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संकट के समय देशवासियों पर यकीन, कई बार कमाल कर चुकी पीएम मोदी की ये तरकीब

Dharmendra Singh
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 14, 2026 09:28 am IST
    • Published On मई 14, 2026 08:54 am IST
    • Last Updated On मई 14, 2026 09:28 am IST
संकट के समय देशवासियों पर यकीन, कई बार कमाल कर चुकी पीएम मोदी की ये तरकीब

क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर चिंताजनक रूप से पड़ेगा? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी अपीलों के जरिए एक बार फिर जनता को साथ जोड़ने में सफल होंगे? और क्या पिछली बारों की तरह सरकार इस संभावित संकट से भी सफलतापूर्वक उबर पाएगी? क्या मोदी अपनी मुहिम में फिर सफल होंगे? ये तमाम सवाल आज के वैश्विक हालात को देखते हुए बेहद अहम हो जाते हैं.

दरअसल, मौजूदा समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में तनाव और विशेषकर ईरान से जुड़े हालात ने कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है. भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, यह स्थिति सीधे आर्थिक दबाव का संकेत देती है. तेल संकट की आशंका के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से सात अपीलें की हैं, जिनमें सोना खरीद टालने, विदेश यात्राओं को सीमित करने, ईंधन की बचत करने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने और घरेलू संसाधनों के अधिक विवेकपूर्ण उपयोग जैसे सुझाव शामिल बताए जा रहे हैं.

जनता से अपील क्यों की?

चाहे कोई भी सरकार हो, ऐसे संकट की स्थिति में देश की जनता को साथ लेना जरूरी हो जाता है. चाहे जवाहर लाल नेहरू हों, या लाल बहादुर शास्त्री हों, या इंदिरा गांधी हों, या फिर नरेन्द्र मोदी जनभागीदारी के जरिए ही इस विकट परिस्थिति से निपटा जा सकता है. यह अलग बात है कि केन्द्र की मौजूदा सरकार ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जनता के समर्थन से कई असंभव कामों को संभव बनाया है. चाहे देश का संकट हो या विदेश का संकट, संकट की घड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार जनता के समर्थन से अपनी मुहिम को सफल बनाने की रणनीति पर जोर देते रहे हैं. उनकी राजनीति और प्रशासनिक शैली में जनभागीदारी और जनशक्ति का विचार केंद्र में रहा है. जनता पर उनका भरोसा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक गहरी प्रशासनिक और आर्थिक रणनीति का हिस्सा माना जाता है. तेल संकट सिर्फ सरकार का संकट नहीं होता, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता के जीवन से जुड़ा मुद्दा होता है. ऐसे में सरकार का मानना है कि जब जनता और सरकार तालमेल के साथ एक दिशा में चलते हैं, तभी वैश्विक संकटों का प्रभाव कम किया जा सकता है. उनका अनुभव भी इसी मॉडल को मजबूत करता है, चाहे नोटबंदी हो, जीएसटी लागू करने की प्रक्रिया हो या कोरोना काल का संकट, सरकार ने जनता की भागीदारी के साथ कई कठिन परिस्थितियों को संभालने की कोशिश की है. यही वजह है कि जनभागीदारी को उनकी शासन शैली की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है.

आर्थिक संकट से मुकाबला

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने लगभग 24 वर्षों के राजनीतिक करियर में कभी चुनावी हार की स्थिति से निर्णायक रूप से प्रभावित नहीं हुए, ऐसा उनका राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड रहा है. मतलब वो कोई जंग हारना नहीं चाहते हैं, आखिरी वक्त जीत की कोशिश करते हैं. उनकी छवि केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि पाकिस्तान के साथ तनाव, चीन की विस्तारवादी नीति, अमेरिका के टैरिफ विवाद, कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता जैसे बड़े संकटों के संदर्भ में भी चर्चा में रही है. अब ईरान और पश्चिम एशिया के तनाव तथा अमेरिका-इज़रायल से जुड़े संघर्ष की पृष्ठभूमि में भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर असर की आशंका जताई जा रही है. विशेषकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास किसी भी प्रकार की बाधा से तेल, गैस और खाद्य आपूर्ति प्रभावित होने की संभावना पर चिंता जताई जा रही है. हालांकि सरकार का दावा है कि तेल और गैस सिलेंडर का फिलहाल संकट नहीं है लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए एहतियात बरतना जरूरी है.

संकट में मोदी मंत्र

मोदी सरकार एक बार फिर अपने मोदी मंत्र और जनभागीदारी मॉडल पर भरोसा करती दिखती है. यह वही मॉडल है जिसमें एक अपील पर बड़े जन-आंदोलन खड़े होते दिखे हैं. स्वच्छ भारत अभियान में लाखों लोगों का जुड़ना हो, कोरोना काल में ताली-थाली और दीया जलाने का आह्वान हो, योग दिवस पर करोड़ों लोगों की भागीदारी हो या “मैं भी चौकीदार हूं” अभियान. सरकार समर्थक इसे जनता की स्वैच्छिक भागीदारी का उदाहरण मानते हैं.

