नए वर्ष का एक और महीना बीत जाने के साथ उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव और पास आ गए हैं। प्रदेश में जहां तीन प्रमुख राजनीतिक दल प्रचार-प्रसार, ब्रांडिंग स्ट्रेटेजी और आक्रामकता के दम पर अपना घर मजबूत कर रहे हैं, वहीं चौथा प्रमुख दल एक के बाद एक हार का सामना करते हुए दिशा की तलाश करता दिख रहा है। सच तो यह है कि 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में चार प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए हार-जीत से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है।
पहले कांग्रेस को लें। उत्तर प्रदेश के कांग्रेस के नेता आजकल अति-उत्साहित हैं। देश में और लोकसभा में तमाम मुद्दों पर उनके नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे-सीधे चुनौती दे रहे हैं, एक नए किस्म की आक्रामकता दिखाकर राहुल यह स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर देश के किसी और राजनीतिक दल के नेता में मोदी को सीधे टक्कर देने की क्षमता है, तो वह सिर्फ उनमें है। ज़ाहिर है कि लम्बे समय से निष्क्रिय पड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं और प्रादेशिक नेताओं के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं है।
गत 2 मार्च को दिल्ली में हुई एक बहुचर्चित बैठक में उत्तर प्रदेश के एक दर्जन से ज्यादा कांग्रेस नेताओं को बुलाया गया था और उनसे पूछा गया कि प्रदेश में कांग्रेस को फिर प्रासंगिक बनाने के लिए उनके क्या विचार हैं। ख़ास बात यह थी कि उनके विचार सुनने के लिए शीर्ष नेताओं के अलावा हाल ही में सुर्खियों में छाए प्रशांत किशोर भी शामिल थे। किशोर को कांग्रेस पार्टी ने पंजाब और उत्तर प्रदेश में पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने के लिए साथ में लिया है। चूंकि किशोर इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और मोदी के लिए जीत की प्लानिंग के लिए जिम्मेदार माने जाते थे, इसलिए पिछले वर्ष हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) ने उन्हें नीतीश कुमार के लिए वैसी ही प्लानिंग करने के लिए अपने साथ जोड़ा था। इस प्रयोग के भी सफल हो जाने के बाद अब किशोर देश में नंबर वन राजनीतिक रणनीतिकार (पोलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट) के रूप में जाने जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के तमाम नेता अब यह मान के चल रहे हैं कि किशोर कुछ ऐसी योजना बनाएंगे कि न केवल राहुल राष्ट्रीय स्तर पर अपना सिक्का जमाएंगे, बल्कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को जीत का रास्ता दिखाएंगे। प्रियंका गांधी के लिए कोई बड़ी भूमिका की खबरें आने के बाद तो प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता और अन्य तमाम नेता भी निश्चिन्त हो चले हैं कि अगले चुनाव में कांग्रेस के अच्छे दिन आने ही वाले हैं।
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के लिए 2017 की हार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राजनीतिक करियर पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा सकती है। फिलहाल तो प्रदेश सरकार विज्ञापन और घोषणाओं के दम पर अपनी पहचान मजबूत करने में लगी हुई है। सत्ता में होने का जो भी लाभ उठाया जा सकता है, वह उठाया जा रहा है।
मुख्य विपक्षी बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के पास यह अंतिम मौका होगा कि वह प्रदेश और देश की राजनीति में खुद को फिर स्थापित कर सकें। पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने का मलाल मायावती को किस कदर है, इसका अंदाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अब अपने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के बारे में कुछ भी टिप्पणी करना लगभग बंद कर दिया है और उनके सारे बयान सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी, विशेष तौर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही होते हैं। अपने दलित समर्थकों के छिटककर भारतीय जनता पार्टी की ओर जाने से रोकने के लिए उन्हें मोदी और बीजेपी को दलित-विरोधी सिद्ध करना अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए जितना ज़रूरी आज है, उतना शायद कभी न था।
लेकिन इन सबके बावजूद बीजेपी में वर्तमान दिशाहीनता का दौर समाप्त होता ही नहीं दिख रहा है। वर्ष 2012 से अब तक हुए सारे उपचुनाव हारने के बाद पार्टी को केवल एक जीत मुज़फ्फरनगर में मिली, और अभी समाप्त हुए विधानपरिषद के चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और शीर्ष नेताओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद एक भी जीत न हासिल करना पार्टी में गहरी बीमारी की ओर संकेत करता है। प्रदेश पार्टी अध्यक्ष स्वयं नहीं जानते कि उन्हें कितने दिन और कार्यवाहक के रूप में काम करना है, अन्य पदाधिकारी इस असमंजस में हैं कि नए अध्यक्ष आने के बाद उनका क्या होगा, वरिष्ठ नेता इस बात से ही परेशान हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उन्हें पहचानते भी हैं कि नहीं।
पार्टी के कुछ पदाधिकारी नाम न बताने के आग्रह के साथ कहते हैं कि पिछले साल प्रदेश से एक सदस्य राज्यसभा जा सकता था, लेकिन उस सीट पर गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को संसद भेजा गया, और उसके बाद से ही प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में अपने उपेक्षित होने की भावना घर कर गई है। प्रदेश के नेता यह मानकर चलने लगे हैं कि लोकसभा में 73 सदस्य उत्तर प्रदेश से होने के बावजूद यदि प्रदेश में पार्टी के लिए कुछ निर्णय लिया जाना है तो वह केंद्रीय स्तर पर ही लिया जाएगा। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम उत्तर प्रदेश में किसी प्रमुख भूमिका के लिए उछलने के बाद भी इस भावना को ही बढ़ावा मिला था। ऐसे में प्रदेश के पदाधिकारी और कार्यकर्ता मिशन 2017 के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।
रतन मणिलाल वरिष्ठ पत्रकार हैं...
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This Article is From Mar 07, 2016
उत्तर प्रदेश का मिशन 2017 - तैयारी में कहां है बीजेपी...?
Ratan Mani Lal
- ब्लॉग,
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Updated:मार्च 07, 2016 12:50 pm IST
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Published On मार्च 07, 2016 12:43 pm IST
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Last Updated On मार्च 07, 2016 12:50 pm IST
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