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This Article is From Aug 18, 2014

पाक से विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द

Ravish Kumar
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  • Updated:
    नवंबर 20, 2014 12:43 pm IST
    • Published On अगस्त 18, 2014 21:10 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 20, 2014 12:43 pm IST

नमस्कार.. मैं रवीश कुमार। 25 अगस्त को भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह सचिव स्तर की बातचीत के लिए इस्लामाबाद नहीं जाएंगी। भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ये एलान किया। भारत को पाकिस्तान उच्चायुक्त का तथाकथित हुर्रियत नेताओं से मिलना नाग़वार गुज़रा है। यह मुलाकात आज दिल्ली में पाक उच्चायोग में हुई और मंगलवार को भी होनी है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरूद्दीन ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि एक ऐसे समय में जब भारत सरकार गंभीर प्रयास कर रही हो द्विपक्षीय वार्ता की तरफ कदम बढ़ा रही हो, पाकिस्तानी के उच्चायुक्त का तथाकथित हुर्रियत नेताओं को बुलाना पाकिस्तान की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है। पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों में लगातार दखल दे रहा है।

विदेश सचिव ने आज पाकिस्तान के उच्चायुक्त को साफ शब्दों में बता दिया कि पाकिस्तान का भारत के आंतरिक मामलों में दखल देना बर्दाश्त नहीं होगा। मई महीने में अपने कार्यकाल के पहले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने जो कूटनीतिक शुरुआत की थी, उसके असर को आपने हुर्रियत नेताओं से मिलकर कम किया है। पाकिस्तान के पास मुद्दों को सुलझाने का एकमात्र रास्ता यही है कि वह शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के ज़रिये कदम बढ़ाये जो शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के अनुकूल हो। इसलिए मौजूदा हालात में भारत की विदेश सचिव के अगले हफ्ते इस्लामाबाद जाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है और उनका दौरा स्थगित किया जाता है।

भारत ने साफ−साफ कह दिया कि दोनों के बीच सिर्फ सरकारों के मार्फत बात होगी कोई और पक्ष नहीं होगा। कांग्रेस इस मुलाकात के मद्देनज़र इन घटनाओं को लेकर सरकार पर आक्रामक होती जा रही थी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि पाकिस्तान के उच्चायुक्त हुर्रियत नेताओं से मिल रहे हैं। अब सरकार की कूटनीति कहां चली गई है। क्या सरकार पाकिस्तान के इस कदम को मंज़ूर करती है? सलमान खुर्शीद ने सरकार पर आरोप लगाया कि विपक्ष में रहते हुए बीजेपी कहती थी कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकती। सरकार में आकर कुछ और कर रही है। दोहरे मानदंड अपना रही है।

राज्य सभा सांसद और बीजेपी से निलंबित राम जेठमलानी ने पिछले हफ्ते श्रीनगर में हुर्रियत चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी से मुलाकात की थी। अख़बारों की रिपोर्ट के अनुसार यह मुलाकात अनौपचारिक थी, क्योंकि जेठमलानी दिल्ली में हुर्रियत नेताओं के केस लड़ते हैं। दोनों ने कश्मीर के हालात पर भी चर्चा की।

आप जानते हैं कि नवंबर में जम्मू कश्मीर में विधान सभा चुनाव होने हैं। अचानक ऐसा क्या हुआ कि भारत ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात को इतनी तवज्जो दे दी।

26 मई को जब नरेंद्र मोदी ने नवाज़ शरीफ़ को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया तब भी हालात वही थे। पहले ही दिन पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों के प्रधानों को न्योत कर मोदी ने ऐसा मास्टर स्ट्रोक चला कि वे सारे सवाल दब गए जिनमें पूछा जा रहा था कि ऐसा क्या हो गया कि पहले ही दिन पाकिस्तान को बुलाया गया। क्या पाकिस्तान ने 26 नवंबर के मुंबई हमले पर कोई अतिरिक्त आश्वासन दिया है या ये कहा है कि वह आतंकवाद खत्म कर देगा। इन सब सवालों के बाद भी सबने इस मुलाकात का स्वागत किया।

