राजधानी नई दिल्ली में सेंट्रल विस्टा को नया रूप देने का काम तेजी से चल रहा है. इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कई पुरानी इमारतें इतिहास के पन्नों में सिमट रही हैं. वो अब केवल यादों में रह जाएंगी. इन्हीं इमारतों में शास्त्री भवन भी शामिल है, जिसे तोड़ने का फैसला अंतिम रूप से हो चुका है. इस भवन में मौजूद विभिन्न विभागों को दूसरी इमारतों में शिफ्ट किया जा रहा है. विकास की इस दौड़ में पुरानी इमारतों, कलाकृतियों और स्मृतियों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती बन गया है.
कब बना था दिल्ली का शास्त्री भवन
शास्त्री भवन 1965 में बनकर तैयार हुआ था. उस समय इस सड़क का नाम क्वीन विक्टोरिया रोड था, जहां पहले सरकारी बंगले बने हुए थे. इन्हें तोड़कर इस भवन का निर्माण किया गया. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद रोड पर स्थित यह भवन लंबे समय तक केंद्र सरकार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा. यहां विधि और न्याय मंत्रालय, खेल और युवा मंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय जैसे कई अहम विभाग संचालित होते रहे. इनके अलावा करीब एक दर्जन कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप-मंत्री भी इसी भवन में अपने कार्यालय संचालित करते थे. शास्त्री भवन न केवल सरकारी कामकाज का केंद्र था, बल्कि यह दिल्ली की प्रशासनिक संस्कृति का भी प्रतीक बन गया था. अब इस भवन को तोड़कर यहां नई आधुनिक इमारत बनाने की योजना है, जो सेंट्रल विस्टा को वैश्विक स्तर पर भव्य बनाने का हिस्सा है.
सतीश गुजराल के बनाए भित्ति चित्रों का क्या होगा
शास्त्री भवन के निर्माण के बाद 1968 में प्रख्यात चित्रकार सतीश गुजराल ने यहां भित्तिचित्र (म्यूरल) बनाए थे. इन भित्ति चित्रों ने पूरे भवन को बेहद सुंदर और आकर्षक बना दिया. रंगों का सामंजस्य इतना अतुलनीय है कि कोई भी व्यक्ति इन्हें देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. हल्के-गहरे रंगों का मिश्रण, भारतीय संस्कृति की झलक और आधुनिक कला का सुंदर समन्वय इन चित्रों की खासियत है.

शास्त्री भवन के निर्माण के बाद 1968 में चित्रकार सतीश गुजराल ने यहां भित्तिचित्र (म्यूरल) बनाए थे. अब शास्त्री भवन को तोड़े जाने की खबरों के बीत इन कलाकृतियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
सतीश गुजराल इससे पहले 1962 में ओडियन सिनेमा और 1976 में दिल्ली हाई कोर्ट के लिए भी भित्तिचित्र बना चुके थे. उनके सभी कार्य बेहद जीवंत और अद्भुत हैं. लोग इन चित्रों को देखने के लिए रुक जाते हैं और घंटों निहारते रहते हैं.अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शास्त्री भवन के तोड़े जाने के दौरान इन अनमोल भित्तिचित्रों का क्या होगा? भित्ति चित्र दीवार पर बनाए गए स्थायी चित्र होते हैं. भित्ति चित्र बनाने की शुरुआत प्राचीन मानव ने की थी, जब वह गुफाओं की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से अपने जीवन के अनुभव चित्रित करता था. भारत की अजंता गुफाओं के भित्ति चित्र ईसा पूर्व की शताब्दियों के माने जाते हैं, जो विश्व प्रसिद्ध हैं.
सतीश गुजराल के बनाए ये भित्ति चित्र भी उसी परंपरा के आधुनिक रूप हैं. इतिहासकार डॉक्टर फिरोज बख्त अहमद कहते हैं कि सरकार को इनकी सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. इन्हें सावधानी से हटाकर किसी नए संग्रहालय या सांस्कृतिक केंद्र में स्थापित किया जा सकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन्हें देख सकें.
अब कहां जाएगी सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी
शास्त्री भवन में स्थित सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी (सीएसएल) इस भवन की एक और महत्वपूर्ण पहचान है. इसे केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय के नाम से भी जाना जाता है. यह लाइब्रेरी कूटनीति, इतिहास, धर्म, समाजशास्त्र, सिनेमा, खेल, अर्थशास्त्र, साहित्य और कई अन्य विषयों पर हजारों दुर्लभ और मूल्यवान पुस्तकों का भंडार है. यह लाइब्रेरी मूल रूप से कोलकाता की इंपीरियल लाइब्रेरी का हिस्सा थी. साल 1912 में दिल्ली को राजधानी बनाए जाने के बाद इसे यहां स्थानांतरित किया गया. शुरू में यह पुराने सचिवालय से चालू हुई, फिर शिमला सचिवालय में शिफ्ट हुई. 10 फरवरी 1931 को नॉर्थ ब्लॉक में शुरू हुई और एक अप्रैल 1948 को इसका नाम सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी रखा गया. साल 1969 से यह शास्त्री भवन के सी-विंग में संचालित हो रही है.
