जितिन बीजेपी के लिए कितने बड़े प्रसाद हैं?

जितिन प्रसाद अब आधिकारिक तौर पर बीजेपी में हैं. मन से वे शायद पहले से बीजेपी से जुड़ चुके थे. पिछले कुछ दिनों से वे अपनी ब्राह्मण पहचान पर अतिरिक्त ज़ोर दे रहे थे और उन्होंने ब्राह्मण चेतना मंच भी बना डाला था. बीजेपी अब उनमें कद्दावर सामाजिक नेता देख रही है. बताया जा रहा है कि उनके आगमन से बीजेपी से नाराज़ चल रहे ब्राह्मण फिर पार्टी की ओर मुड़ सकते हैं.

जितिन बीजेपी के लिए कितने बड़े प्रसाद हैं?

जितिन प्रसाद अब आधिकारिक तौर पर बीजेपी में हैं. मन से वे शायद पहले से बीजेपी से जुड़ चुके थे. पिछले कुछ दिनों से वे अपनी ब्राह्मण पहचान पर अतिरिक्त ज़ोर दे रहे थे और उन्होंने ब्राह्मण चेतना मंच भी बना डाला था. बीजेपी अब उनमें कद्दावर सामाजिक नेता देख रही है. बताया जा रहा है कि उनके आगमन से बीजेपी से नाराज़ चल रहे ब्राह्मण फिर पार्टी की ओर मुड़ सकते हैं. यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस में टीम राहुल ने अपने दो सबसे भरोसेमंद सहयोगियों- ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को खो दिया है. यही नहीं, इसे प्रियंका गांधी की नाकामी भी माना जा रहा है जिनके पास उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी है. लेकिन जितिन प्रसाद या ज्योरादित्य सिंधिया के रहते ही कांग्रेस का क्या हुआ? 2014 और 2019 के चुनावों में पार्टी की शर्मनाक हार के बीच क्या इन नेताओं का प्रदर्शन अलग से उल्लेखनीय रहा? जितिन प्रसाद लगातार हारते रहे. मध्य प्रदेश में अपना छोटा सा खेमा लेकर बड़ी वसूली करने निकले ज्योरादित्य सिंधिया को अब तक बीजेपी ने ऐसा कुछ नहीं दिया जो उन्हें कांग्रेस नहीं दे सकती थी. सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा जैसे असंतुष्ट बताए जा रहे युवा कांग्रेसी नेताओं की कशमकश भी यही है कि आखिर उन्हें बाहर जाकर क्या मिल पाएगा। अगर वह बहुत स्पष्ट हो तो वे चले जाएं.

दरअसल भारतीय राजनीति में इन वर्षों में एक बात बहुत स्पष्ट हुई है. उसकी सैद्धांतिक धुरी बिल्कुल टूट चुकी है. संसदीय राजनीति का व्यवहारवाद हर फैसले की आख़िरी कसौटी है- यानी उससे फायदा हुआ या नहीं. इसी तर्क पर 2015 में लालू और नीतीश साथ आ गए, और बाद में नीतीश नरेंद्र मोदी के पीछे लग गए. 2014 के बाद कांग्रेस से बीजेपी में आए नेताओं की सूची गिनने बैठें तो पता चलेगा कि कई सूचियां इसके आगे छोटी पड़ गईं. साफ़ है कि भारत को कांग्रेसमुक्त बनाने का बीजेपी का सपना दरअसल खुद कांग्रेसयुक्त हो जाने के यथार्थ से जुड़ा है. 2021 में बंगाल में बीजेपी की हवा के झांसे में आकर तृणमूल के कई पत्ते उड़ते हुए इस ओर आ गए. नतीजों के बाद उनको अब पुरानी शाखा याद आ रही है. ममता अगर हार जातीं तो इन नेताओं को पार्टी में शामिल करने का फ़ैसला मास्टर स्ट्रोक कहलाता. बीजेपी पिट गई है तो अब इन फ़ैसलों का मज़ाक बनाया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश पर लौटें. फिलहाल बीजेपी वहां अलोकप्रिय होती बताई जा रही है. पार्टी या परिवार के किसी अंदरूनी सर्वेक्षण के हवाले से कहा जा रहा है कि इस बार पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलने जा रही. इसी ख़बर के बाद यह कयास भी चल पड़ा कि बीजेपी राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की सोच रही है.

