इससे सरकार चिन्तित होगी या सरकार खुश होगी. सरकार ख़ुश हो रही होगी कि लोग खेती छोड़ रहे हैं.किसानों की आमदनी दोगुनी करने के सुझाव देने के लिए अशोक दलवाई की अध्यक्षता में कमेटी बनी थी. जिसने 14 खंडों की रिपोर्ट दी है. अशोक दलवाई रिपोर्ट के खंड दो के पेज 144 पर लिखा है 

किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्दि के लिए खेती से लोगों को निकाल कर ग़ैर खेती के सेक्टर में भेजना होगा जिसकी उत्पादकता ज़्यादा है. बल्कि कुछ किसान खेती छोड़ने भी लगी है. 2001, 2011 की जनगणना के आंकड़ों से इस परिपाटी को समझा जा सकता है.

ऐसा नहीं है कि इस बार ही लोग खेती छोड़ रहे हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार हर दिन 2000 किसान खेती छोड़ रहे हैं. इसका मतलब साफ है कि खेती छोड़ने से भी खेती से कमाई नहीं बढ़ रही है. आज पहले से कम लोग खेती करते हैं लेकिन वो चंद लोग भी पहले से कम कमा रहे हैं. किसान मजबूर किया जा रहा है कि वह खेती छोड़ दे. 2002-05 से 2011-12 के बीच करीब साढ़े तीन करोड़ किसानों ने खेती छोड़ दी. क्या आमदनी दोगुनी हो गई? 

प्रथम तालाबंदी के बाद कड़ी धूप में शहरों से गांव भागते ये लोग शहरों में कितनी कमाई कर रहे थे इनकी हालत बयां कर रही है. ये तस्वीरें बता रही हैं कि इस बार तो गांव बचा था तो लौट गए जब गांव ही खत्म कर दिए जाएंगे तो फिर ये लोग अगली बार कहां लौट कर जाएंगे. जिन शहरों को मज़दूरों ने अपने सस्ते श्रम से बनाया उन्हीं शहरों ने मज़दूरों का साथ नहीं दिया. अभी तो हम किसानों की आमदनी दोगुनी की बात कर रहे हैं लेकिन जब शहरों में काम कर रहे इन मज़दूरों की कमाई में पिछले दस साल में कितनी वृद्धि हुई है, इसकी बात करेंगे तो गुब्बारा फट जाएगा. वहीं मोहल्ले की सड़क टूटी है लेकिन नेता जी पचास किलो मीटर दूर फ्लाईओवर बनाने का सपना दिखा रहे हैं. बीस साल बाद पता चलेगा कि इसके नाम पर कुछ कॉरपोरेट खेती के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं और मनमानी कर रहे हैं. जैसा कि अमरीका में हुआ है. कई ग़रीब देश इन्हीं नीतियों के कारण बर्बाद किए गए हैं. नीती आयोग के मौजूदा सदस्य रमेश चंद ने 2017 में एक रिपोर्ट लिखी थी कि 2022 तक भारत की काम करने वाली कुल आबादी में खेती का हिस्सा घट कर 55 प्रतिशत पर आ जाएगा, तब आमदनी दोगुनी हो जाएगी. तो लोगों को घर से निकाल कर घर की आमदनी दोगुनी की जा रही है.

कमाल का अर्थशास्त्र है. ऐसे किसी भी कंपनी में आधे से अधिक लोग निकाल दिए जाएं तो उसकी कमाई डबल हो जाएगी. इस आइडिआ को नोबेल मिलना चाहिए. गांवों से किसानों को निकाल कर उनकी सस्ती ज़मीनों पर कंपनियां राज करेंगी. वही कंपनियां जो शहरों में टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल कंपनियां चलाने के लिए सरकार से हज़ारों करोड़ के पैकेज लिया करेंगी. 

2016 में ऐलान हुआ था कि 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी. इसलिए यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि इन पांच वर्षों में कितने किसान खेती से बाहर कर दिेए गए, तब भी क्या हम किसानों की आमदनी दोगुनी होते देख सकेंगे? 

हमें यह बार बार याद रखने की ज़रूरत है कि हम जुलाई 2018 से जुलाई 2019 के बीच के डेटा पर चर्चा कर रहे हैं. 2014 के बाद ये सर्वे नहीं हुआ था. 4 साल बाद हुआ है. हमें नहीं पता कि नोटबंदी के समय किसानों की आमदनी पर क्या असर पड़ा. अभी भी जुलाई 2019 से जुलाई 2020, जुलाई 2020 से जुलाई 2021 का सर्वे कब होगा, पता नहीं. चुनाव के बड़े बड़े सर्वे हफ्तों में हो जाते हैं. लेकिन इस तरह के ज़रूरी सर्वे अपनी मर्ज़ी से आते जाते रहते हैं. ज़ाहिर है कोविड के बाद किसानों की हालत और बुरी हुई होगी.


किसान आंदोलन में शामिल किसान किसी अहं की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. वे दशकों से खेती को लेकर सरकारों के वादों का हश्र देख रहे हैं. अपने आस-पास के लोगों को खेती से अलग होते देख रहे हैं. इन्हें पता चल गया है कि शहरों में जाकर कमाई  बहुत कम है. किसी तरह जीने लायक है. उसी का नतीजा है कि अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. यह इसलिए है कि उन्हें मज़दूरी नहीं मिल रही है. कारपोरेट का मुनाफा बढ़ रहा है, आदमी की मज़दूरी घट रही है. ऊपर से मज़दूर को मज़दूरी के लिए ज़िंदा भी रखना ज़रूरी है इसलिए सरकार लाखों करोड़ रुपये खर्च कर मुफ्त का अनाज दे रही है. कॉरपोरेट को सस्ता मजदूर मिले इसके लिए भी सरकार सब्सिडी दे रही है. कायदे से कंपनी को अपने कर्मचारियों का प्रोविडेंट फंड जमा कराना चाहिए लेकिन सरकार योजना लेकर आई कि कंपनी का हिस्सा जनता के पैसे से जमा होगा और मुनाफा पूरा कंपनी का होगा. क्या आप इस खेल को समझ पाए.

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रिज़र्व बैंक ने अपने एक सर्वे में बताया है कि 1991 के बाद से रोज़गार के सृजन में कमी आई है. तो यह ध्यान रखना चाहिए कि खेती से निकाल कर उन्हें एक नई जगह की ग़रीबी में धकेला जा रहा है न कि ग़रीबी से निकाला जा रहा है. शहरी ग़रीबी भयानक स्तर पर है तभी अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ ने शहरों में मनरेगा शुरू करने की बात कही है. मनरेगा न हो तो ग़रीबों का क्या होगा.