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ईरान-अमेरिका युद्ध का कैसे फायदा उठा रहा है चीन, भारत को क्या करना चाहिए

Dr Amar Singh
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 20, 2026 17:25 pm IST
    • Published On अप्रैल 20, 2026 17:25 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 20, 2026 17:25 pm IST
ईरान-अमेरिका युद्ध का कैसे फायदा उठा रहा है चीन, भारत को क्या करना चाहिए

आज अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में 'विश्व व्यवस्था' एक निर्णायक परिवर्तनशील चरण की ओर बढ़ रही है. इसकी प्रमुख विशेषता 'बहुध्रुवीयता' है. शक्ति अब एक या दो महाशक्तियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत, चीन और रूस सहित अनेक उभरते शक्ति केंद्रों में विकेंद्रित हो चुकी है. इस नई व्यवस्था में 'भू-अर्थशास्त्र' का आयाम तेजी से प्रमुख हो रहा है. व्यापार, प्रौद्योगिकी, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं और आर्थिक निर्भरताएं अब सैन्य शक्ति के समान ही निर्णायक बन गई हैं. आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार युद्ध और तकनीकी नियंत्रण वैश्विक राजनीति को नया आकार दे रहे हैं. इसके साथ ही साथ, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का क्षरण, खुले समुद्रों की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरे और संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं का घटता वजन इस परिवर्तन को और गहरा बना रही है. इस नई विश्व व्यवस्था को गति प्रदान करने वाले प्रमुख कारकों में अमेरिका और चीन के बीच तीव्र होती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा,'एशिया का उदय' जहां भारत और चीन के मध्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, राष्ट्रवाद और संरक्षणवाद का उदय और 2026 का ईरान-अमेरिका/इजरायल युद्ध शामिल हैं. ये घटनाएं मिलकर वैश्विक राजनीति को एक नई, अधिक जटिल और बहु-स्तरीय दिशा दे रही हैं. यह प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय और वैश्विक संतुलन दोनों को गहराई से प्रभावित कर रही है.

विश्व व्यवस्था का बदल रहा है है ईरान युद्ध

ईरान-अमेरिका संघर्ष (2026), पश्चिम एशिया में एक साधारण युद्ध मात्र नहीं रहा, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण संकेतक सिद्ध हो रहा है. इसने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के तेजी से क्षरण को उजागर किया है, जहां पूर्व-आक्रामक हमले, उच्च-स्तरीय नेतृत्व को निशाना बनाना और व्यापक आर्थिक नाकेबंदी अब अपवाद नहीं, बल्कि स्वीकार्य रणनीतिक औजार बनते जा रहे हैं. ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य बुनियादी ढांचे पर शुरू हुए लक्षित हमलों से शुरू हुआ घटनाक्रम शीघ्र ही एक व्यापक भू-राजनीतिक संकट में बदल गया. इसके प्रभाव युद्धक्षेत्र से कहीं आगे वैश्विक ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाओं, मुद्रा व्यवस्था और शक्ति संतुलन तक फैल गए. इस संघर्ष ने वैश्विक शक्ति-संतुलन में हो रहे गहरे संरचनात्मक परिवर्तनों को स्पष्ट किया है, मौजूदा रुझानों को तेज किया है और विशेष रूप से 'चीन' के लिए एक नया रणनीतिक अवसर उत्पन्न किया है.

दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना को कैसे मिल रही है चुनौती

इस संघर्ष के मूल में एक विरोधाभास छिपा है. संयुक्त राज्य अमेरिका, जो अभी भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है, उसने महाद्वीपों के पार सटीकता और गति के साथ अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया. अपनी तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद वह कोई निर्णायक राजनीतिक परिणाम हासिल करने में विफल रहा. ईरान, हालांकि पारंपरिक अर्थों में सैन्य रूप से कमज़ोर था, फिर भी उसने असममित रणनीतियों, मिसाइल हमले, ड्रोन युद्ध, प्रॉक्सी नेटवर्क और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे समुद्री जल मार्गों पर अवरोध के जरिए प्रभावी विरोध किया.इससे पैदा हुए गतिरोध और अंततः युद्धविराम ने 21वीं सदी में अमेरिकी शक्ति की सीमाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो. इराक और अफगानिस्तान के अनुभव पहले ही सिखा चुके हैं कि सैन्य सफलता को स्थायी राजनीतिक स्थिरता में बदलना कितना कठिन है. लेकिन ईरान संघर्ष इस मायने में अलग है कि इसने अमेरिका की सीमाओं को उजागर कर, तेज़ी से बदलती वैश्विक व्यवस्था को और गति प्रदान की है.

