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'गांधी बड़ा आदमी था, क्योंकि वह छोटा आदमी था'

Sujit Kumar Mishra & Keyoor Pathak
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 17, 2026 17:31 pm IST
    • Published On फ़रवरी 17, 2026 17:31 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 17, 2026 17:31 pm IST
'गांधी बड़ा आदमी था, क्योंकि वह छोटा आदमी था'

'गांधी बड़ा आदमी था, क्योंकि वह छोटा आदमी था'. एक जगह हमने  जब यह विमर्श रखा तो लोगों को यह बात शायद बेतुकी सी लगी. लेकिन, यह एक सच्चाई है कि गांधी का 'छोटापन' ही उनके बड़े होने का प्रमाण है. गांधी का दर्शन 'छोटे' या आम आदमी का दर्शन था. उन्होंने आम आदमी की तरह दुनिया पर विचारा. इसलिए उनका कद दुनिया की राजनीति में अद्वितीय है. उनके आसपास शायद ही कोई राजनेता ठहर सकता है. हम गांधी के आलोचक हो सकते हैं, होना भी चाहिए, लेकिन गांधी को खारिज नहीं कर सकते. वह हर मोड़ पर दुनिया के समाज और राजनीति को दिशा-निर्देश देते दिखेंगे. गांधी को विचारने के कई तरीके हैं- प्रथम, एक संत के रूप में; द्वितीय, एक राजनेता के रूप में और तृतीय, एक समाज विज्ञानी के रूप में. संत के रूप में हम उनके संतत्व पर सवाल खड़े कर सकते हैं, इसी तरह राजनेता के रूप में भी उनके राजनीतिक निर्णयों की विसंगतियों पर उंगली उठा सकते हैं, लेकिन जब हम उन्हें एक समाज विज्ञानी के रूप में देखते हैं तो लगता है तमाम समाज विज्ञानी जिन मुद्दों को समझने-समझाने के लिए बड़े-बड़े सिद्धांत देते रहे, गांधी ने अपनी छोटी पुस्तिकाओं में उसे समेटकर रख दिया. गांधी ने कोई बड़ा प्रबंधकीय साहित्य नहीं रचा, उन्होंने बस जीवन को जैसे देखा, उसे वैसा ही लिखा. उन्होंने 'ग्राम-स्वराज' की संकल्पना की. यही गांधी के विचार दर्शन की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है. भीमकाय नगरों और दानवी कारखानों की तबाही से अलग उन्होंने एक सुखी और संपन्न समाज का सपना देखा. यह सपना महज कोई वैचारिक जुगाली नहीं थी, बल्कि एक ठोस विचारों से युक्त आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था थी, जिसके अनुपालन में 'रामराज' या सतत विकास अन्तर्निहित था.

उपभोक्तावाद की सीमाएं

आज उपभोक्तावाद के चरम दौर में दुनिया की समस्या यह है कि धरती पर संसाधनों को कैसे सुरक्षित और सतत बनाये रखा जाए! आधुनिक सभ्यता के पास इसका कोई सुरक्षित जवाब नहीं है, क्योंकि वर्तमान सभ्यता किसी भी कीमत पर अन्यायी उपभोक्तवाद के विरुद्ध जाने की स्थिति में नहीं है. लेकिन गांधी ने एकदम सीधा सा समाधान दिया कि जनता और सत्ता अपनी जरूरतों को कम से कम करें. जीने के लिए आदमी को बहुत अधिक की जरूरत नहीं, बहुत कम से कम में बहुत अच्छा से अच्छा जीवन जीया जा सकता है- सतत और सुंदर विकास का यह मूल आधार है.'ग्राम-स्वराज' उसी 'कम से कम का दर्शन'है, जिससे प्रेरणा पाकर जर्मन विद्वान शुमाकर ने 'स्माल इज ब्यूटीफुल' लिखा.

भारत या दुनिया की राजनीति में ऐसा कोई दूसरा राजनेता नहीं दिखाई देता जिसने लगातार अपने आप को 'आम आदमी' बनाने पर जोर दिया हो या जिसने लगातार अपनी जरूरतों को कम से कम किया हो. हम सब प्रतिदिन अपने जीवन में अपनी जरूरतों को लगातार बढ़ाते जाते हैं, हर दिन पिछले दिन की तुलना में अधिक से अधिक उपभोग करना चाहते हैं. आज जैसा खाएं हैं उससे बेहतर कल खाएं, आज जैसा पहने हैं, उससे बेहतर कल पहने- यही हमारा आर्थिक दर्शन है. लेकिन, गांधी शायद अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने लगातार अपनी जरूरतों को कम किया. उन्होंने अंग्रेजी शूट छोड़कर धोती पहनी, फिर आगे चलकर धोती को भी आधा पहनना प्रारंभ किया. यह उस दौर में जब भारत पूरी तरह से औपनिवेशिक गिरफ्त में हो, करना सामान्य काम नहीं था. यह एक क्रान्तिकारी कदम था. गांधी यह कर सके, क्योंकि वो मौलिक थे, वह आम आदमी की तरह सोचते थे, इसलिए वह आम आदमी की तरह समावेशी हो सके- यानि 'बड़ा' हो सके. उनका उपभोक्तावाद विपरीत दिशा की तरफ था, जो दिशा सतत-विकास की दिशा थी या 'रामराज' की दिशा थी.

