जेन जी आंदोलन के बाद पांच मार्च को होने जा रहे प्रतिनिधि सभा के मध्यावधि चुनाव के लिए नेपाल पूरी तरह तैयार है. दो मार्च की मध्यरात्रि से 'मौन अवधि' शुरू हो चुकी है. इसके साथ ही चुनाव प्रचार पूरी तरह बंद हो गया था. कई पार्टियों ने चुनावी तैयारी को लेकर सरकार की आलोचना भी की है. चुनाव में सेना की तैनाती पर पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' ने सवाल उठाए हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि माओवादी जनांदोलन के समय से ही सेना के साथ प्रचंड के संबंध मधुर नहीं रहे हैं. लेकिन सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार का जोर इस बात पर है कि चुनाव समय पर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष हों. उन्होंने चुनावी तैयारियों का जायजा लेने और लोगों के बीच विश्वास बहाली के लिए देश के कई दुर्गम इलाकों का दौरा भी किया है.
आंकड़ों में नेपाल का चुनाव
चुनाव आयोग के मुताबिक 10967 पोलिंग स्टेशनों पर 23112 पोलिंग सेंटर बनाए गए हैं. इनमें से 3680 पोलिंग बूथों को अति संवेदनशील और 4442 को संवेदनशील बूथ माना गया है. इसलिए इस चुनाव में सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है. इसे ध्यान में रखते हुए शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सेना, पुलिस और सिजनल चुनावी पुलिस के तीन लाख 39 हजार जवानों को तैनात किया गया है. चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव में 2022 के चुनावों की तुलना में 22 नए राजनीतिक दलों ने पंजीकरण कराया है. चुनाव के लिए पंजीकृत 121 राजनीतिक दलों में से 68 ने अपने-अपने प्रत्याशी चुनाव में उतारे हैं. वहीं 63 ने समानुपातिक प्रणाली के लिए भी उम्मीदवारों की सूची चुनाव आयोग को सौंपी है. ये चुनाव 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा के लिए हो रहे हैं. इसमें 165 प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली और शेष 110 समानुपातिक पद्धति से चुने जाएंगे. तीन करोड़ की जनसंख्या वाले नेपाल में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या करीब 1.89 करोड़ है. इनमें से करीब 10 लाख नए मतदाता हैं. नेपाल के मतदाता 3400 से अधिक उम्मीदवारों में से अपना जनप्रतिनिधि चुनेंगे.
जेन जी आंदोलन के बाद होने वाले इस चुनाव में नए और युवा मतदाताओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई है. यह चुनाव युवा आंदोलन के कारण उपजी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में हो रहा है. पिछले साल सितंबर में युवाओं ने ओली सरकार को एक बड़े और हिंसक आंदोलन से अपदस्थ कर दिया था. इस चुनाव से नेपाल को एक स्थिर और पारदर्शी सरकार मिलने की उम्मीद है. उम्मीद की जा रही है कि नई सरकार युवाओं और आम नेपालियों की समस्याओं को हल करने की दिशा में कदम उठाएगी. नेपाल में भ्रष्टाचार के साथ ही बेरोजगारी भी बड़ी समस्या है. विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार नेपाल में बेरोजगारी दर 20.6 फीसदी है. नेपाल की कुल जीडीपी का करीब एक तिहाई हिस्सा रेमिटेंस (दूसरे देशों में रह रहे नेपालियों की ओर से भेजा गया पैसा) से आता है. जेन जी आंदोलन के बाद से वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी 40 फीसदी की गिरावट आई है. ऐसे में नेपाल को एक स्थिर सरकार की जरूरत है, जो राजनीतिक स्थिरता के साथ ही निवेश के लिए जरूरी माहौल भी बनाए. इससे रोजगार का सृजन हो सके और बेरोजगारी दर कम की जा सके.

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देश के चारों प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में बेरोजगारी कम करने के बड़े-बड़े वादे किए हैं, लेकिन निवेश और धन कहां से और कैसे आएगा, उसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं बताया है.इससे यह संभावना बन सकती है कि जैसे पिछले चुनावों के घोषणापत्रों के लोकलुभावना वादे कागज के पुर्जे बनकर रह गए, सत्ता प्राप्ति के बाद वैसा ही इस बार के वादों के साथ न हो जाए.
