डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा को यदि केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का विदेश दौरा माना जाए, तो उसके बड़े अर्थ को समझना कठिन होगा. यह यात्रा संघ के शताब्दी वर्ष में उस सांस्कृतिक चेतना का स्वाभाविक विस्तार है, जिसने एक शताब्दी तक भारत में व्यक्ति-निर्माण, समाज-संगठन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य किया है. आज वही चेतना विश्व के उन देशों तक संवाद का हाथ बढ़ा रही है, जहां भारतीय मूल के लाखों लोग अपनी मेहनत, प्रतिभा और संस्कारों के बल पर सम्मानजनक स्थान बना चुके हैं.
दुनिया के सामने 'वसुधैव कुटुम्बकम्'
अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में डॉ. भागवत की उपस्थिति किसी राजनीतिक अभियान का स्वरूप नहीं रखती. इसका मूल भाव है भारत, हिंदू समाज और संघ को लेकर बनी धारणाओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद; 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भारतीय दृष्टि को समकालीन विश्व के समक्ष रखना; और हिंदू समाज को यह विश्वास दिलाना कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ खड़े रहना आधुनिकता अथवा लोकतांत्रिक नागरिकता के विरुद्ध नहीं है. संघ की दृष्टि में भारतीयता का अर्थ किसी के प्रति वैमनस्य नहीं, बल्कि स्वयं को जानकर दुनिया से अधिक आत्मविश्वास और आत्मीयता के साथ जुड़ना है.
यह संयोग नहीं कि इस यात्रा का समय संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़ा है. सौ साल पूरे करना किसी संगठन के लिए केवल उत्सव का क्षण नहीं होता; वह आत्ममंथन का भी अवसर होता है. संघ अपने इस शताब्दी-वर्ष को समाज में 'अपनत्व' बढ़ाने का वर्ष मानता है. व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोड़ने का भाव यही संघ की भाषा में संगठन और सेवा का आधार है. डॉ. भागवत की यात्रा उस भावना को भारत की सीमाओं से बाहर, प्रवासी हिंदू समाज और पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजों तक पहुंचाने का प्रयास है.
संघ का विदेशों में संवाद नया नहीं है. भारतीयों के विदेश जाने के साथ ही सांस्कृतिक जुड़ाव की आवश्यकता भी पैदा हुई. 1946 में केन्या जा रहे एक जहाज पर शाखा लगने का उल्लेख संघ की प्रवासी-यात्रा के आरंभिक प्रतीक के रूप में किया जाता है. 1947 में नैरोबी में भारतीय स्वयंसेवक संघ की औपचारिक स्थापना हुई. बाद के दशकों में ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से यह कार्य विकसित हुआ. इन संस्थाओं ने स्थानीय कानूनों और नागरिक संरचना के भीतर रहकर बच्चों के संस्कार-वर्ग, युवाओं के प्रशिक्षण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेवा-कार्यों और समुदाय-संपर्क की परंपरा विकसित की.

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सरसंघचालकों की विदेश यात्रा
सरसंघचालकों के विदेश संवाद भी समय-समय पर होते रहे हैं. रज्जू भैया ने 1997 में केन्या और 1998 में जापान की यात्रा की. डॉ. भागवत 2016 में ब्रिटेन और यूरोप के हिंदू समाज से संवाद कर चुके हैं. 2018 में शिकागो में विश्व हिंदू कांग्रेस के मंच से उन्होंने हिंदू समाज की एकता और विश्व कल्याण की भारतीय दृष्टि पर बात की थी. सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की हाल की ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी यात्राएं भी यह संकेत देती हैं कि संघ अब विदेशों में केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, चिंतकों, नीति-विमर्श और व्यापक नागरिक समाज से बातचीत को भी महत्व दे रहा है. वर्तमान त्रिदेशीय यात्रा इसी क्रम का अधिक व्यापक और शताब्दी-वर्षीय रूप है.
फिर भी, पश्चिम में हिंदू समाज के सामने प्रश्न आसान नहीं हैं. अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में भारतीय मूल के लोगों की आर्थिक सफलता स्पष्ट दिखाई देती है. वे डॉक्टर हैं, वैज्ञानिक हैं, उद्यमी हैं, अध्यापक हैं, सांसद हैं और स्थानीय प्रशासन का हिस्सा हैं. मंदिरों की संख्या बढ़ी है, दीपावली को सार्वजनिक मान्यता मिल रही है, योग और भारतीय दर्शन को विश्वभर में स्वीकार्यता मिली है. पर सफलता के पीछे एक गहरी चिंता भी है- दूसरी और तीसरी पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कितनी गहराई से समझती है?
