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ख़ामेनेई की अंतिम यात्रा से शुरू हुआ ईरानी राजनीति का नया अध्याय, मोजतबा ख़ामेनेई क्यों नहीं आए सामने

अज़ीज़ुर रहमान आज़मी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 06, 2026 14:06 pm IST
    • Published On जुलाई 06, 2026 14:06 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 06, 2026 14:06 pm IST
ख़ामेनेई की अंतिम यात्रा से शुरू हुआ ईरानी राजनीति का नया अध्याय, मोजतबा ख़ामेनेई क्यों नहीं आए सामने

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में शुक्रवार को शुरू हुईं.रस्में गुरुवार तक चलेंगी. खामेनेई का अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, यह एक ऐसा राजनीतिक और कूटनीतिक क्षण है, जिस पर न केवल ईरान बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और दुनिया की प्रमुख शक्तियों की नजरें टिकी हुई हैं.ईरानी अधिकारियों के मुताबिक 90 से अधिक देशों ने अपने उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की इच्छा जताई है.वहीं कई देशों के वरिष्ठ नेता और अधिकारी अंतिम संस्कार में भाग लेने वाले हैं. लेकिन इस अवसर पर ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई इस आयोजन में अब तक नजर नहीं आए हैं. कहा जा रहा है कि सुरक्षा कारणों से वो सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ रहे हैं. 

कितना बड़ा सवाल है,मोजतबा खामेनेई कहां हैं

इस पूरे घटनाक्रम का महत्व केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं है कि मोजतबा खामेनेई कहां हैं. वास्तव में यह अंतिम यात्रा ईरान की राजनीतिक व्यवस्था, उसकी वैचारिक निरंतरता और वैश्विक कूटनीति का सार्वजनिक प्रदर्शन बन चुकी है. इतिहास बताता है कि किसी भी देश में उसके प्रमुख का अंतिम संस्कार केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं होता. यह सत्ता परिवर्तन के सबसे संवेदनशील क्षण में जनता को यह विश्वास दिलाने का जरिया भी होता है कि व्यक्ति बदल सकता है, लेकिन राज्य और उसकी संस्थाएं स्थिर हैं. इसलिए ऐसे समारोहों में सैन्य सम्मान, धार्मिक अनुष्ठान, लाखों लोगों की भागीदारी और विदेशी प्रतिनिधियों की मौजूदगी एक साथ मिलकर राजनीतिक संदेश का निर्माण करती हैं.

ईरान में यह महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि वहां धर्म और राजनीति का संबंध अत्यंत गहरा है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से शिया परंपरा में मौजूद शहादत, स्मरण और सामूहिक मातम की संस्कृति को राज्य की वैचारिक पहचान का हिस्सा बनाया गया. इसलिए सर्वोच्च नेता का अंतिम संस्कार केवल एक व्यक्ति की विदाई नहीं बल्कि इस्लामी गणराज्य की निरंतरता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है.

ईरान ने क्या राजनीतिक संदेश दिया 

ऐसे विशाल शोक समारोह समाज में सामूहिक पहचान और एकजुटता की भावना को मजबूत करते हैं. लाखों लोगों की भागीदारी यह संदेश देती है कि राष्ट्रीय संकट के समय में समाज एक साझा स्मृति और साझा भावनात्मक अनुभव से जुड़ा हुआ है. शिया धार्मिक परंपरा में शोक केवल दुख व्यक्त करने का माध्यम नहीं बल्कि सामूहिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखने की प्रक्रिया भी है. इसी कारण ईरान इन धार्मिक प्रतीकों को राष्ट्रीय एकता के साथ जोड़ने का प्रयास करता है. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अंतिम यात्रा नई पीढ़ी के सामने क्रांति की विरासत को दोबारा प्रस्तुत करती है. धार्मिक प्रतीकों, राष्ट्रवाद और राजनीतिक विचारधारा का यह मेल ईरान की वैचारिक संरचना को पुनः स्थापित करने का प्रयास भी है.

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान राजधानी तेहरान में लगे पोस्टर.

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Photo Credit: AP

राजनीतिक दृष्टि से यह अंतिम यात्रा सत्ता परिवर्तन को वैधता प्रदान करने का मंच है. किसी भी राजनीतिक व्यवस्था के लिए नेतृत्व परिवर्तन सबसे चुनौतीपूर्ण समय होता है. ऐसे अवसरों पर राज्य का प्रयास होता है कि जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह संदेश जाए कि शासन व्यवस्था पूरी तरह स्थिर और नियंत्रित है. यही कारण है कि अंतिम यात्रा में केवल धार्मिक नेता ही नहीं बल्कि सेना, सुरक्षा एजेंसियां, सरकारी अधिकारी और राजनीतिक नेतृत्व भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं. यह संदेश दिया जाता है कि राज्य की संस्थाएं पहले की तरह काम कर रही हैं और राजनीतिक निरंतरता बनी हुई है.

कितने देशों के लोग अंतिम संस्कार में शामिल हुए

इस अंतिम यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 90 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडलों की प्रस्तावित भागीदारी है. यह केवल शोक प्रकट करने का अवसर नहीं बल्कि 'फ़्यूनरल डिप्लोमेसी' का उदाहरण भी है. ऐसे समारोहों में नेताओं के बीच औपचारिक और अनौपचारिक मुलाकातें होती हैं, जिनका प्रभाव भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है. पश्चिम एशिया इस समय युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा और बदलते शक्ति-संतुलन के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में ईरान का यह आयोजन दुनिया को यह संदेश देने का प्रयास भी है कि प्रतिबंधों और संघर्षों के बावजूद उसके कूटनीतिक संबंध सक्रिय हैं. भारत द्वारा भी उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध आज भी महत्वपूर्ण हैं. 

