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This Article is From Oct 26, 2017

टोल की सड़कों पर इतराना कैसा …?

Rakesh Kumar Malviya
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 26, 2017 15:47 pm IST
    • Published On अक्टूबर 26, 2017 15:45 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 26, 2017 15:47 pm IST
हमारे यहां सड़क हमेशा ही एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसे दिखाकर सरकार बनाई और गिराई जाती रही है. बात देश के दि‍ल में बसे मध्यप्रदेश की हो तो यह और प्रासंगिक हो जाती है. चूंकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के दूसरे कार्यकाल का ‘बंटाधार’ भी इसी कमबख्त सड़क ने किया था. अब दिग्विजय सिंह नर्मदा किनारे एक लंबी गैर राजनैतिक यात्रा कर मध्यप्रदेश का एक बड़ा इलाका नाप रहे हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अमरीका में सड़कों के चकाचक हो जाने का दावा पेश कर रहे हैं, वह भी इतना कि एमपी ने यूएस को भी पछाड़ दिया है.  

भारतीय जनता पार्टी में मोदी-अमित युग आने के बाद देश के टॉप टेन भाजपाई लीडर्स में शुमार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सड़क पर दिए बयान की आम जनता में भद पि‍ट रही है, क्‍योंकि वह रोज सड़कों पर नि‍कलती है और उनकी सच्‍चाई जानती है. क्या मध्यप्रदेश में वाकई सड़कों की हालत बेहतर है और क्या सचमुच इतनी बेहतर है कि अमेरिका से भी अच्छी हैं, इस बात पर तमाम तरह का मजाक हो सकता है और हुआ भी, लेकिन जब एक वैश्विक मंच पर इस तरह की बातें भाषणों में कह दी जाती हैं, तो उसकी बहुत तरह से समीक्षा होती ही है. आज ही मध्यप्रदेश के अखबारों ने बता दिया है कि प्रदेश में 13 हजार किलोमीटर सड़कें खराब हैं. केन्द्र सरकार भी स्वीकार कर चुकी है कि प्रदेश में सड़कों की हालत ठीक नहीं और इसके लिए भारी-भरकम बजट की जरूरत है.क्या वाकई मुख्यमंत्रीजी इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं इस बात पर भरोसा नहीं होता. फिर आखिर क्यों जिस देश में सुषमा स्वराज अपने भाषण के जरिए वाहवाही लूट ले जाती हैं, उसी देश में शिवराज सिंह चौहान का यह बयान बड़बोलेपन की तरह सामने आता है. तुलना करना बहुत ही जरूरी था तो दिग्गी राजा के जमाने की सड़कों से तुलना कर लेते, भले ही मध्यप्रदेश की सड़कें वाशिंगटन से अच्छी ही क्यों न हों ? गलती हमारी जनता की है जिसने इतना पिछड़ापन देखा है, कि सचमुच विकास पर एकदम भरोसा नहीं होता.देश में सड़कों का विकास एक अहम प्रक्रिया है और दावा ऐसा है कि आजकल तो हर दिन पहले से ज्यादा सड़क बन रही है. अच्छी बात है सड़क बनने से किसका विरोध हो सकता है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि आजकल वि‍कास के मॉडल क्‍या हैं, वह क्‍या हमारे समाज की जरूरतों और क्षमताओं पर आधारि‍त हैं, या कि‍सी भेड़ि‍याधसान का हि‍स्‍सा हैं ?  देश के सभी राज्‍यों की ज्यादातर सड़कों का वि‍कास आज बीआरटी मॉडल पर किया जा रहा है. इस व्यवस्था में सड़क बना देने के बाद सालों तक इसे इस्तेमाल करने वालों से ही भारी-भरकम टैक्स वसूला जाता है. मध्यप्रदेश में भी बनी ज्यादातर सड़कें इसी सिस्टम पर आधारित हैं, और जो टोल रोड नहीं हैं, उनके बारे में अच्छा होने का दावा नहीं किया जा सकता है.

जब इसी व्यवस्था पर विकास करना है, सड़क बनानी और चलानी है तो इसमें सरकार को खुद अपनी वाहवाही लूटने जैसी क्या बात है. केवल सड़क ही क्यों, ऐसी तमाम सार्वजनिक सेवाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य को सरकार ने सीधे निजी हाथों में देने के बजाए यह एक रास्ता निकाला है. इससे सरकार के पास इस बात की गुंजाइश भी बची रहती है कि इनके निर्माण का श्रेय वह खुद को दे सके और इन व्यवस्थाओं के संचालन से भी उसका पिंड छूट ही जाता है. इसके परि‍णाम भी हमें दि‍खाई देने लगे हैं, सार्वजनि‍क क्षेत्र का दम फूल रहा है और उसी गति से लाभ कमाने के एजेंडे पर आधारि‍त नि‍जी क्षेत्र फलफूल रहा है.अब तो सरकार समाज कल्याण की योजनाओं की बजाय भी हितग्राहियों को नगदी दे देकर अपने तमाम कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना चाहती है, ऐसे में बरसों-बरस से चलाया जा रहा वह सिस्टम ही धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, जिसकी कल्पना भारतीय लोकतंत्र ने एक जनकल्याणकारी शासन व्यवस्था के की थी. ऐसा नहीं है कि अमरीका में भी कोई बड़ा जनकल्याणकारी सिस्टम हो. वहां तो इससे पहले से भुगतान करो और सेवाओं को प्राप्त करो वाली नीतियां को अपनाया गया है, लेकिन कम से कम एक सड़क फिर भी टोल रोड के बाजू में छोड़ी जाती है जिस पर आप चाहें तो बिना टोल टैक्स दिए अपनी गाड़ी लेकर जा सकते हैं, भले ही वह कम अच्छी हो,  हमारे यहां की सड़कों पर तो यह गुंजाइश भी नहीं बचती. यूएस में ही कई राज्‍य ऐसे हैं जहां सार्वजनि‍क परि‍वहन की सेवाएं शहर के अंदर नि‍शुल्‍क चलाई जाती हैं. वहां के सि‍स्‍टम मौसम के अनुकूल हैं, ठेके भले ही नि‍जी हों, लेकि‍न उनकी प्रति‍बद्धताओं से समझौता नहीं कि‍या जाता. रात में भी सड़क पर बर्फबारी हो, तो सुबह सड़कें साफ मि‍लती हैं.

वीडियो: मध्‍यप्रदेश की सड़कें अमेरिका से बेहतर
हमारे यहां तो टोल देना आपकी मजबूरी है, इसके लिए आप सक्षम हों या नहीं हों, अलबत्ता अमरीकियों और भारतीयों की आय और क्रय क्षमता में जमीन आसमान का अंतर है. दि‍क्‍कत यही है कि हम उनके समाज के मुताबि‍क बनाए गए मॉडल को अपना तो लेते हैं, लेकि‍न इसके दूसरे मानकों को वैसा ही छोड़ देते हैं. निर्माण में भ्रष्‍टाचार का पक्ष तो छोड़ ही दीजि‍ए. हमें गर्व जरूर होना चाहि‍ए, हमारे देश की मि‍टटी, हवा, पानी और वि‍कास पर गर्व होना चाहि‍ए, लेकि‍न वह तथ्‍यों और सच्‍चाईयों पर आधारि‍त होना चाहि‍ए.

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...

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