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इस युद्ध ने अमेरिका के लिए एक भू-राजनीतिक भटकाव पैदा कर दिया है. इसका फायदा उठाने के लिए चीन अच्छी स्थिति में है. एक दशक से अधिक समय से अमेरिकी रणनीतिकारों का फोकस मुख्यतः इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर रहा है, जहां चीन का बढ़ता दबदबा सबसे बड़ी चुनौती है. ईरान युद्ध ने अमेरिका को अपना ध्यान, संसाधन और राजनीतिक पूंजी मध्य पूर्व की ओर मोड़ने पर मजबूर कर दिया है. खाड़ी में तैनात विमानवाहक पोत, ईरानी गतिविधियों पर केंद्रित खुफिया संसाधन और संकट प्रबंधन में लगाए गए कूटनीतिक प्रयास, ये सभी वास्तव में अन्य मोर्चों पर अमेरिकी क्षमता की कमी को दर्शाते हैं. चीन के लिए यह सांस लेने का कीमती अवसर है. इससे चीन को दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत करने, ताइवान पर दबाव बढ़ाने और कम जोखिम के साथ सैन्य आधुनिकीकरण आगे बढ़ाने का मौका मिला है.

अमेरिका के खिलाफ बढ़ता असंतोष

इस युद्ध के दौरान अमेरिकी नेतृत्व की छवि गंभीर रूप से प्रभावित हुई है. वार्ताओं के बीच ही सैन्य कार्रवाई को प्राथमिकता देना और विरोधाभासी बयानबाज़ी ने अमेरिकी की 'निष्पक्ष मध्यस्थ' की भूमिका को कमजोर किया है. पश्चिमी गठबंधन में दरारें भी उजागर हुईं, विशेषकर यूरोपिय यूनियन के देशों के बीच, जो पहले से ऊर्जा संकट और आर्थिक दबाव झेल रहे थे. तेल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति व्यवधान ने इस असंतोष को और गहरा कर दिया. इसके साथ ही, अमेरिका द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा गारंटी, जिस पर पश्चिम एशिया, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप के कई देश निर्भर रहे हैं, उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं. सहयोगी देशों में यह आशंका बढ़ी है कि संकट की स्थिति में अमेरिका की प्रतिबद्धता कितनी स्थिर और भरोसेमंद रहेगी.यह परिदृश्य स्पष्ट करता है कि केवल दबाव, प्रतिबंध और दंडात्मक उपायों पर आधारित रणनीति दीर्घकालिक वैश्विक नेतृत्व सुनिश्चित नहीं कर सकती. वास्तविक नेतृत्व विश्वास, स्थिरता और सहयोग पर आधारित होता है. इन तत्वों की कमी अब अमेरिकी वैश्विक भूमिका में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है.

इसके विपरीत, चीन ने 'सोची-समझी तटस्थता' की नीति अपनाई.सीधे शामिल हुए बिना तनाव कम करने और बातचीत की अपील की. इससे चीन खुद को एक ज़िम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश कर सका, जो अमेरिकी दखलंदाज़ी के ठीक उलट है. डेट ट्रैप के आरोपों के बावजूद, ग्लोबल साउथ के देशों में चीन का यह रुख काफी हद तक प्रभावी साबित हो रहा है.