विदेशों में बसे भारतीय और भारतीयता
कई परिवारों में भारतीयता पर्वों, भोजन और पारिवारिक अवसरों तक सीमित होकर रह जाती है. बच्चों को रामायण, महाभारत, उपनिषद, विवेकानंद या भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव का परिचय सहज रूप में नहीं मिलता. वे आधुनिक पश्चिमी जीवन में पूरी तरह घुले-मिले हैं, जो स्वाभाविक और आवश्यक है; किंतु अपनी सभ्यतागत स्मृति से दूरी उन्हें सांस्कृतिक असमंजस में भी डाल सकती है. हिंदू होना उनके लिए केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक बहुलतावादी और करुणामय दृष्टि बने यह चुनौती है.
दूसरा प्रश्न प्रतिनिधित्व और विमर्श का है. हिंदू समाज अपनी संख्या और उपलब्धियों के अनुपात में पश्चिमी मीडिया, अकादमिक संस्थानों, नीति-निर्माण और सांस्कृतिक बहसों में अक्सर कमजोर ढंग से उपस्थित है. फलतः हिंदू परंपराओं या भारत की राजनीति के बारे में ऐसे निष्कर्ष प्रचारित हो जाते हैं, जिनमें अनुभव की जगह पूर्वाग्रह अधिक होता है. हिंदू शब्द को कई बार एक जटिल सभ्यता के बजाय महज राजनीतिक विशेषण में बदल दिया जाता है. भारत और संघ के बारे में भी पश्चिमी सार्वजनिक विमर्श में एकतरफा चित्र प्रस्तुत किए जाते हैं. संघ की यात्रा का एक उद्देश्य इसी दूरी को कम करना है: आक्रोश से नहीं, तथ्य और संवाद से.
जिम्मेदार समाज के निर्माण का लक्ष्य
तीसरी चुनौती सुरक्षा और सामाजिक सम्मान की है. ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़, सार्वजनिक स्थलों पर अपमान, ऑनलाइन घृणा और धार्मिक पहचान के कारण असहजता की घटनाएं सामने आती रही हैं. कनाडा में खालिस्तान समर्थक समूहों से जुड़े तनावों ने अनेक हिंदू और भारतीय समुदायों में चिंता बढ़ाई है. ऐसी स्थितियों में हिंदू समाज को अपनी बात दृढ़ता से रखने, विधि-सम्मत ढंग से संगठित होने और स्थानीय प्रशासन व नागरिक संस्थाओं के साथ सक्रिय संवाद करने की जरूरत है. यह किसी समुदाय के विरुद्ध खड़े होने का प्रश्न नहीं, बल्कि भयमुक्त नागरिक जीवन और कानून के निष्पक्ष शासन का प्रश्न है.
संघ इन चुनौतियों को केवल शिकायत की दृष्टि से नहीं देखता. उसके लिए उत्तर संगठन है, पर ऐसा संगठन जो व्यक्ति को बेहतर नागरिक बनाए. शाखा की मूल कल्पना ही चरित्र, अनुशासन, सेवा और सामाजिक बंधुत्व की है. विदेश में इसका अर्थ स्थानीय समाज से कटना नहीं, बल्कि उसमें अधिक जिम्मेदारी से भाग लेना है. युवा हिंदुओं को केवल अपनी पहचान की रक्षा करना नहीं, बल्कि जिस देश में वे रहते हैं, उसके सार्वजनिक जीवन में योगदान करना भी सीखना होगा. सेवा-कार्य, पड़ोस के साथ संबंध, अंतरधार्मिक संवाद, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सक्रियता, पेशेवर संस्थाओं में भागीदारी, ये सब सांस्कृतिक आत्मविश्वास के स्वस्थ रूप हैं.
संघ की चुनौतियां क्या हैं
संघ के सामने भी अपनी चुनौतियां हैं. पश्चिम में उसके नाम को लेकर शंकाएं, वैचारिक आरोप और संगठित विरोध मौजूद हैं. इसका सबसे प्रभावी उत्तर केवल वक्तव्य नहीं हो सकता. उत्तर होगा पारदर्शी कार्य, सेवा का विस्तृत अनुभव, कानून के प्रति पूर्ण निष्ठा, विविध समुदायों के साथ सद्भाव और युवा पीढ़ी के लिए खुला, आधुनिक और संवेदनशील संवाद. संघ को वहां अपने सांस्कृतिक लक्ष्य को स्पष्ट और सरल भाषा में रखना होगा कि हिंदू समाज का संगठन किसी के विरुद्ध नहीं, समाज के भीतर आत्मविश्वास, समरसता और सेवा जगाने के लिए है.
न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन की यह यात्रा अंततः एक प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है: क्या विश्वभर का हिंदू समाज अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक दुनिया में रचनात्मक, जिम्मेदार और सम्मानित भूमिका निभा सकता है? संघ का उत्तर है हाँ, यदि उसमें अपनत्व हो, संगठन हो, सेवा हो और अपने होने का सहज आत्मविश्वास हो. डॉ. मोहन भागवत की यह यात्रा उसी उत्तर को शब्द देने के साथ-साथ उसे जीवन में उतारने का आह्वान है.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)