अपने इस दौरे में नवाज़ शरीफ़ ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात नहीं की, जबकि पाकिस्तान के हुक्मरान दिल्ली आने पर हुर्रियत नेताओं से मिलते रहे हैं। पिछले साल ही भारत दौरे पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री सरताज़ अज़ीज़ ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की थी। 2001 में आगरा बातचीत के लिए भारत आने से पहले मुशर्रफ ने पाकिस्तान में हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की थी। तब वाजपेयी ने दौरा रद्द नहीं किया। 2005 में लाल कृष्ण आडवाणी ने इस्लामाबाद में कहा था कि मुझे इसमें कोई खामी नज़र नहीं आती कि हुर्रियत नेता यहां आएं और बातचीत करें। यह उनका हक है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी यही कहा है कि दोनों देशों के बीच किसी बड़ी पहल के मौके पर हुर्रियत नेताओं से मुलाकात होती रही है, ताकि कश्मीर मसले का कोई समाधान निकाला जा सके। भारत के फ़ैसले से दोनों पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते सुधारने की हमारे नेतृत्व की कोशिशों को झटका लगा है।

हुर्रियत नेता शब्बीर अहमद शाह ने कहा कि आज ऐसा क्या हो गया कि हमारी मुलाकात से इतना फर्क पड़ गया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी साहब ने हुर्रियत कांफ्रेंस को बुलाया था, औपचारिक बातचीत की, फिर क्यों नहीं उन्हें रोका गया। जब ख़ुद वज़ीर-ए-आज़म हिन्दुस्तान ने पाकिस्तान कश्मीर आज़ादी के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया था। मनमोहन सिंह ने भी उनके नेताओं को बुलाया तब ये विवाद क्यों नहीं उठा, आज क्यों उठा?

शब्बीर शाह ने एक और बात कही कि प्रधानमंत्री मोदी को स्वीकार करना पड़ेगा कि कश्मीर विवादित मुद्दा है और बातचीत तीन पक्षों के बीच होगी। याद कीजिये जब रामदेव के करीबी वेद प्रताप वैदिक मुंबई हमले के आरोपी हाफिज़ सईद से मिलकर आए तो कितना हंगामा हुआ। इसकी छींटे सरकार पर भी पड़े थे। 26 जुलाई को जब पाक फेडरल इंवेस्टिगेशन एजेंसी ने मुंबई हमले के मामले में वहां की अदालत में चाजर्शीट पेश की, उसमें हाफिज़ सईद का नाम तक नहीं था। तब तो बातचीत रद्द नहीं हुई।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपने बयान में सीज़फायर के उल्लंघनों का ज़िक्र तक नहीं किया। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने राज्य सभा में कहा था कि मई 26 से 16 जुलाई तक पाकिस्तान ने एलओसी पर 19 बार सीज़फायर का उल्लंघन किया है। भारत ने हर गोलीबारी का मुकम्मल जवाब भी दिया और पाकिस्तान की सरकार से शिकायत भी की गई। 27 मई को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से पहली मुलाकात में ही प्रधानमंत्री मोदी ने सीज़फायर के महत्व पर ज़ोर दिया था। पिछले साल पाकिस्तान ने एलओसी पर 199 मतर्बा सीज़फ़ायर का उल्लंघन किया था। वैसे बीते दस दिनों में 11 बार सीज़फायर का उल्लंघन हुआ है।

आज जब खबर आई कि भारत की विदेश सचिव अगले हफ्ते इस्लामाबाद नहीं जाएंगी, तब रक्षा मंत्री अमृतसर में थे उन इलाकों का दौरा कर रहे थे जो पाकिस्तान की सीमा से लगे हुए हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि अगर पाकिस्तान सीज़फायर का उल्लंघन कर उकसाए, अलगाववादी नेताओं को दूतावास में आने का न्यौता दे तो यह गंभीर है। यह पाकिस्तान पर निभर्र करता है कि वह तय करे कि भारत के साथ किस तरह का रिश्ता चाहिए।

शपथग्रहण के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर प्रधानमंत्री मोदी ने एक संकेत दिया कि वह जनमत या धारणा के ख़िलाफ़ किसी हद तक जा सकते हैं। जनमत को अपने पक्ष में कर सकते हैं। पाकिस्तान में इस वक्त राजनीतिक हालात भी सही नहीं है। इस्लामाबाद में अन्ना आंदोलन टाइप धरनों का दौर जारी है।

(प्राइम टाइम इंट्रो)

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