इस पूरे आयोजन का सबसे चर्चित सवाल यही है कि क्या मोजतबा ख़ामेनेई सार्वजनिक रूप से नजर आएंगे. यदि वे लाखों लोगों के बीच उपस्थित होते हैं तो यह नए नेतृत्व के आत्मविश्वास, राजनीतिक वैधता और सत्ता की निरंतरता का प्रतीक माना जाएगा. दरअसल 1989 में आयतुल्ला रुहोल्लाह ख़ुमैनी के निधन के समय भी ऐसा ही हुआ था. उनके अंतिम संस्कार में अभूतपूर्व जनसमूह उमड़ा था. उसी समारोह ने इस्लामी गणराज्य की निरंतरता का प्रतीकात्मक आधार तैयार किया. आज का ईरान, हालांकि, 1989 के ईरान से अलग है. क्षेत्रीय संघर्ष, सुरक्षा चुनौतियां, आर्थिक दबाव और डिजिटल मीडिया के दौर ने राजनीतिक संक्रमण को कहीं अधिक जटिल बना दिया है.

यहीं से मोजतबा ख़ामेनेई की संभावित उपस्थिति का महत्व बढ़ जाता है. यदि वे सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो यह नए नेतृत्व के आत्मविश्वास और वैधता का संदेश होगा. इससे समर्थकों में यह संकेत जाएगा कि सत्ता परिवर्तन व्यवस्थित ढंग से हो चुका है और नया नेतृत्व स्वयं जनता के सामने खड़ा होने को तैयार है.

ईरान में नई सरकार कितनी स्थिर है

वहीं दूसरी ओर, यदि वे सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आते हैं तो इसे केवल राजनीतिक कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. वर्तमान क्षेत्रीय परिस्थितियों और सुरक्षा को खतरों को देखते हुए यह भी संभव है कि सरकार नए सर्वोच्च नेता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे. इस स्थिति में सरकार व्यक्ति की बजाय संस्थाओं, सैन्य नेतृत्व, वरिष्ठ धर्मगुरुओं और पूरे राज्य तंत्र के माध्यम से स्थिरता का संदेश देना चाहेगी. यह भी अपने आप में एक राजनीतिक संदेश होगा कि व्यवस्था किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि संस्थागत निरंतरता पर आधारित है.

आज का एक और महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल मीडिया है.अब अंतिम संस्कार केवल सड़कों पर मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहता. सोशल मीडिया, समाचार चैनल और अंतरराष्ट्रीय मीडिया हर दृश्य, हर भाषण और हर उपस्थिति और अनुपस्थिति की अलग-अलग व्याख्या करते हैं. यदि मोजतबा ख़ामेनेई दिखाई देते हैं तो उनकी तस्वीरें राजनीतिक संदेश बन जाएंगी. यदि वे नजर नहीं आते हैं तो उनकी गैर मौजूदगी भी बहसों का अंतरराष्ट्रीय विषय बन जाएगी. इस प्रकार अयातुल्ला सैयद अली ख़ामेनेई का अंतिम संस्कार अब केवल एक राष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक सूचना युद्ध और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी बन चुका है.

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान राजधानी तेहरान उनकी फोटो के साथ आया एक ईरानी.

भारत के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है. ईरान पश्चिम एशिया की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और भारत की रणनीतिक विदेश नीति का एक अहम साझेदार है. इसलिए वहां होने वाला नेतृत्व परिवर्तन केवल ईरान का आंतरिक मामला नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और कूटनीतिक समीकरणों से जुड़ा हुआ प्रश्न है. यह अंतिम संस्कार केवल एक नेता की विदाई नहीं है. यह उस राजनीतिक व्यवस्था की परीक्षा भी है जो जनता, क्षेत्र और दुनिया को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद राज्य मजबूत और स्थिर है. मोजतबा ख़ामेनेई की उपस्थिति या अनुपस्थिति निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनेगी, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि ईरान इस शोक को किस प्रकार राजनीतिक वैधता और संस्थागत निरंतरता के प्रतीक में बदलता है. यही कारण है कि ईरान में शोक केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता की भाषा भी है.

सत्ता और कूटनीति का मंच

अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की अंतिम यात्रा केवल एक नेता की विदाई भर नहीं है. यह ईरान के लिए अपनी राजनीतिक स्थिरता, वैचारिक निरंतरता और अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को प्रदर्शित करने का अवसर भी है. लाखों लोगों की भागीदारी, 90 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडलों की मौजूदगी और मोजतबा ख़ामेनेई की मौजदूगी पर संशय, ये सभी इस बात का हिस्सा हैं कि ईरान स्वयं को दुनिया के सामने किस रूप में पेश करना चाहता है. इतिहास गवाह है कि कई बार अंतिम संस्कार केवल अतीत को विदा नहीं करते, बल्कि भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करते हैं. ऐसे में अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई अंतिम यात्रा भी शायद ऐसा ही ऐतिहासिक क्षण है, जहां शोक, सत्ता और कूटनीति एक ही मंच पर दिखाई दे रहे हैं. इन समारोहों में विशाल जनसमूह, धार्मिक प्रार्थनाएं, सैन्य सम्मान, सरकारी नेतृत्व की उपस्थिति और व्यापक मीडिया कवरेज एक साझा संदेश देते हैं कि सरकार स्थिर है और सत्ता का संचालन नियंत्रित ढंग से हो रहा है. राजनीतिक दृष्टि से ऐसे आयोजन अनिश्चितता को कम करने और जनता के बीच विश्वास बनाए रखने का काम करते हैं.

(डिस्क्लेमर:अज़ीज़ुर रहमान आज़मी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वेस्ट एशिया एंड नार्थ अफ़्रीकन स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)

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