लेकिन क्या बीजेपी वाकई योगी आदित्यनाथ को हटा सकती है? सच तो यह है कि पार्टी का यूपी में जो भी हाल हो, लेकिन आज की तारीख़ में योगी आदित्यनाथ लोकप्रियता के लिहाज से बीजेपी के भीतर नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता हैं- शायद अमित शाह से भी ज़्यादा लोकप्रिय. वे आने वाले कल के मोदी की तरह भी पेश किए जाते हैं. माना जा रहा है कि 90 के दशक में जो हैसियत आडवाणी की थी, वह अब मोदी की है और जिस तरह मोदी आडवाणी के उत्तराधिकारी बने, उसे तरह योगी भी मोदी के वारिस हो सकते हैं. बीजेपी समर्थकों में खुशी-खुशी यह चर्चा चलती है कि विपक्ष मोदी को झेल नहीं पा रहा, योगी को कैसे झेलेगा. आखिर बीजेपी ने अपनी जो नई छवि बनाई है, उसमें उसके पुराने नेता नहीं खपते.

तो क्या योगी इतने कातर या बीजेपी इतनी भोली है कि जितिन प्रसाद के सहारे वह यूपी की नैया पार करना चाहे? ऐसा कुछ नहीं है. 2022 में यूपी में बीजेपी का प्रदर्शन बस इस बात पर निर्भर करता है कि तब कौन सी लहर चलेगी- मोदी/योगी मिक्स के कट्टर और आक्रामक हिंदुत्व के नारों से युक्त तथाकथित महान भारतवर्ष वाली या महामारी की मारी और विकास के मोहभंग के बाद उकताए लोगों के परेशानहाल हिंदुस्तान की नाराज़गी वाली. निस्संदेह इसमें जातिगत समीकरण चलेंगे, लेकिन वे भी इस बात पर निर्भर करेंगे कि छह महीने में राज्य और राजनीति की क्या तस्वीर बनती है.

बहरहाल, कांग्रेस के लिए चुनौती कई स्तरों पर है. पार्टी ने साख भी खोई है, सांगठनिक क्षमता भी और अपने साथी भी गवाएं हैं. बंगाल में वह खाता नहीं खोल सकी और यूपी में डर है, वह पांचवें या छठे नंबर पर न चली जाए. जाहिर है, पार्टी के पुनर्संस्कार की चुनौती राहुल-प्रियंका के लिए भारी पड़ रही है. इस चुनौती की राह में बहुत सारे जनाधारविहीन नेता हैं जो बची-खुची कांग्रेस में अपने हिस्से की इच्छा के साथ चिट्ठी लिखने से लेकर बगावत करने तक कई गलियों से गुज़रते हैं. इनके रहने या जाने से कांग्रेस को कोई फर्क पड़ता है- ऐसा लगता नहीं.

दरअसल यूपी के सत्ता समीकरण इस बात से भी तय होंगे कि विपक्ष योगी आदित्यनाथ की कैसी घेराबंदी कर पाने में कामयाब होगा. अगर सपा, आरएलडी और चंद्रशेखर आज़ाद की भीम आर्मी साथ आ जाएं तो बेशक, उनके लिए कुछ मुश्किल पैदा हो सकती है. दिलचस्प ये है कि अभी इस गठजोड़ में कोई कांग्रेस की गणना नहीं कर रहा- जबकि एक समय इसी यूपी में अखिलेश-राहुल की दोस्ती का हवाला दिया जाता था और डिंपल-प्रियंका के सहारे जीत का डंका बजाने जैसे नारे लगते थे.

तो कांग्रेस की असली चुनौती जितिन प्रसाद जैसे नेताओं के आने-जाने की नहीं, खुद को बचाने की है. वैसे इस चुनौती का वास्ता भी राहुल-प्रियंका के किसी महापराक्रम से नहीं, जनता के बदलते रवैये से है. यह धीरे-धीरे साफ़ होता जा रहा है कि कांग्रेस न तो बीजेपी की तरह एकायामी राष्ट्रीय दल होकर रह सकती है और न ही वह अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह किसी एक या कुछ इलाक़ों में सिमटी हुई पार्टी रह सकती है. वह पूरे देश को जोड़ने वाली ऐसी पार्टी बन सकती है जो अपने बहुमत से दूसरों को आक्रांत न करे, लेकिन इतनी सीटें ज़रूर ले आए कि वह खुद बैसाखी न दिखे, बल्कि दोस्तों की मदद से साथ-साथ चल सके. फिलहाल यह भी एक बड़ा काम लगता है. लेकिन जैसे ही बीजेपी का विराट किला दरकेगा, बहुत सारी ईंटें और सीटें कांग्रेस की झोली में गिरेंगी. इस बीच रीता बहुगुणा से लेकर ज्योतिरादित्य सिधिंया और जितिन प्रसाद बस इतना कर सकते हैं कि कल तक राहुल को महान बताते रहे और अब नरेंद्र मोदी को महान बताना शुरू कर दें. भारतीय राजनीति के बहुत सारे अंतर्द्वंद्वों के बीच यह बहुत सारे नेताओं के लिए वफ़ादारियां बदल कर ख़ुद को प्रासंगिक बनाने की दयनीय कोशिश का दौर भी है.


प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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