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This Article is From Mar 21, 2015

हीरो पेन वाला मेरी ज़िंदगी का हीरो चला गया- रवीश कुमार

Ravish Kumar
  • Blogs,
  • Updated:
    मार्च 25, 2015 21:27 pm IST
    • Published On मार्च 21, 2015 11:24 am IST
    • Last Updated On मार्च 25, 2015 21:27 pm IST

हीरो पेन। हमारे हाथों का चीन से रिश्ता इसी कलम से बना था। जयंतो कर्माकर के पास ही इस कलम को देखा था। कलम की नीब को अपनी उंगलियों से बराबर जकड़ कर वो ऐसे लिखता था, जैसे लिखावट इतरा रही हो। बेहद साफ-सुथरी और सुंदर लिखावट बिल्कुल दिल्ली के अरुणा आसफ़ अली मार्ग पर बने मकानों की तरह। उतनी ही बेतरतीब और ख़राब लिखावट मेरी जैसे दक्षिण दिल्ली की संजय कॉलोनी के बेढब और बदरंग मकान।

स्कूल के छह साल तक मैं और जयंतो कर्माकर साथ-साथ रहे। दोस्ती की कोई तारीख नहीं होती और उसका कोई पैमाना नहीं होता, मगर क्लास में कभी साथ-साथ, तो कभी आगे-पीछे बैठने से एक रिश्ता तो बन ही गया था। जयंतो कभी सेकेंड नहीं आया। हमेशा फर्स्ट आता था। मैं कभी फर्स्ट नहीं आता था। किसी तरह रट्टा मारकर पास कर जाता था।

कई बार कुछ विषयों में फेल होने का भी अनुभव प्राप्त है। मुझे लगता था कि जयंतो की लिखावट में कोई जादू है, जिससे वो फर्स्ट आता है। वो जादू है हीरो पेन। चीन की कलम। मैंने भी वो कलम ख़रीद ली। ग़ौर करने लगा कि जयंतो नीब को कैसे पकड़ता है, कैसे लिखता है। कभी-कभी उस जैसा लिख देता, तो खुश हो जाता था।

जयंतो कर्माकर अपनी कॉपी किसी को नहीं देता था। स्कूल के टॉपर अपनी कॉपी किसी को यूं ही नहीं दिया करते हैं। मगर कभी-कभी वो अपनी कॉपी मुझे दे देता था। घर ले जाकर बहुत ध्यान से देखता रहता था कि उसकी लिखावट इतनी बेहतर कैसे है। एक चाहत तो बन ही गई कि उसके जैसा लिखना है। मैं ख़राब लिखता हूं, मगर जब मूड अच्छा हो, तो जयंतो की तरह लिखने लगता हूं। जब भी साफ़ लिखता हूं, जयंतो याद आ जाता है।

फिर से सबकुछ याद आ गया है। उसके साथ साइकिल से स्कूल जाना और बातें करते हुए लौटना। उसका कभी-कभी यह कहना कि जब गांधी और राजेंद्र प्रसाद ने इतना कुछ किया, तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं। मुझे नहीं मालूम कि उसे कुछ करने का मौका मिला या नहीं या वो इन बातों को भूल गया, लेकिन 'गांधी' फिल्म की शूटिंग वाली बस को सदाकत आश्रम के पास देख हम बहुत देर तक गांधी के बारे में बात करते रहे। तब मुझे गांधी के बारे में इतना ही पता था कि उन्होंने देश आज़ाद कराया है। तब उसे भी बहुत पता नहीं रहा होगा, लेकिन गांधी के बारे में बातें करने के लिए पता होना, तब भी बहुत ज़रूरी नहीं था और आज भी नहीं है।

स्कूल जाने के रास्ते में जयंतो से मुलाकात उसके बड़े भाई की दुकान के सामने होती थी। पटना के दिनों में बहुत दोस्तों के घर जाने का मौका नहीं मिला। हम हमेशा चौराहे या सड़कों पर ही मिला करते थे। बेहद साधारण स्तर की सोने-चांदी की दुकान थी जयंतो की। मैं आज भी उस दुकान पर एक बार में पहुंच सकता हूं। जयंतो मेरी ज़िंदगी में विद्यार्थी जीवन की कमज़ोरियों की दवा बनकर आया। मैंने उसका दामन थाम लिया तो छोड़ा नहीं।