कोरोना काल में जीती थी बड़ी जंग

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया के साथ भारत भी गंभीर संकट में था. यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी परीक्षा मानी जाती है. इस दौर में लिए गए निर्णयों का असर भारत की राजनीति, प्रशासन और जनता, तीनों स्तरों पर गहराई से पड़ा. 2020 में जब कोरोना तेजी से फैल रहा था, तब देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया. जनता कर्फ्यू का आह्वान हुआ और मास्क, सामाजिक दूरी, “ताली-थाली” और “दीया जलाओ” जैसे प्रतीकात्मक अभियानों के जरिए जनता को जोड़ा गया. बड़ी संख्या में लोगों ने इन अभियानों में भाग लिया और सरकारी अपीलों का पालन किया. इसी दौरान वैक्सीन को लेकर तरह-तरह की अफवाहें भी फैलीं, लेकिन इसके बावजूद बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान सफल रहा. रिपोर्टों के अनुसार देश में 100 करोड़ से अधिक लोगों ने वैक्सीन लिया, जबकि कुल वैक्सीन डोज की संख्या लगभग 200 करोड़ तक पहुंची.

मोदी की स्वच्छता अभियान का असर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया स्वच्छ भारत मिशन (SBM) भारत के सबसे बड़े जन-आंदोलनों में से एक बन गया. 2024 में इस अभियान के 10 वर्ष पूरे हुए। 2024 में 17 करोड़ से अधिक लोगों की सार्वजनिक भागीदारी दर्ज की गई. 19.70 लाख से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत 45 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए. 2025 तक यह अभियान 11 वर्ष पूरे कर चुका है. रिपोर्टों के अनुसार इसके तहत 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ और देश में लगभग पूर्ण स्वच्छता कवरेज हासिल करने का दावा किया गया. इसका असर हुआ है कि देश में स्वच्छता के लिए देश में जागरूकता फैली और सरकार से लेकर जनता सार्वजनिक जगहों पर साफ और सफाई पर ध्यान देने लगी.

गैस सब्सिडी से लेकर ट्रेन टिकट की सब्सिडी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों में कई बार यह देखा गया है कि सरकार योजनाओं को जनसहभागिता से जोड़ने की कोशिश करती है. एलपीजी गैस सब्सिडी इसका एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है. उज्ज्वला योजना के तहत 2016 में 10.33 करोड़ से अधिक परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए. इसके बाद सरकार ने सक्षम वर्ग से स्वेच्छा से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील की, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 1.10 करोड़ लोगों ने सब्सिडी छोड़ दी. इसी तरह रेलवे में वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली रियायत पर भी स्वैच्छिक त्याग की अपील की गई. पुरुष वरिष्ठ नागरिकों को 40 प्रतिशत और महिला वरिष्ठ नागरिकों को 50 प्रतिशत तक छूट मिलती थी. रिपोर्टों के अनुसार लगभग 40 लाख से अधिक लोगों ने यह रियायत छोड़ने का विकल्प चुना, जिससे सरकार को करोड़ों रुपये की बचत का दावा किया गया.

मोदी की दीवानगी और जन-आंदोलन की ताकत

संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा के बाद 21 जून को योग को वैश्विक पहचान मिली. इस अभियान में भारत की भूमिका केंद्र में रही. 2018 में लगभग 9.59 करोड़ लोगों ने योग दिवस में भाग लिया, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 24.53 करोड़ तक पहुंच गई. 2025 का विषय “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग” रखा गया, जो योग को वैश्विक कल्याण और स्थिरता से जोड़ता है. इसके अलावा, राजनीतिक और सामाजिक अभियानों में भी व्यापक जनभागीदारी देखी गई. चाहे बीजेपी सदस्यता अभियान हो जिसमें करोड़ों लोग जुड़े, या फिर 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान “मैं भी चौकीदार हूं” अभियान, जिसमें सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर भागीदारी देखने को मिली.

दिखने लगा है असर

पीएम मोदी की अपील के बाद केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार अपने खर्चें, काफिले में कटौती, हवाई उड़ान में कटौती की है. सरकार की अपील के बाद सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क में बढ़ोतरी की गई, ताकि अनावश्यक सोने की खरीद और आयात पर अंकुश लगाया जा सके और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो. इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों ने प्रशासनिक खर्च में कटौती की दिशा में कदम उठाए, जिसमें अनावश्यक सरकारी यात्राओं को सीमित करना, बड़े काफिलों के उपयोग को कम करना और बैठकों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से करना शामिल रहा. हवाई यात्राओं में भी गैर-जरूरी विदेश दौरों और आधिकारिक डेलीगेशन को सीमित करने पर जोर दिया गया. कुल मिलाकर, शुल्क बढ़ोतरी और खर्च कटौती दोनों मिलकर आर्थिक अनुशासन और संसाधन बचत की दिशा में उठाए गए प्रमुख कदम हैं.

तेल संकट और वैश्विक तनाव के मौजूदा हालात में भारत एक बार फिर आर्थिक और रणनीतिक चुनौती के दौर से गुजर रहा है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार और जनता का यही तालमेल एक बार फिर देश को संभावित संकट से मजबूती के साथ निकाल पाता है या नहीं?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक तरफ जनता के सहयोग से तेल संकट के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह भी उम्मीद बनी हुई है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का कोई कूटनीतिक समाधान निकल सकता है.

(धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव और राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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