पुराने और नए नेताओं की जंग
नेपाल के इस चुनाव में पहली बात स्पष्ट होती दिख रही है कि पुराने नेता फिर से मजबूत हो रहे हैं.जेन जी का आंदोलन न सिर्फ भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ बल्कि नेपाल के तीन पुराने नेताओं के खिलाफ भी था, जो लंबे समय से आपस में बारी-बारी से सत्ता की अदला-बदली करते रहे हैं. इस आंदोलन ने केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' और शेर बहादुर देउबा की छवि को नुकसान पहुंचाने के साथ ही उनकी राजनीतिक शक्ति को भी कुछ हद तक कमजोर किया है. यह अनुमान था कि आने वाले समय में नेपाल की राजनीति में इन नेताओं का राजनीतिक कद कम हो सकता है. जबकि होता इससे उलट प्रतीत हो रहा है. ओली और प्रचंड ने अपनी स्थिति को कुछ हद तक मजबूत ही किया है. नेकपा एमाले के विशेष अधिवेशन में केपी शर्मा ओली बिना किसी गंभीर प्रतिस्पर्धा के फिर से पार्टी के अध्यक्ष चुने गए हैं. वही प्रचंड ने अपनी पार्टी माओवादी सेंटर को 11 अन्य वामपंथी पार्टियों के साथ विलय कर नए कलेवर में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) बनाई है. उम्मीद थी कि इन पुराने राजनीतिक दलों में जेन जी आंदोलन के कारण युवाओं को बड़ी भूमिकाएं मिल सकती हैं, लेकिन ऐसा होता हुआ दिख नहीं रहा है. युवा पार्टी की सिर्फ यूथ विंग तक सीमित रह गए हैं. इन पार्टियों की कार्यकारणी में युवाओं का प्रतिनिधित्व भी बहुत ही कम है.

नेपाल के इस चुनाव को नए बनाम पुराने नेताओं के बीच जंग के रूप में भी देखा जा रहा है.
नेपाली कांग्रेस की कहानी इससे थोड़ी उलट है. यह पार्टी लगभग विभाजन के कगार पर है. तत्कालीन अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को 50 साल के गगन थापा से चुनौती मिली और नेपाली कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में थापा पार्टी के अध्यक्ष चुने गए. लेकिन देउबा सहित नेपाली कांग्रेस के कई पुराने नेताओं ने गगन थापा को अभी तक अपना नेता स्वीकार नहीं किया है. ये सभी तथ्य दिखाते हैं कि जेन जी आंदोलन के बाद भी नेपाल की परंपरागत पार्टियां युवाओं को जगह देने में हिचकिचाहट महसूस कर रही हैं.
कितनी बड़ी है झापा-पांच की लड़ाई
दूसरी बात गौर करने लायक है कि भले ही युवाओं ने बदलाव के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया था और भले ही नेपाल को युवाओं का देश माना जाता हो, लेकिन करीब सभी पार्टियों ने युवाओं को टिकट देने में कोताही बरती है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कुल उम्मीदवारों में से केवल 15 फीसदी ही 35 साल से कम आयु के हैं. यह दिखाता है कि इतने बड़े युवा आंदोलन के बावजूद नेपाल में पुराने नेताओं का अभी भी बोलबाला है. वे युवाओं को राजनीति में उनका स्थान देने की इच्छुक नहीं है. उम्मीदवारों में युवाओं के साथ-साथ महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व कम है. जबकि इस आंदोलन में महिलाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार उम्मीदवारों में केवल 11 फीसदी ही महिला हैं. यह दिखाता है कि समावेशिता के संवैधानिक वादे के बावजूद भी नेपाल की राजनीति में महिलाओं को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है. तीसरी महत्वपूर्ण बात इस चुनाव में यह दिख रही है कि केपी शर्मा ओली को झापा-5 में काठमांडू के पूर्व मेयर और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बालेन शाह से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है. झापा को ओली का पुराना गढ़ माना जाता है, जहां से वे छह बार सांसद रहे हैं, जबकि बालेन के लिए यह पहला संसदीय चुनाव है. शाह युवाओं में लोकप्रिय हैं. बालेन की भ्रष्टाचार विरोधी छवि और युवाओं में लोकप्रियता ही उनकी ताकत है. नेपाल के इस चुनाव में हर तरफ 'अबकी बार बालेन सरकार' के नारे सुनाई दे रहे हैं.
झापा की भौगोलिक स्थिति भी उसे काफी महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह भारत-बांग्लादेश के बीच स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक के नाम से भी जाना जाता है, के काफी करीब है. यहां के दमक शहर में चीन ने भारी निवेश किया है. ओली को चीन के प्रति सहानुभूति रखने वाला नेता माना जाता है, जबकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का रुझान उदारवादी खुली अर्थव्यवस्था की तरफ है. इससे लग रहा है कि उसका नीतिगत झुकाव पश्चिमी मूल्यों और भारत के प्रति ज्यादा सकारात्मक हो सकता है, इसलिए झापा-5 का चुनाव परिणाम रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है.

राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बालेंद्र शाह और पार्टी के प्रमुख रवि लामिछाने भक्तपुर में चुनाव प्रचार करते हुए.
पुरानी पार्टियां बनाम नई पार्टियां
चुनाव आयोग के अनुसार जिन 22 नई पार्टियों ने पंजीकरण कराया है उनमें से दो ने विशेष रूप से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है.इनमें से एक है धरान के मेयर हर्क सम्पांग की राष्ट्रीय श्रम संस्कृति पार्टी और दूसरी कुलमान घीसिंग की उजियालो नेपाल पार्टी. कुलमान अंतरिम सरकार में मंत्री भी रहे हैं. उन्हें नेपाल को लोड शेडिंग की समस्या से निजात दिलाने का श्रेय दिया जाता है. इन दोनों पार्टियों को जातीय आधार पर उभरती पार्टियों के तौर पर देखा जा रहा है, यद्यपि उनका दावा है कि वे अखिल नेपाल प्रकृति की पार्टी हैं, लेकिन लोगों की नजर में जहां सम्पांग राई समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं,वहीं तमांग समुदाय का कुलमान घीसिंग. नेपाल में पहली बार जाति आधारित पार्टियों का उभार देखने को मिल रहा है, जबकि इनका भविष्य इन चुनावों में प्राप्त सफलता पर निर्भर करेगा.
चार साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, जो युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है, बालेन शाह के नेतृत्व में निरंतर अपना जनाधार बढ़ा रही है. पुरानी परंपरागत पार्टियों का एक मजबूत जनाधार है, उनका स्थानीय ढांचा मजबूत भी है, जैसे नेकपा एमाले उच्च जातियों और रूढ़िवादी वोटरों के मध्य लोकप्रिय है, वहीं प्रचंड के नेतृत्व वाली नेकपा के साथ जन आंदोलन की विरासत जुड़ी हुई है. नेपाली कांग्रेस देश की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी है. उसका जनाधार लगभग पूरे देश में है. राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के दोनों गुट भी आपस मिलकर चुनाव मैदान में हैं. इस पार्टी का जनाधार राणाओं (क्षेत्री) और पहाड़ी रूढ़िवादी लोगों के बीच मजबूत है. इन चारों परंपरागत पार्टियों का स्थानीय ढांचा मजबूत भी है, जबकि इसके उलट राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का स्थानीय ढांचा या तो कमजोर है या कई जिलों में लगभग अनुपस्थित है. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के साथ एक नकारात्मक पक्ष यह भी जुड़ा है कि उसे तराई-मधेश के इलाके में संघवाद विरोधी पार्टी के तौर पर देखा जाता है. आरएसपी ने 2022 के प्रांतीय चुनाव का यह कहते हुए बहिष्कार किया था कि संघीय व्यवस्था नेपाल के लिए ठीक नहीं है, इसे खत्म करने की जरूरत है. उसका यह रुख तराई और मधेश में उसके चुनाव परिणामों पर असर डाल सकता है. मधेश नेपाल का सबसे बड़ा प्रान्त है. यहां से कुल 32 सदस्य प्रतिनिधि सभा के लिए चुने जाते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए ही बालेन शाह ने अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत जनकपुर से की थी, जो कि मधेश प्रदेश की राजधानी है. पिछले चुनावों के उलट इस चुनाव में मधेश पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. नेपाली कांग्रेस के गगन थापा मधेश के रूपनदेही-3 से चुनाव लड़ रहे हैं. इससे मधेश नेपाल की राजनीति के केंद्र में आ गया है.

नेपाल में नई बनने वाली सरकार पर लोगों की उम्मीदों का भारी बोझ होगा.
इस चुनाव में नेपाल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. नेपाल को एक स्थिर और पारदर्शी सरकार की जरूरत है, जो उन समस्याओं से निजात दिलाए जिनका आज वह सामना कर रहा है. बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पलायन, जीडीपी की रेमिटेंस पर भारी निर्भरता आदि ऐसे मुद्दे हैं, जिनका हल ढूंढना आने वाली सरकार को ढूंढना होगा. नेपाल की करीब सभी पार्टियों ने संतुलित विदेश नीति का वादा किया है. इस चुनाव पर भारत और चीन सहित पश्चिमी देशों की भी नजरे हैं. ऐसी स्थिति में नेपाल में चाहे जिस पार्टी की सरकार बने उसे तीन शक्तियों भारत, चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाना होगा.
डिस्क्लेमर: मोहन कुमार मिश्र बीएचयू वाराणसी के राजनीति विज्ञान विभाग में शोध छात्र है और डॉक्टर श्रुति दुबे बीएचयू के राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.