अच्छी तरह याद है। हम कई बार साथ-साथ पढ़ने भी लगे। एक टॉपर का एक कमज़ोर छात्र के साथ मिलकर पढ़ना कम बड़ी बात नहीं थी। मुझे पहली बार आत्मविश्वास नाम की चीज़ का पाला उसी दौरान हुआ था। साथ पढ़ने की जगह उसकी छत थी। साधना के बिना छात्र जीवन में कुछ हासिल नहीं होता है। यह हमने जयंतो से ही सीखा। अपने घर की छत पर उसने एक झोपड़ी बना रखी थी। ब्लैक बोर्ड टंगा होता था, जहां वो गणित के सवालों का खड़े होकर अभ्यास करता था, ताकि नींद में समय न बर्बाद हो जाए। मैं भी अपने घर में खड़े होकर पढ़ने या कहिये कि रटने लगा, ताकि नींद न आ जाए।

मुझे लगने लगा कि कुछ भी दैवीय नहीं है। लगातार अभ्यास करते रहना पड़ता है। अभ्यास करते रहने की आदत मुझे जयंतो से पड़ गई। हमें पता नहीं होता कि हम कब किससे सीख रहे होते हैं। कब किसके प्रभाव में आ रहे होते हैं और वो प्रभाव हमें ज़िंदगी में कहां ले जाने वाला होता है। आप जीवन में अकेले खुद कुछ नहीं होते हैं। आपका निर्माण हमेशा सामाजिक होता है।

मैंने जयंतो कर्माकर को याद करने के लिए यह सब नहीं लिखा है। बल्कि इसलिए लिखा है कि वो हीरो पेन आज भी मेरे पास है। वो स्याही भी, जिससे मैंने पहली बार जयंतो को ही लिखते देखा था। जयंतो ने ही बताया था कि चेलपार्क की टारक्वाइज़ रंग की स्याही अच्छी लगती है। मैंने स्कूल से लेकर एमए के दिनों तक उसी स्याही से लिखा। मगर उस स्याही से लिखना उस दिन छोड़ दिया, जब किसी नौकरी के दौरान संपादक के चेलों ने स्याही पर उनका कॉपीराइट घोषित कर दिया। मैं बोल नहीं पाया कि इस स्याही से तो हम और जयंतो पंद्रह सालों से लिख रहे हैं।

इस बीच हम एक-दूसरे से काफी दूर हो गए। पता ही नहीं चला कि कौन कहां है। वो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने कहीं चला गया और वहां से अपनी यात्रा पर। सात-आठ साल पहले दिल्ली में जब पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई, तो पहली बात यही सुनी कि जयंतो इस दुनिया में नहीं है। काठ मार गया था। खैर जयंतो को खोज लिया गया। बल्कि उसी का कहीं से फोन आ गया था कि तुम ये सब टीवी में खुद से कैसे बोल लेते हो। कोई लिखकर देता है या अपने से। हम दोनों हंसने लगे। उसे पता था कि मैं कैसा बकलोल छात्र रहा हूं। मैं बस इसी बात से खुश था कि जयंतो कहीं नहीं गया है। वो यहीं है।

उस दिन राजनीति को लेकर तीखी बहस भी हो गई थी। ये कितनी अच्छी बात है कि हम स्कूल के दोस्तों को हमेशा स्कूल के दिनों के चश्मे से ही देखते हैं। ऐसे ही देखना भी चाहिए। कभी-कभार बातचीत होती रही, लेकिन हम साइकिल के दिनों की तरह कभी साथ-साथ तो क्या आमने-सामने नहीं आ सके। मुंबई जाने का मौका ही नहीं मिला। दिल्ली में जब भी उसकी कंपनी के शो-रूम को देखता एक बार ज़रूर चला जाता। सिर्फ महसूस करने के लिए कि जयंतो इस कंपनी में काम करता है।

मुझे जयंतो कर्माकर की तरह ही बनना था। मैं हमेशा उसी की तरह बनता रहा। सबकुछ समय से करना और ढंग से करना। बन नहीं पाया वो अलग बात है। बल्कि हमारे स्कूल में कोई जयंतो कर्माकर नहीं बन पाया। बनना तो सब चाहते थे। उससे आगे भी निकलना चाहते थे। मेरे पास जयंतो से चुराया उसका अनुशासन और अभ्यास आज भी है।

मैं आज यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि आज मेरा हीरो चला गया है। बल्कि वो इस दुनिया से दो दिन पहले ही चला गया है। मैं सीधा उठकर उस कमरे में चला गया, जहां हीरो पेन आज भी रखी हुई है। तीस साल से यह कलम मेरे पास है। जयंतो कर्माकर मेरे पास है। अपने कंप्यूटर के की-बोर्ड के सामने हीरो पेन रखकर ये सब लिख रहा हूं। पता नहीं आज क्यों लगा कि कलम की नीब से स्याही रिस रही है। कुछ लिखने के लिए, कुछ वैसा ही लिखने के लिए जैसा जयंतो लिखता था।

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