Explained: वंदे मातरम को पंडित नेहरू ने बताया था कठिन, नेताजी को लिखे खत में मुस्लिमों वाला सवाल भी उठाया था
वंदे मातरम पर विवाद को लेकर पंडित नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को एक खत लिखा था. उनका कहना था कि इसकी भाषा कठिन है.
राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर अब प्रावधान है कि इसे पूरा गाना होगा. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कांग्रेस मुख्यालय में तिरंगा फहराया गया और पूरा वंदे मातरम भी हुआ. लेकिन इस बीच विवाद इस बात पर हो गया कि आखिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने वंदे मातरम को पूरा गाने से रोकने की कोशिश क्यों की. यह विवाद पुराना नहीं है. यदि वंदे मातरम 150 साल पुराना है तो उसे लेकर चल रहा विवाद भी उतने ही समय से चला आ रहा है. 150 साल पुराने वंदे मातरम को लेकर विवाद ने 1937 में भी जोर पकड़ा था. तब कांग्रेस ने इस पर विचार करने के लिए कमेटी बनाई थी. इस कमेटी में जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और आचार्य नरेंद्र देव शामिल थे.
इस समिति ने अंत में गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर से सलाह ली थी और उसके बाद तय हुआ था कि वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों को ही सार्वजनिक गायन के लिए रखा जाए. शेष 4 छंदों को हटा दिया जाए. अंत में यही तय हुआ और तब से वंदे मातरम के दो छंद ही गाए जाते रहे हैं. इस पर भी यदाकदा विवाद होता रहा है, लेकिन अब नया प्रावधान आने से एक बार फिर से इस पर बहस तेज है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने तो स्पष्ट तौर पर कहा है कि मैं इसका सम्मान करूंगा, लेकिन गाऊंगा नहीं. यह मेरे मजहबी यकीन के खिलाफ है. इस बीच देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू की राय भी उल्लेखनीय है. उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को एक खत लिखा था और वंदे मातरम के दो छंद ही बनाए रखने की बात कही थी.
उन्होंने 20 अक्टूर, 1937 को लिखे खत में कहा था, 'आपके सुझाव पर हमने डॉ. रवींद्रनाथ ठाकुर से सलाह का फैसला लिया है. मुझे नहीं लगता कि इस संबंध में हमें कोई औपचारिक बयान देने की जरूरत है, लेकिन हमारे मन में चीजें स्पष्ट रहनी चाहिए. मुझे आनंद मठ की अंग्रेजी प्रति मिली है. फिलहाल मैं इस गीत की पृष्ठभूमि का अध्ययन कर रहा हूं. ऐसा लगता है कि इसकी पृष्ठभूमि मुसलमानों को चुभ सकती है. इसके अलावा एक समस्या भाषा की भी है. यह काफी कठिन है और हर किसी को शायद समझ नहीं आएगी. मैं खुद बिना डिक्शनरी के इसे समझ नहीं सकता.'

वंदे मातरम पर लिखी गई सब्यसाची भट्टाचार्य की पुस्तक का कवर पेज
नेहरू ने तब वंदे मातरम पर विवाद उठाने वालों को सांप्रदायिक भी कहा था. उनका कहना था इस बात में कोई संदेह नहीं है कि फिलहाल वंदे मातरम पर हल्ला मचाने वाले लोग सांप्रदायिक तत्व हैं. इसमें कुछ ऐतराज वाजिब भी हो सकते हैं, लेकिन मजहबी कट्टर लोग इस विवाद को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं. हम इसमें सांप्रदायिक तत्वों के एंगल को नहीं लेते, लेकिन कुछ वास्तविक चिंताओं को समझना होगा. नेहरू ने इस लेटर को लिखे जाने के बाद रवींद्र नाथ ठाकुर से मुलाकात की थी. फिर उनकी सलाह पर 29 अक्तूबर, 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति में एक प्रस्ताव आया था. इसी में मंजूर किया गया था कि शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे.
वंदे मातरम के 4 पैरा हटाने पर रवींद्रनाथ ठाकुर ने दी थी क्या सलाह
अब सवाल है कि आखिर रवींद्रनाथ ठाकुर ने दो छंद ही लेने की सलाह देते हुए क्या कहा था. 'वंदे मातरम' पुस्तक के लेखक सब्यसाची भट्टाचार्य के मुताबिक रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा था, 'मेरी राय में वंदे मातरम की पूरी भावना और मातृभूमि के प्रति समर्पण का विचार शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाता है. इस हिस्से में मातृभूमि की विशेषताओं के बारे में बताया गया है और एक विशेष अपील की गई है. इसलिए वंदे मातरम के शेष हिस्से को हटाने में कोई बुराई नहीं है.' इस पर तरह रवींद्रनाथ ठाकुर की राय के बाद वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव आया था. इसी में तय हुआ कि वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे.

बंगदर्शन पत्रिका में छपा वंदे मातरम (फोटो: amritkaal.nic.in)
पहली बार 1875 में बंगदर्शन में छपा था वंदे मातरम
हालांकि विवाद इसके बाद भी नहीं थमा था. अकसर दक्षिणपंथी विचार के लोग वंदे मातरम पूरा गाए जाने का ही आग्रह करते थे. इसके अतिरिक्त अपने आयोजनों में वह इसे पूरा ही गाते थे. वंदे मातरम का पहली बार प्रकाशन एक बांग्ला पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर, 1875 को हुआ था. बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसके बाद गीत को अपने उपन्यास आनंद मठ में शामिल कर लिया था. वंदे मातरम का संगीत गुरुदेव कहलाने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर ने ही दिया था. उनका कहना था कि यह गीत भारत की सभ्यता, संस्कृति को स्पंदित करने वाला है.
पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने गाया था वंदे मातरम
राष्ट्रगान 'जन गण मन' लिखने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर का वंदे मातरम से भी गहरा जुड़ाव था. उन्होंने ही 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में इसे पहली बार गया था. तब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहीमतुल्ला सयानी थे. इसके बाद वंदे मातरम कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया जाता रहा. इसके अलावा क्रांतिकारी भी अकसर इसे दोहराते थे. अंत में भारत की स्वतंत्रता के बाद जन गण मन राष्ट्रगान बन गया तो वहीं वंदे मातरम को राष्ट्रगीत माना गया. इसका आदेश 24 जनवरी, 1950 को जारी हुआ था. वंदे मातरम की मूल रूप से संस्कृत और बांग्ला में बंकिम चंद्र चटर्जी ने रचना की थी.
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