सबसे अधिक तेल किस देश से खरीदता है चीन

चीन के लिए यह युद्ध स्पष्ट रूप से जोखिम और अवसर दोनों लेकर आया है. यही द्वंद्व चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को परिभाषित करता है. पश्चिम एशिया में Belt and Road Initiative (BRI) की परियोजनाएं युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण गंभीर सुरक्षा जोखिमों से प्रभावित हुई हैं. कई अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में देरी, लागत में वृद्धि और निवेश की अनिश्चितता बढ़ी है. अल्पावधि में चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है, वह होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता के कारण अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है.इस युद्ध के परिणामस्वरूप वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी उथल-पुथल देखी गई. बरेंट क्रूड की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 119 डॉलर तक पहुंच गईं. यह अस्थिरता चीन की विनिर्माण-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर लागत वृद्धि, मुद्रास्फीति दबाव और संभावित विकास मंदी में परिवर्तित होती है. विशेष रूप से चीन के शेंडोंग प्रांत में स्थित  टीपॉट रिफाइनरियां, जो रियायती ईरानी तेल पर निर्भर स्वतंत्र रिफाइनरियां हैं, इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. इसके अतिरिक्त, कतर के एलएनजी अवसंरचना पर हमलों से वैश्विक गैस आपूर्ति का लगभग 20 फीसदी प्रभावित हुआ. इससे चीन की नेचुरल गैस आधारित ऊर्जा संक्रमण रणनीति को झटका लगा.

इसके साथ ही साथ युद्ध ने एक और महत्वपूर्ण कमजोरी उजागर किया है, वह है सल्फर सप्लाई चेन. वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाले सल्फर का लगभग 50 फीसदी खाड़ी क्षेत्र से आता है, जो उर्वरक और धातुकर्म उद्योगों के लिए आवश्यक है. इस व्यवधान ने चीन के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर दिया है.इसके बाद भी यही कमजोरियां चीन के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक पुनर्संरचना का आधार बन रही हैं. पिछले एक दशक में चीन ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है-

  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (मध्य एशिया, रूस, अफ्रीका) 
  • पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार (स्थलीय मार्गों के माध्यम से) 
  • इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और नवीकरणीय ऊर्जा में भारी निवेश 
  • रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार 

2026 तक चीन के कुल तेल भंडार (रणनीतिक + वाणिज्यिक) लगभग 130 दिनों की आयात कवरेज प्रदान करने के स्तर तक पहुंच चुका है. यह अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी ऊपर है. इसलिए यह संकट केवल एक आर्थिक झटका नहीं बल्कि रणनीतिक संक्रमण का उत्प्रेरक है. हालांकि अल्पकालिक दवाब के बावजूद, चीन इस स्थिति का उपयोग अपने ऊर्जा ढांचे को अधिक लचीला, विविधीकृत और आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर रहा है.

डॉलर को चुनौती देता यूआन

इस संघर्ष ने चीन की डी डॉलराइजेशन रणनीति को उल्लेखनीय गति दी है. ईरान के साथ 25-वर्षीय व्यापक साझेदारी (2021 में हुआ 400 अरब डॉलर का रणनीतिक सहयोग समझौता) और रूस के साथ बढ़ते समन्वय ने रियायती ऊर्जा आपूर्ति और युआन-आधारित लेन-देन को प्रोत्साहित किया है. यह अनुमान है कि 2025 तक चीन ने ईरानी तेल निर्यात का लगभग 90 फीसदी खरीदा (करीब 45 अरब डॉलर), इसमें 'टीपॉट रिफाइनरियों' की प्रमुख भूमिका रही. इस लेन-देन का बड़ा भाग युआन या वस्तु-विनिमय के माध्यम से हुआ. इससे अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली को दरकिनार किया गया. यह Ship-to-Ship (STS) ट्रांसफर और 'shadow trade networks' के माध्यम से तेल के स्रोत को छिपाकर हुआ. इससे पश्चिमी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कमजोर पड़ी है. क्षेत्रीय बैंकों जिनका वॉल स्ट्रीट से सीमित संबंध है, उनके जरिए भुगतान निपटान ने अमेरिका की वित्तीय पकड़ को और सीमित किया है. संघर्ष के दौरान होर्मुज स्ट्रैट से गुजरने वाले तेल व्यापार में युआन को प्राथमिकता मिलने लगी, इससे 'पेट्रो-युआन' अवधारणा को बल मिला. चीन की Cross-Border Interbank Payment System (CIPS) में भी इस संकट काल के दौरान रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज हुई. मार्च 2026 में औसत दैनिक लेन देन 920 बिलियन युआन से बढ़कर कुछ दिनों में 1.22 ट्रिलियन युआन तक पहुंच गया. हालांकि डॉलर की वैश्विक स्थिति अभी मजबूत है, लेकिन यह संघर्ष अधिक विविध वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. इससे विकासशील देशों में युआन को वैकल्पिक मुद्रा के रूप में अपनाने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है.

होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण किसका होगा, अब यह इस युद्ध में टकराव का प्रमुख बिंदु बन गया है.

होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण किसका होगा, अब यह इस युद्ध में टकराव का प्रमुख बिंदु बन गया है.

दक्षिण चीन सागर में बढ़ती गतिविधियां

सैन्य दृष्टि से इस युद्ध ने असममित युद्ध (मिसाइल, स्वार्म ड्रोन, प्रॉक्सी और समुद्री व्यवधान) की प्रभावकारिता को रेखांकित किया, जो तकनीकी रूप से श्रेष्ठ सेनाओं के विरुद्ध भी सफल हो सकता है. यह चीन की 'सक्रिय रक्षा' और 'सूचनाकृत स्थानीय युद्ध' रणनीतियों से मेल खाता है. बीजिंग अब एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) प्रणालियों, हाइपरसोनिक हथियारों और नौसैनिक विस्तार को तेजी से आगे बढ़ा रहा है. अमेरिका के ध्यान के भटकाव का फायदा उठाते हुए चीन दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास 'ग्रे-ज़ोन' गतिविधियों के अधिक अवसर देख रहा है. अप्रैल 2026 में ताइवान की मुख्य विपक्षी पार्टी कुओमिन्तांग (KMT) की चेयरवुमन चेंग ली-वुन का बीजिंग दौरा क्रॉस-स्ट्रेट (ताइवान-चीन) संबंधों में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव का संकेत देते हैं. यह शी जिनपिंग की 2047 से पहले ताइवान के पुनः एकीकरण की महत्वाकांक्षा से भी जुड़ा है. वर्तमान में, जब अमेरिका का ध्यान पश्चिम एशिया में उलझा हुआ है, चीन इस अवसर को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ाने के लिए एक सुनहरा रणनीतिक क्षण मान रहा है.

2026 का ईरान-अमेरिका युद्ध वैश्विक राजनीति में गहरे परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है. अब शक्ति केवल सैन्य प्रभुत्व से नहीं, बल्कि कथानक निर्माण, आर्थिक लचीलापन, साझेदारी निर्माण और अवसरों के कुशल उपयोग से निर्धारित होती है. अमेरिकी शक्ति में दिख रही गिरावट, रणनीतिक अति-विस्तार, गठबंधन तनाव और सॉफ्ट पावर के क्षरण ने इस संक्रमण को तेज किया है. चीन अधिक आत्मविश्वास के साथ रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संबंध गहरा रहा है और ऊर्जा, सैन्य और राजनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता मजबूत कर रहा है. इसकी रणनीति धैर्य, लचीलापन और अवसरवाद तत्काल व्यवधानों की तुलना में अधिक स्थायी प्रतीत होती है. यह संघर्ष बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर संक्रमण को तेज कर रहा है, इसमें चीन की भूमिका अधिक केंद्रीय होती जा रही है. हालांकि, यह परिवर्तन पूर्ण नहीं है. यदि ईरान के साथ युद्धविराम स्थिर रहा तो अमेरिका अपना ध्यान पुनः चीन की ओर केंद्रित कर सकता है. भारत के लिए भी यह समय 'रणनीतिक संतुलन' का है, जहां उसे चीन के उदय से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करते हुए, उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था में अपने हितों को बहु-स्तरीय और यथार्थवादी  नीति द्वारा सुरक्षित करना होगा. यह स्पष्ट है कि यह युद्ध केवल विजेताओं और पराजितों का निर्धारण नहीं कर रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति के नियमों को पुनर्परिभाषित कर रहा है. 

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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