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    नीतीश का दिल्ली जाना: बिहार की राजनीति पर क्या असर होगा? 

    नीतीश कुमार पिछले लगभग दो दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं. उनके दिल्ली जाने से राज्य में एक बड़ा नेतृत्व शून्य पैदा होगा.

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    बोरा के बाद बोरदोलोई, क्या कांग्रेस का क्राइसिस मैनेजमेंट ब्रेक फेल?

    सियासत में हार से ज्यादा खतरनाक होता है अपने ही लोगों का भरोसा खो देना. सवाल यह है कि यह भरोसा केंद्रीय नेतृत्व की वजह से टूट रहा है या राज्य स्तर की गुटबाजी इसकी जड़ में है? यह भी बड़ा सवाल है कि राज्य नेतृत्व को वहां के नेता क्यों मानने को तैयार नहीं होते.

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    केजरीवाल की गिरफ्तारी से लोकसभा चुनाव में किसे फायदा?

    राजनीति में समय अहम होता है कि एक समय केजरीवाल सारी पार्टियों और नेताओं को भ्रष्ट कहते रहे, जिस पर नेता और पार्टी तिलमिलाते भी रहे, लेकिन समय का चक्र बदला तो केजरीवाल पर ही अब भ्रष्ट होने का आरोप है, लेकिन केजरीवाल जिन विपक्षी नेताओं को भ्रष्ट कहते रहे, वे खुद आज उनके साथ हैं.

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    विदेश में एंटी इनकम्बेंसी, लेकिन देश में प्रो इनकम्बेंसी कैसे?

    बीजेपी दावा करती है कि उनके पास मजबूत नेतृत्व और ठोस इरादे वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, इसीलिए मोदी का चेहरा पार्टी से बड़ा कर दिया गया है. संदेश यही है कि मोदी मतलब बीजेपी, मोदी मतलब भारत.

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    दुष्यंत कुमार की स्मृति में : साधारण जन-जीवन की असाधारण शायरी

    दुष्यंत की गजलों और कविताओं में भारतीय समाज की अभाव-वेदना और दुर्बल वर्गों की निरुपायता के इतने 'मंजर' भरे पड़े हैं कि लगता है कि खुद दुष्यंत कुमार ने अपने दौर को उन्हीं की नजरों से जिया था. यही कारण है कि सरल हिंदी में कलमबद्ध उनकी गजलें हर उस व्यक्ति और समूह के लिए नारों में तब्दील हो गईं जो परिवर्तनकामी था. अपने परिवेश की बुनियाद को हिलाने की आरजू लिए था.

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    बार-बार, हर बार और कितनी बार होगी चुनाव आयोग की अग्नि परीक्षा

    Lok Sabha Elections: पारंपारिक मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया में आई क्रांति ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी है. डिजिटल युग में खबरें बिजली की रफ्तार से पूरे देश में पहुंच रही हैं. साक्षरता संग जागरूकता भी बढ़ी है, लेकिन ध्रुवीकरण और विद्वेष में भी इजाफा हुआ है.

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    हिन्दी हार्टलैंड में महाभारत : फिर दक्षिण क्यों गए राहुल गांधी...?

    कभी 400 से ज़्यादा सीट हासिल करने वाली कांग्रेस 52 पर सिमट गई है, एक समय ऐसा भी था, जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तूती बोलती थी. UP में तूती बोलने वाली कांग्रेस पार्टी को अब अपने गढ़ अमेठी और रायबरेली की शायद परवाह ही नहीं है, लेकिन सवाल है कि क्या राहुल गांधी का फैसला सही है या वोटर के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए...?

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    राजस्थान में दलित-आदिवासी वोटर इस बार किस पार्टी पर मेहरबान होंगे?

    राजस्थान में ये देखने को मिला है कि जिस पार्टी को सत्ता मिली है, उसमें दलित और आदिवासी वोटरों का अहम योगदान रहा है. अब सबकी नजर है इसबार दलित और आदिवासी वोटर किस पार्टी की चुनावी नैय्या पार कराती है.

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    ‘रेवड़ी राजनीति’ की गिरफ्त में क्यों हैं वोटर, किस पार्टी का होगा बेड़ा पार?

    इस बार के विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में वोटरों को लुभाने के लिए घोषणाओं की बरसात हो गई है. सारी पार्टी की घोषणाओं का लब्बोलुआब है, किसान की कर्ज माफी, धान और गेहूं की खरीदारी की कीमत बढ़ाना, सस्ता सिलेंडर, मुफ्त बिजली, किसान सम्मान निधि बढ़ाने, मुफ्त राशन बढ़ाने का है.

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    MP-राजस्थान में किस जाति पर है ज़ोर, टिकट बंटवारे में क्यों पड़ी कमज़ोर...?

    दरअसल, BJP हिन्दुत्व की राजनीति के ज़रिये इक्का-दुक्का जातियों को छोड़कर कमोबेश सारी जातियों में पैठ बनाने में सफल हुई है. यही वजह रही है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में दो अंकों में सिमट गई है. कांग्रेस BJP की हिन्दुत्व की राजनीति के वर्चस्व को जाति की राजनीति के सहारे तोड़ना चाहती है...