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OPINION
This Article is From Jun 25, 2021

चिराग और तेजस्वी के मिलने के क्या हैं मायने? नीतीश और BJP को कितना हो सकता है नुकसान?

बिहार की त्रिकोणीय राजनीति में अगर चिराग और तेजस्वी एकसाथ (30 + 6= 36 फीसदी) आते हैं (ऐसा पहली बार नहीं होगा, जब पासवान लालू के साथ होंगे, 2009 का लोकसभा चुनाव लोजपा और राजद मिलकर लड़ चुके हैं) तो एनडीए के खिलाफ उनका पलड़ा भारी हो सकता है.

साल 1990 की बात है. 324 सदस्यों वाली बिहार विधान सभा के लिए हुए चुनाव में 122 सीटें जीतकर तब जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. बड़ी बात यह है कि दो साल पहले ही 1988 में जनता दल का गठन हुआ था. तब सीएम की रेस में लालू यादव और पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पसंद रामसुंदर दास थे लेकिन लालू खुद दावेदार थे. तब उन्होंने चंद्रशेखर से मदद की अपील की थी. चंद्रशेखर ने रघुनाथ झा को मैदान में खड़ा कर दिया और जब विधायक दल के नेता का चुनाव हुआ तो लालू ने बाजी मार ली थी. उस चुनाव में लालू की तरफ से किलेबंदी नीतीश कर रहे थे, जबकि रामविलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस, जो अलौली से विधायक थे, ने रामसुंदर दास के पक्ष में वोट किया था. ये सभी उस वक्त जनता दल में ही थे.

1990 से लगातार 2005 तक बिहार पर लालू-राबड़ी का राज रहा लेकिन 2005 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो विधान सभा त्रिशंकु बन गया. इस समय तक जनता दल से छिटककर लालू ने राष्ट्रीय जनता दल बना ली थी. रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी बना ली थी और नीतीश जेडीयू के नेता हो चुके थे. 2005 (फरवरी) के चुनाव नतीजों के बाद सत्ता की चाभी रामविलास पासवान के पास थी. उनके पास 29 विधायक थे. पासवान किंगमेकर की भूमिका में थे. पासवान उस वक्त यूपीए में थे और केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री थे. लालू भी केंद्र में रेल मंत्री थे. बावजूद दोनों के बीच सियासी तलवारें खिंची हुई थीं. पासवान मुस्लिम सीएम की रट लगाते रह गए.

अंतत: राज्यपाल बूटा सिंह ने केंद्र के दबाव (लालू के दबाव) में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी. नवंबर 2005 में जब दोबारा चुनाव हुए तो नीतीश ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली. तब नीतीश की पार्टी जेडीयू को 88, बीजेपी को 55, लालू की आरजेडी को 54 और पासवान की एलजेपी को मात्र 10 सीटें मिली थीं. इस तरह पासवान ने 15 वर्षों के लालू-राबड़ी शासन के खात्मे और नीतीश राज के शुरुआत की भूमिका तैयार कर दी.

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हालांकि, नीतीश और पासवान में भी कभी पटी नहीं. दोनों के बीच अदावत की कहानी 1977 के बेलछी कांड से जुड़ी है. आपातकाल खत्म होने के फौरन बाद पटना (अब नालंदा) जिले के बेलछी में दबंग कुर्मी समुदाय के लोगों ने 10 दलितों के जिंदा जला दिया था. इस घटना के बाद इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर बेलछी पहुंची थीं. दलित पीड़ितों में पासवान जाति के लोग थे. इस मुद्दे ने राजनीति में कुर्मी बनाम पासवान का मोड़ ले लिया था, जो नीतीश बनाम पासवान के रूप में बदल चुका था. इसी का नतीजा है कि 1977 में जेपी के चेले के रूप में चुवाव लड़ने वाले नीतीश कुमार हरनौत विधान सभा चुनाव हार गए थे. यही बात रही कि एक दो मौकों को छोड़कर रामविलास पासवान कभी नीतीश के करीब नहीं हुए.

रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान ने भी 2020 के बिहार विधान सभा चुनावों में नीतीश से पुरानी सियासी रंजिश का बदला लेना चाहा. पासवान की पार्टी तो खुद एक सीट ही जीत पाई लेकिन 32 सीटों पर जेडीयू की हार का कारण बनी. नीतीश ने भी मौका देखकर उनकी पार्टी के पहले इकलौते विधायक को अपने पाले में किया और अब छह में से पांच सांसदों को चिराग से अलग करवा दिया.

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अब कयास लगाए जा रहे हैं कि चिराग पासवान और लालू के लाल तेजस्वी यादव एक हो सकते हैं. तेजस्वी ने चिराग की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है. इसके लिए राजद ने रामविलास पासवान की जंयती (5 जुलाई) मनाने का एलान किया है. 5 जुलाई को ही राजद का भी स्थापना दिवस है लेकिन राजद ने उससे जुड़े कार्यक्रम बाद में करने का फैसला किया है. 5 जुलाई से ही चिराग पासवान ने पिता के संसदीय क्षेत्र रहे हाजीपुर से पूरे बिहार में आशीर्वाद यात्रा निकालने का फैसला किया है.

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दो सियासी धुरंधर पिता की राजनीतिक विरासत संभाल रहे दोनों युवा नेताओं के एकजुट होने के बिहार में बड़े सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. अगर दोनों नेता एक छाते या गठबंधन के नीचे आते हैं तो बिहार का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है.  हालिया हुए विधान सभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो पता चलता है कि बीजेपी को 19.5 फीसदी जबकि जेडीयू को 15.4 फीसदी वोट मिले हैं. इनके उलट महागठबंधन के बड़े घटक राजद को अकेले 23.1 फीसदी, कांग्रेस को 9.5 फीसदी, सीपीआई और सीपीआई(एम) को 1.47 फीसदी वोट मिले हैं. 

लोजपा को इस चुनाव में 5.66 फीसदी वोट मिले थे. राजद के MY वोट से छिटककर AIMIM की ओर गया वोट प्रतिशत भी 1.25 फीसदी है. राजद के पास MY समीकरण की बदौलत जहां 30 फीसदी (16 फीसदी मुस्लिम और 14 फीसीदी यादव) वोट बैंक के दावे किए जाते रहे हैं. वहीं पासवान समुदाय का करीब 6 फीसदी वोट है. हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि पासवान चिराग के साथ जाएंगे या पशुपति पारस के साथ लेकिन इस बात की संभावना ज्यादा है कि पासवान समुदाय बुजुर्ग पारस की जगह युवा चिराग का साथ दे सकता है.

बिहार की त्रिकोणीय राजनीति में अगर चिराग और तेजस्वी एकसाथ (30 + 6= 36 फीसदी) आते हैं (ऐसा पहली बार नहीं होगा, जब पासवान लालू के साथ होंगे, 2009 का लोकसभा चुनाव लोजपा और राजद मिलकर लड़ चुके हैं) तो एनडीए के खिलाफ उनका पलड़ा भारी हो सकता है और राज्य में युवाओं के हाथ सियासी कमान आ सकती है. यह अलग बात है कि लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के शासनकाल के खात्मे की वजह चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान ही बने थे लेकिन शायद दोनों परिवार पुरानी सियासी रंजिश को भुलाकर अब बदली परिस्थितियों में नीतीश और बीजेपी के करीब दो दशक के शासनकाल का खत्म करना चाहेंगे.

प्रमोद कुमार प्रवीण NDTV.in में चीफ सब एडिटर हैं...

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