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गांधी का अर्थशास्त्र क्या है

दुनिया को वैश्विक पूंजीवादी अर्थशास्त्र की काली छाया ने घेर रखा है. इस अंधेरी छाया में बस पूंजी ही चमक रही शेष सब को कालिमा ने निगल लिया है. इस अंधकार से निकलने के लिए गांधी का अर्थशास्त्र एक सार्थक विकल्प है. गांधी के मुताबिक इस विकल्प के कम से कम चार अहम् पक्ष हैं, जो तमाम चुनौतियों से निबटने में सहायक साबित हो सकते हैं, वे हैं-

नैतिकता: आज का दौर सामाजिक और राजनीतिक नैतिकता के संकट का दौर भी है. पूंजी ने तमाम मूल्य-प्रणाली को धवस्त कर दिया है. इससे आर्थिक सम्पन्नता के बावजूद सामाजिक न्याय संभव नहीं हो पा रहा है. हम एक ऐसी दुनिया बनाते जा रहे हैं, जहां आदमी तो है, लेकिन आदमियत गायब हो गई है, समाज तो है, लेकिन सामाजिकता विलुप्त है. गांधी राजनीतिक-आर्थिक सत्ता से नैतिक होने का आह्वान करते हैं. वह चाहते हैं कि सत्ता 'धर्मसम्मत' हो.

वितरण: समस्या संसाधनों के अभाव से अधिक उसके वितरण की है. क्या यह सच नहीं है कि आज भी लाखों लोग सामान्य-से सामान्य बीमारियों में उचित इलाज के अभाव में मर जाते हैं? क्या यह सच नहीं है कि आज भी लाखों लोग चाहकर भी पढ़ नहीं पाते हैं? क्या यह सच नहीं है कि दुनिया में करोड़ों लोग जीवन-यापन करने के लिए आजीविका नहीं पा पाते? यह सब इसलिए ही नहीं है कि संसाधनों का अभाव है, बल्कि इसलिए अधिक है कि वितरण अन्यायपूर्ण है. 

तकनीक: मार्क्युज की पंक्ति है-'मेन हैव बीकम द टूल्स ऑफ़ देयर टूल्स'. तकनीकी  वर्चस्व मनुष्यों को उसके यथोचित जगहों से विस्थापित करता जा रहा है. आज जितनी तेजी से तकनीक का 'विकास' हो रहा है, उससे अनुकूलन की समस्या सामने आ रही है. इसे एल्विन टोफ्लर के शब्दों में कहें तो यह 'फ्यूचर-शॉक' की स्थिति पैदा कर रही है. एक चीज को लोगों ने समझा नहीं और दूसरी चीज सामने आ जा रही है. दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि लोगों को उसके साथ सामंजस्य बैठाने का भी मौका नहीं मिल रहा है. एक तरह से इसने समाज को अस्थिर कर दिया है.

संरचना: गांधी इसलिए एक स्थिर और सतत-विकास से युक्त दुनिया की संकल्पना में संरचना को लघु स्तर पर बनाने पर जोर देते हैं. बड़े औद्योगिक केंद्र हिंसक, अनैतिक और अन्यायी होते हैं, इसलिए ग्रामीण अर्थतंत्र के विकास से ही एक न्यायी दुनिया रची जा सकती है. दूसरे शब्दों में कहें तो वे 'स्मार्ट-गांवों' के पक्षकार थे.  

आज लगातार लोक-लुभावन राजनीति के प्रभावों ने गांधी को महत्वहीन करने का प्रयास किया है, लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि गांधी आम आदमी का आर्थिक दर्शन है और वैश्विक पूंजी जिस तरह से अपने अंधकार का विस्तार करती जा रही है उसमें गांधी के आर्थिक विचार से ही 'रामराज' की स्थापना की जा सकती है. 

(डिस्क्लेमर: सुजीत कुमार मिश्र हैदराबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल डेवलेपमेंट के निदेशक हैं.  केयूर पाठक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे लेखक का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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