निठारी कांड का नरभक्षी कौन? : एक रिपोर्टर की नजर से यह जघन्‍य वारदात 

यह अपराध इतना जघन्य, भयानक और दर्दनाक था कि पूरा समाज हिला गया. आखिर कोई कैसे इतनी संख्या में बच्चों के साथ दुष्कर्म करके हत्या कर सकता है और उन्हें वहीं दफना सकता है. इसे लेकर समाज में गुस्सा था और आज भी है. 

निठारी कांड का नरभक्षी कौन? : एक रिपोर्टर की नजर से यह जघन्‍य वारदात 

निठारी कांड. स्‍मृतियों में ये नाम करीब 18 साल पहले अंकित हुआ था. आज भी जिक्र होता है तो शवों के मिलने के सिलसिले से एक लंबी कानूनी प्रक्रिया तक बहुत कुछ याद आता है. यह मामला मेरी तरह बहुत से लोगों के दिलों में छिपी एक टीस की तरह जमा है और आज भी पूरी दुनिया में सुर्खियों में है. इस कांड के दोषियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है. उनका नाम है सुरेंद्र कोली और उसका मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर. यह बात अक्टूबर 2005 की है, जब मैंने एनडीटीवी ज्वाइन किया था. उसके करीब एक साल बाद यानि अक्टूबर 2006 में या उससे पहले नोएडा के सेक्टर 31 से ऐसी खबरें लगातार आ रही थीं कि वहां से कुछ गरीब परिवारों के बच्चे लगातार गायब हो रहे हैं और पुलिस उन बच्चों को ढूंढ़ नहीं पा रही है. उसके बाद एक केस आया कि पायल नाम की एक लड़की नोएडा के सेक्टर 31 की गायब हो गई है. उस लड़की की तलाश करती पुलिस को उसके मोबाइल की जानकारी मिली. पायल का मोबाइल पुलिस को एक रिक्शे वाले के पास मिला. रिक्शे वाले ने पुलिस को बताया कि उसे यह मोबाइल सेक्टर 31 की डी-5 कोठी के एक शख्स ने दिया है. पुलिस रिक्शवाले को लेकर वहां पहुंची. सुरेंद्र कोली को पकड़ा. उससे पूछताछ हुई और फिर खुलासा हुआ देश और दुनिया को चौंका देने वाले निठारी कांड का. 

आसपास रहने वाले गरीब परिवारों का आरोप था कि उनके बच्चे गायब हैं. हो सकता है कि उनके बच्चों की भी सुरेंद्र कोली ने ही हत्‍या की हो. उसके बाद  पुलिस ने जांच शुरू की, कोठी की नाकेबंदी हुई. मुझे एक सूत्र से फोन आया. हम भी मौके पर उसी डी 5 कोठी पहुंचे. इतना गुस्सा था कि वहां पहुंची पुलिस टीम पर लोगों ने पथराव कर दिया. कई बार पथराव हुआ. पुलिस के रवैये को लेकर लोगों में बेहद गुस्सा था. पुलिस ने कोठी और आसपास खुदाई की. बगल के नाले की भी खुदाई हुई और फिर शुरू हुआ एक के बाद एक शवों के अवशेष मिलने का सिलसिला. इसके बाद यह मामला सुर्खियां पकड़ता गया. उस वक्त यूपी में सपा की सरकार थी. सरकार की कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े होने लगे. लोग लगातार विरोध प्रदर्शन करने लगे. जिन्होंने अपने बच्चे खोए थे, उन्हें यह तक नहीं पता था कि उनका बच्चा इसी कोठी में है, मारा गया है या कहीं चला गया है. हालांकि एक के बाद एक बच्‍चे के शवों के अवशेष मिल रहे थे. कुछ के शव कोठी के बाथरूम में मिले, जिसमें कुछ कटे हुए मांस के लोथड़े थे तो कुछ हड्डियां भी बरामद हुई. 

पुलिस के मुताबिक सुरेंद्र कोली ने पूछताछ में कबूला है कि उसने बच्चों की हत्याएं की हैं. उनके साथ दुष्कर्म किया है. फिर उन्हें कोठी और आसपास दफना दिया. उसने एक और खुलासा किया था कि उसने कुछ बच्चों का मांस भी खाया है. इसके बाद जांच के लिए यूपी सरकार ने एक कमेटी गठित की. कमेटी ने जांच में पाया कि बच्चों को खोजने के लिए नोएडा पुलिस ने लापरवाही की है. अगर वह ठीक से जांच करती तो इस मामले का पहले ही खुलासा हो जाता. उस कमेटी की सिफारिश पर नोएडा पुलिस के तीन सीनियर अफसर समेत कई पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए थे. कई राजनीतिक लोग कोठी पर पहुंचे. सोनिया गांधी भी वहां गई थीं. साथ ही इस मामले में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला भी जारी रहा.

इसके बाद नोएडा पुलिस ने सुरेंद्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर को गिरफ्तार कर लिया. उनसे लगातार पूछताछ हुई, लेकिन पीड़ित परिवार ये मांग कर रहे थे कि मामले की जांच सीबीआई करे, क्योंकि नोएडा पुलिस ने पहले ही बहुत लापरवाही की है और उन्हें नहीं लगता कि नोएडा पुलिस उन्हें इंसाफ दिला पाएगी. इसके बाद सीबीआई की एक विशेष टीम का गठन किया गया और सीबीआई ने जांच शुरू की. 