शोधकर्ता,सरकारी अधिकारी, पत्रकार और ज्ञान प्रेमी यहां नियमित रूप से आते हैं. राजधानी के केंद्र में होने के कारण इसकी पहुंच आसान रही है. अब चिंता यह है कि लाइब्रेरी को कहीं दूर-दराज इलाके में न शिफ्ट कर दिया जाए, जिससे इसकी उपयोगिता और पहुंच दोनों प्रभावित हो सकती है. इसे केंद्र में ही बनाए रखने की मांग जोरों पर है.
शास्त्री भवन में बंदर और इंसान का सह-अस्तित्व
शास्त्री भवन जाते समय सबसे दिलचस्प और अनोखा अनुभव दर्जनों बंदरों का है. लाइब्रेरी के आसपास और पूरे परिसर में बंदरों की अच्छी-खासी संख्या है. पहली बार आने वाले लोग इन बंदरों को देखकर भयभीत हो जाते हैं, लेकिन यहां मनुष्य और जानवर लंबे समय से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहते आए हैं.
हजारों सरकारी कर्मचारी और सैकड़ों बंदर बिना एक-दूसरे को परेशान किए अपना काम करते हैं. लंच के समय का माहौल देखने लायक होता है. कर्मचारी छोटे-छोटे समूहों में भोजन करते हैं और उनके आसपास बंदर शांतिपूर्वक बैठे रहते हैं. वे इशारों से भोजन मांगते हैं और कर्मचारी अक्सर कुछ न कुछ शेयर कर देते हैं. कभी-कभी मंत्री या उच्च अधिकारी के कक्ष में खाने-पीने की सामग्री रखी हो तो शीशे के बाहर से खटखटाने की आवाज आने लगती है. शुरू में अनदेखा करने के बाद आवाजें तेज होती जाती हैं. बंदर भोजन या फल की मांग कर रहे होते हैं. यह दृश्य हल्का-फुल्का, यादगार और दिल्ली की खास पहचान बन गया है.
बंदर कहां जाएंगे
ये बंदर शास्त्री भवन के आसपास घूमना बहुत पसंद करते हैं. वे कभी आक्रामक नहीं होते. दिन में भोजन के बाद कई बंदर इंडिया गेट की ओर चले जाते हैं, जहां जामुन के पेड़ हैं. वहां से मुंह मीठा करके वो शाम तक वापस लौट आते हैं. शनिवार और रविवार को तो इनके लिए विशेष दावत होती है. बाहर से लोग विभिन्न प्रकार के फल लेकर आते हैं और इन्हें खिलाते हैं.
शास्त्री भवन के तोड़े जाने के बाद इन बंदरों को नया आशियाना कहां मिलेगा, यह एक गंभीर मुद्दा है. वन्यजीव प्रेमी और स्थानीय लोग इनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. इन्हें किसी सुरक्षित वन क्षेत्र, पार्क या उपयुक्त जगह पर मानवीय तरीके से स्थानांतरित करने की योजना बनाई जानी चाहिए.
विकास और विरासत में संतुलन कितना जरूरी है
सेंट्रल विस्टा परियोजना भारत की राजधानी को आधुनिक, भव्य और विश्व स्तरीय बनाने का एक बड़ा प्रयास है. नई इमारतें, बेहतर सुविधाएं और आधुनिक ढांचा निश्चित रूप से देश की छवि को निखारेगा. लेकिन विकास की इस प्रक्रिया में पुरानी इमारतों, कलाकृतियों, पुस्तकालय और स्थानीय पारिस्थितिकी का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है. शास्त्री भवन की स्मृतियां, सतीश गुजराल के भित्तिचित्र, सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी का खजाना और बंदरों वाला अनोखा सह-अस्तित्व, ये सब मिलकर इस भवन को अनमोल बनाते हैं. उम्मीद है कि सरकार विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाएगी. लाइब्रेरी को राजधानी के केंद्र में ही रखा जाए, भित्तिचित्रों को उचित स्थान पर संरक्षित किया जाए और बंदरों को सुरक्षित नए घर पहुंचाया जाए. यह परिवर्तन केवल इमारतों का नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और स्मृतियों का भी है. नया सेंट्रल विस्टा पुरानी यादों को संजोए हुए आगे बढ़े, यही हमारी कामना है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)