सीबीआई के बहुत सारे अफसर कई गाड़ियों को लेकर नोएडा के कोठी पर पहुंचे. उनके साथ फोरेंसिक एक्सपर्ट भी थे. पूरी कोठी की मैपिंग हुई. फोरेंसिक जांच हुई, कोठी का फर्श खोदा गया, दीवार तोड़ी गई, पीछे नाले को खोदा गया.

बहुत सारे कंकाल सीबीआई और नोएडा पुलिस को मिले. सुरेंद्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर पर 31 बच्चों की हत्या का आरोप था, लेकिन जांच में साफ हुआ कि 19 बच्चों की हत्या हुई है, जिसमें करीब 10 लड़कियां थीं. सुरेंद्र कोली ने पूछताछ में कहा कि वह बच्चों को चॉकलेट या पैसे का लालच देकर अपनी कोठी में बुलाता था. हत्या के बाद उनके साथ दुष्कर्म करता था. फिर उनके शवों को कोठी के अंदर या आसपास दफना देता था. अधिकतर शवों के कंकाल कोठी के पीछे नाले में मिले थे. सीबीआई ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया. सुरेंद्र कोली और पंढेर का नार्को टेस्ट करवाया. इसके बाद ब्रेन मैपिंग टेस्ट हुए. दोनों की मोबाइल लोकेशन चेक की गई. लोकेशन की प्रोफाइलिंग हुई. कॉल डिटेल और मैसेज डिटेल निकाली गई. सीबीआई ने जांच के बाद कहा कि सुरेंद्र कोली एक साइकोपैथ है यानी एक मनोरोगी. जांच के दौरान सीबीआई ने यह भी कहा कि सुरेंद्र कोली ने यह माना है कि उसने बच्‍चों की हत्या के बाद, उनके मांस को खाया है. इसके बाद सीबीआई ने गवाहों से पूछताछ की. नोएडा पुलिस की जांच टीम में रहने वाले अधिकारियों से पूछताछ की. पीड़ित परिवारों के बयान दर्ज किए गए. जांच का लंबा सिलसिला चला. 

सीबीआई ने इस मामले में 16 केस दर्ज किए थे. फिर यह मामला गाजियाबाद की विशेष सीबीआई कोर्ट में पहुंचा. जहां इस मामले की डे टू डे सुनवाई हुई. एक फास्टट्रैक कोर्ट बनाकर इस मामले की सुनवाई की गई. मैं भी सुनवाई के दौरान कई बार गया. एक बार तो ऐसा हुआ कि वहां मौजूद लोगों और वकीलों ने गुस्से में दोनों आरोपियों की कोर्ट में पेशी के दौरान ही जमकर पिटाई कर दी. इसके बाद पुलिस उन्हें वहां से निकालकर ले गई. 

यह अपराध इतना जघन्य, भयानक और दर्दनाक था कि पूरा समाज हिला गया. आखिर कोई कैसे इतनी संख्या में बच्चों के साथ दुष्कर्म करके हत्या कर सकता है और उन्हें वहीं दफना सकता है. इसे लेकर समाज में गुस्सा था और आज भी है. 

2017 तक इस मामले की सुनवाई गाजियाबाद कोर्ट में चली. कोर्ट ने 12 से 13 मामलों में सुरेंद्र कोली को दोषी मानते हुए पहले उम्रकैद और फिर फांसी की सजा सुनाई. वहीं, पंढेर को 2 मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई. इसके बाद दोनों ही सजा के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए और हाईकोर्ट ने उन्‍हें मामलों से बरी कर दिया. 

यह फैसला बहुत ही हैरान करने वाला है. खासतौर से पीड़ित परिवारों के लिए. पीड़ित परिवार पिछले 18 सालों से इंसाफ की मांग कर रहे हैं, इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे हैं. रोजाना कोर्ट जा रहे हैं. आखिर सीबीआई की जांच में खामियां कहां रहीं. किस आधार पर कोर्ट ने दोषियों को बरी कर दिया, जिन्हें गाजियाबाद की सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी. अब निश्चित तौर पर सीबीआई इस मामले पर कानूनी सलाह लेगी और हो सकता है कि कुछ दिनों में इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाए. हालांकि पीड़ित परिवार बेहद गरीब हैं. वो अब भी नोएडा के सेक्टर 31 में रहते हैं, उस कोठी के पास. जब भी कोठी के पास से निकलते हैं उन्हें पुराना मंजर याद आता है. उनके लिए यह फैसला हिला देने वाला है, चौंकाने वाला है. केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि समाज के हर तबके के लिए, जिसने इस जघन्य अपराध के बारे में सुना और जाना है. मैंने यह केस कवर किया था. एक पत्रकार के तौर पर उस वक्त मन में बहुत गुस्सा था. आखिर बच्चों की हत्या करना, उसको इस तरह से मारकर दफनाना. शायद ही पहले दुनिया में ऐसा कोई क्राइम समाने आया हो. हालांकि अब हाइकोर्ट का फैसला आ गया है.

मुकेश सिंह सेंगर NDTV इंडिया में एसोसिएट एडिटर (क्राइम एंड इंवेस्टिगेशन) हैं...

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.